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केरल की बाढ़ आपदा को समझने की कोशिश

राज्य में आई इस प्राकृतिक आपदा को लेकर जो मानवीय प्रतिक्रिया रही है वो आरोप-प्रत्यारोपों से ऊपर उठी है.

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

केरल में आई हालिया त्रासदी ने तीन स्तरों पर लोगों की प्रतिक्रियाओं को जगाया है. पहले और बुनियादी स्तर पर इसने समाज के विभिन्न वर्गों में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सीमा के परे जाकर स्वाभाविक प्रतिक्रिया जगाई है. इस स्तर पर प्रतिक्रिया को देखकर लगता है कि किसी बाहरी उत्प्रेरक या पूर्व-नियोजित गणना के बगैरये सीधी उत्पन्न हुई है. भारत के अंदर से और बाहर सेखासकर गैर-सरकारी सहायता समूहों द्वारा जो मानवीय सहायता केरल में लगातार आ रही है वो शानदार रही है. इन कार्यों ने सब सीमाओं के परे जाकर दिखाया है कि कैसे हमारी सबकी मानवता ज्यादा मायने रखती थी और इन्हीं मानवीय भावों की वजह से देश और दुनिया के अलग-अलग कोनों से संसाधनों को जुटाया जा सका. पहले स्तर पर आई प्रतिक्रिया ने ऐसा रूप अख्त़ियार किया है जो तीन पैमानों पर नैतिक रूप से पवित्र है. पहलाइसमें कोई आरोप-प्रत्यारोप नहीं है. दूसराइसमें उन व्यक्तियों और समूहों का नैतिक कथानक शामिल था जिन्होंने इस विनाशकारी बाढ़ के तबाही भरे परिणामों को कुछ हद तक कम करने के लिए एकता दिखाते हुए अपनी निजी संपत्ति का दान किया. तीसरा और अंतिम पैमाना ये कि इस नैतिक पहल ने किसी के निर्देश या नेतृत्व का इंतजार नहीं किया और स्वतः ही होने लगी.

 

लेकिन यही हमें दूसरे स्तर की प्रतिक्रिया में नहीं देखने को मिलता जो परिस्थिति का सामना करने को लेकर अनथक आलोचना से शुरू होती है. इस बार इसमें केरल की सरकार को निशाना बनाया गया जो तबाही के कुचक्र में फंसी हुई है. केरल के मामले में दिखता है कि इस प्रतिक्रिया का प्रतिनिधित्व दो तरह के आलोचकों ने किया थाः पर्यावरणविदों ने और केरल की राजनीति व अर्थव्यवस्था में भागीदारी रखने वालों ने. पर्यावरणविदों ने पूर्ववर्ती सरकारों की आलोचना करनी चाही क्योंकि समय समय पर उन्हें जो चेतावनी दी गई थी उसको सुना नहीं गया. लेकिन विकास के केरल मॉडल की राजनीति और 'विकासकी अंधभक्ति के साथ-साथ भुगतान से चलने वाले बड़े उपभोक्ता और हाउसिंग बाजार के विकास ने केरल और उसके बाहर के इन विशेषज्ञों की समयपूर्व दी गई चेतावनियों को नकार दिया. इसी तरह की चेतावनियां उन विभिन्न सरकारों को भी दी गई थी जिनके यहां हाल ही में बाढ़ आपदाएं आई हैं. लेकिन इन चेतावनियों को एक विकास औपचारिकता भर बना दिया गया है जहां उसे कचरे के डब्बे में भले ही न फेंका जाए पर उन्हें पढ़कर किनारे रख दिया जाता है. इसीलिए सहायक कारणों से चलने वाली विकास की ये राजनीति इन चेतावनियों और सावधानियों को दरकिनार कर देती है और कीमत ये चुकानी पड़ती है कि मानवता को तबाही भरे परिणामों का सामना करना पड़ता है. इस कारण से पहली के उलट दूसरे स्तर की प्रतिक्रिया भावनात्मक रूप से स्वतःस्फूर्त नहीं होती और उसमें वैज्ञानिक सत्य की ताकत शामिल होती है जिस कारण से ये विशेषज्ञों को नैतिक रूप से बल देती है कि वो इसकी जिम्मेदारी प्रकृति पर नहीं बल्कि उन मानवीय स्वार्थों और सार्वजनिक संस्थानों पर डाल सके जो उनके हितों की रक्षा करते हैं.

 

केरल की अर्थव्यवस्था के हितधारकों की चिंताएं हैं. इस आपदा का अर्थव्यवस्था परउपयोगी क्षेत्रों परवस्तुओं व सेवाओं की मांग पर जो तबाही भरा असर होने वाला है उसे लेकर. इस बारे में अर्थशास्त्री कह चुके हैं कि पारंपरिक उद्योगों के अलावा केरल के दायरे में आने वाले बैंक व बीमा क्षेत्रोंपर्यटन व आवास क्षेत्रों और खेती व प्राथमिक उत्पाद क्षेत्रों पर इस आपदा का असर हुआ है. जहां इस नुकसान का शुरुआती अनुमान 20,000 करोड़ रुपये के करीब लगाया गया हैवहीं केरल सरकार का मानना है कि इस बर्बादी का व्यवस्थित आंकलन अभी किया जाना बाकी है और एक बार ऐसा होने पर ये आंकड़ा इससे बहुत आगे जाएगा. यहां का पर्यटन क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ है जो करीब 30,000करोड़ रुपये का है जो केरल के सकल राज्य मूल्य का 10प्रतिशत है और करीब 14 लाख लोगों को रोजगार देता है. अल्प अवधि में और खासकर ओणम में टिकाऊ व गैर-टिकाऊ सामान की उपभोक्ता मांग बहुत गिरेगी. इस त्योहारी मौसम के दौरान मोटर वाहनों की बिक्री की मांग को इसने प्रतिकूल तरीके से प्रभावित किया है. इसीलिए इस तरह की प्रतिक्रियाएं सहयोगी कारणों से संबंधित होती है जहां लागत और आजीविका नुकसान का निर्धारण करना जरूरी होता है.

 

तीसरे स्तर पर प्रतिक्रिया जाहिर तौर पर देर से आई जिसका आधार न तो वैज्ञानिक था न ही सहयोगी कारकों वाला था बल्कि उन कारणों के लिए था जिसके लिए जरिया एक अलौकिक ताकत बनी थी. ये दक्षिणपंथी राजनेताओं और उनके समर्थकों की प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट दिखा जिनकी इच्छा तो बड़ी थी लेकिन केरल सरकार पर हमला नहीं कर पा रहे थे. उन्होंने इस पर हमला किया तो एक धूर्त प्रतिक्रिया देते हुए कि ये सब हुआ तो इसलिए क्योंकि केरल सरकार ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश संभव करवाया. लेकिन इनका ये दिया गया कारण मोहनदास करमचंद गांधी के उस त्रासद संदर्भ से अलग है जो 1934 में आए नेपाल-बिहार भूकंप को लेकर था. गांधी ने कहा था कि वो भूकंप बिहार के ऊंची जाति वालों को सजा देने के लिए भगवान ने किया क्योंकि उन लोगों ने बड़ी संख्या में अपने साथी इंसानों के साथ अस्पर्श्यता करने का पाप किया था. केरल तबाही को जिस तरह दक्षिणपंथी पढ़ रहे हैंगांधी ने उसके उलट भगवान के जरिए सामाजिक जिम्मेदारी उन लोगों पर डालनी चाही थी जिन्होंने उनके अनुसार बड़ी संख्या में अपने साथी इंसानों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया. मौजूदा मामले में केरल की बाढ़ का दक्षिणपंथियों ने जो अध्ययन किया उसमें भगवान का सहारा कुटिलतापूर्वक लिया गया है. उन्होंने समानता का बर्ताव न करने के लिए इंसानों को जिम्मेदार ठहराने के बजाय भगवान को जरिया बनाया ताकि धर्म के अभ्यास में लैंगिक भेदभाव किया जा सके. 

 

प्रतिक्रियाओं और जवाबों के इन तीन स्तरों से आगे और ऊपर जाकर देखें तो प्रशासन और राज्य सरकार के द्वारा किए जा रहे आपदा राहत और बचाव अभियान पश्चात कार्य तारीफ के काबिल रहे हैं. इसमें सेनानौसेनावायु सेनाराष्ट्रीय रक्षा एवं बचाव बल और केरल व देश के दूसरे हिस्सों से आए चिकित्सा समूह भी शामिल हैं. यहां के मछुआरा समुदायों की विशेज्ञता और प्रभावित लोगों को बचाने के उनके भद्र प्रयास बहुत तारीफ के काबिल और प्रेरक रहे हैं. इस तबाह करने वाली त्रासदी ने केरल के ज्यादातर ग्रामीण और शहरी हिस्सों को अपनी गिरफ्त में ले लिया थाबावजूद इसके केरल के लोगों ने सतही सीमाओं से ऊपर उठकर दृढ़तासाहस और एकता दिखाई और उसे पार करके आगे बढ़ गए. 

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