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अपने अधिकारों के लिए भीख

भीख-विरोधी कानून गरीबी को अपराध बनाते हैं और उनकी कोशिश है कि गरीबों को सार्वजनिक जगहों से प्रतिबंधित कर दिया जाए.

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

भारत में भिखारी की कानूनी स्थिति हमेशा जोखिम भरी रही है. कई दशकों तक अपना प्रभाव रखने वाले बम्बई भिक्षावृत्ति निरोधक कानून (बीपीबीए) 1959 का आधार ही ये है कि गरीबी तो आपराधिक होने के बराबर है. ये कानून सरकार को अनुमति देता है कि वो बिना किसी वारंट के सिर्फ 'शकके आधार पर लोगों को गिरफ्तार कर सकती है और उन्हें सार्वजनिक नजरों से हटा सकती है. सदा से पुलिस द्वारा'भिखारियोंको घेरना और उन्हें बलपूर्वक शहर की सीमा से बाहर निकालना शहरों की 'सफाईपरियोजनाओं का हिस्सा रहा है. इन लोगों की पीड़ा से अधिक यहां पर किसी विदेशी की नजर क्या देखेगी ये वरीयता ले लेती है. इस महीने दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसमें सुधार करते हुए कहा है कि भीख मांगना एक बुनियादी ढांचे से जुड़ी हुई समस्या है. न्यायालय ने कहा कि सरकार का पहले ही दुखी इन लोगों को और दुखी करनाऔर अपनी नाकामी की सजा इन लोगों को देना अन्याय है. अदालत ने बीपीबीए के उन प्रावधानों को रद्द कर दिया जिनमें भीख मांगने को दंडनीय अपराध बनाया गया था. हालांकि अदालत का ये फैसला सिर्फ दिल्ली में ही लागू होगा.

 

भीख-विरोधी कानूनों में जिन लोगों को निशाना बनाया जाता है वो किसी नेता के 'मतदाता गणनहीं हैं क्योंकि वे सामाजिक और आर्थिक रूप से बहुत वंचित हैं. इस कानून के अंतर्गत भिखारियोंफेरीवालोंखोमचेवालोंछोटे हॉकर्ससड़क पर करतब दिखाने वालोंकचरा बीनने वालों और आवारा घूमने वालों (प्रवासियों समेत) को बिना वारंट के गिरफ्तार किया जा सकता हैबॉन्ड भरके छोड़ा जा सकता हैकिसी पंजीकृत संस्थान में दो से तीन साल बंदी बनाकर रखा जा सकता है और दूसरी बार दोषी होने पर 10 साल के लिए बंदी बनाकर रखा जा सकता है. बीपीबीए में तो ये तक चाहा गया कि इन भिखारियों पर निर्भर लोगों को भी बंदी बनाकर रखा जाए. इससे एक भिखारी प्रभावी रूप से कानूनन बाहरी माना जाता हैजो भारत के उसी भौगोलिक हिस्से में निवास किए हुए हैं लेकिन भारतीय नागरिक होने के उन लाभों से वंचित कर दिया जाता है जिसके तहत उनके संवैधानिक अधिकारों की सुनिश्चितता होती है. इसमें सरकार का नजरिया भी निहित है कि नागरिकता के साथ आने वाले इन अधिकारों को विशेषाधिकारों के रूप में लाया जाना चाहिए जो एक व्यक्ति को वैधता और 'सम्मानकी एक धारणा प्रदान करते हैं.

 

कई मामलों में अध्ययनों ने दिखाया है कि इन गिरफ्तार लोगों को दोषसिद्धि के बाद भिखारी गृहों में भेजने वाली मजिस्ट्रेट अदालतें ज्यादातर मौकों पर कानून की तय प्रक्रिया का पालन नहीं करती हैं. एक व्यक्ति को गिरफ्तार होने के लिए सिर्फ एक 'भिखारी की तरह दिखनाही काफी है. इन भिखारी गृहों में स्टाफ पूरा नहीं होता है और यहां पर संसाधनों की भारी तंगी होती है. इसमें बंद लोगों को मुफ्त के मजदूरों की तरह इस्तेमाल किया जाता है. सिद्धांततः तो इन बंदियों को व्यावसायिक प्रशिक्षण मिलना चाहिए लेकिन व्यावहारिक तौर पर ये लोग फिर उसी निराशाजनक हालत में पहुंच जाते हैं.

 

इस कानून के न्यायशास्त्र में 'राम लखन बनाम सरकार केस2006' को ऐतिहासिक माना जाता है जिसमें एक 'भिखारीको एक छापे के दौरान गिरफ्तार किया गया था और उनसे दोषी करार दे दिया गया और वहां से किसी पंजीकृत संस्थान में भेजने के बजाय सीधा एक साल के लिए तिहाड़ जेल में डाल दिया गया. दिल्ली उच्च न्यायालय के जज ने बताया कि बाध्यता (किसी अपराधी गैंग द्वारा भीख मांगने के लिए मजबूर करना) और आवश्यकता (गरीबीभूख और वैध विकल्पों के अभाव में भीख मांगने को मजबूर होना) में अंतर है. उन्होंने एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए कहाः "वे लोग अपने अस्तित्व के लिए और जिंदा रहने के लिए भीख मांगते हैं. किसी भी सभ्य समाज में इस श्रेणी के लोगों का होना एक लज्जा की बात है और ये सरकार की नाकामी है. इसके बाद भी इन लोगों को और अपमान देते हुए व वंचित करते हुए उन्हें किसी पंजीकृत संस्थान में बंदी बनाकर रखने के आदेश देना उनके साथ अमानवीय बर्ताव से कम नहीं है."

 

साल 1990 में बम्बई उच्च न्यायालय के समक्ष एक याचिका आई जिसके बाद न्यायालय ने एक समिति को आदेश दिया कि इस पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करे. उस समिति ने कहा कि ये तय करने का कोई पैमाना नहीं है कि कौन भिखारी हैकौन बीमार हैकौन शारीरिक रूप से विकलांग है या उसे महज आर्थिक मदद की जरूरत है. इन छापेमारियों में जो लोग भीख नहीं मांग रहे होते थे और सिर्फ मैले कपड़ों में होते थे और घूम रहे होते थे उन्हें भी यूं ही गिरफ्तार कर लिया जाता था. मसलनट्रांसजेंडर लोग इसमें आसान निशाना होते हैं. इस कानून के जरिए हमारी हाशिये पर पड़ी आबादी के कुछ वर्गों पर इतनी व्यापक और बिना जांची ताकत का होना सरकारी तंत्र को एक और औजार दे देता है जिससे वो पहले ही परेशान और कमजोर समूहों के खिलाफ अपने सामाजिक पूर्वाग्रहों का इस्तेमाल करते हैं. 'भीख मांगनाक्या है इस श्रेणी में ऐसे बहुत प्रकार के लोग आते हैं जो कई तरह के हाशिये पर हैं. उस समिति ने उस विषय में जो सुझाव दिए थे वो अब धूल खा रहे हैं.

 

दिल्ली उच्च न्यायालय के हालिया फैसले ने इस कानून के उन प्रावधानों को बरकरार रखा है जिसमें उन लोगों के लिए दंड का विधान है जो लोगों को भीख मांगने या प्राप्त करने के लिए मजबूर करते हैं या नियुक्त करते हैं. न्यायालय ने शहर प्रशासन से कहा है कि इस मामले में सामाजिक और आर्थिक पहलुओं की जांच करे और उसके बाद उन रैकेट को रोके जिनमें जबरदस्ती भीख मंगवाई जाती है. यहां पर ये दर्ज करना जरूरी है कि भीख मंगवाने के लिए आपराधिक रैकेट चलाने वाले उन लोगों को इन सब छापों में शायद ही कभी गिरफ्तार किया जाता है. ये लोग वैसे तो कानून की गिरफ्त से बच निकलते हैं लेकिन कभी पकड़े भी जाएं तो उन्हें दोषसिद्धि (जो शायद ही होती है) के बाद सिर्फ तीन साल की कैद मिलती है.

 

ये साबित किया जा चुका है कि इस कानून के प्रावधान संविधान की धारा 19 (1) (ए) और 21 के खिलाफ जाते हैं. सरकार के उस कर्तव्य के खिलाफ भी जाते हैं जो ये है कि लाचार और बेरोजगार लोगों की सलामती को प्रोत्साहित करे.

 

व्यापक तौर पर ये माना जाता है कि दरिद्रता एक देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था की प्रक्रियाओं का ही उत्पाद है. अब निकट भविष्य में किसी बुनियादी ढांचागत सुधार की गैर-मौजूदगी है तो भारत की राज्य सरकारें इतना तो कर ही सकती है कि वे भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से निकाल दे. दिल्ली उच्च न्यायालय ने स्वीकार किया है कि हमारे बीच ये एक समस्या है. इसका समाधान ठीक हमारे सामने है और हमें घूर रहा है.

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