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जम्मू और कश्मीर में नजरबंदी की राजनीति

लोकतांत्रिक नेताओं की नजरबंदी जारी रखने से बातचीत और विमर्श की संभावनाओं और सीमित हो रही हैं

 

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लोक सुरक्षा कानून यानी पीएसए का इस्तेमाल करके जम्मू और कश्मीर में नेताओं को नजरबंद किया गया है। इससे पता चलता है कि कश्मीर के मसले पर केंद्र सरकार विचार-विमर्श के रास्ते नहीं चलना चाहती। नैशनल कांफ्रेंस के ओमर अब्दुल्ला और पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट की महबूबा मुफ्ती समेत कई नेताओं को अगस्त, 2019 में अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के वक्त से ही नजरबंद करके रखा गया है। सीआरपीसी के धारा-107 के तहत ऐसी नजरबंदी छह महीने से अधिक की नहीं हो सकती। क्योंकि ऐसा करने के लिए आरोपित को अदालत में पेश करना होता है। इसलिए अब सरकार इन्हें पीएसए के तहत नजरबंद रखे हुए है। सितंबर, 2019 से इसी कानून के तहत सांसद फारुख अब्दुल्ला को भी कैद में रखा गया है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि संविधान के तहत बनी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में शामिल होने वाले इन नेताओं को इतने समय तक गिरफ्तार करके रखने का क्या मतलब है? जम्मू और कश्मीर की पुलिस ने इन नेताओं के खिलाफ जो डोजियर तैयार किया है, उसमें ऐसे पर्याप्त तथ्य नहीं हैं जिनके आधार पर इन नेताओं के खिलाफ मामला बनता हो। कई आरोप तो बेहद बेतुके हैं। कुछ आरोपों से ऐसा लगता है कि इन नेताओं से जानबूझकर दुश्मनी साधी जा रही है।

अगर ये नेता सुरक्षा और व्यवस्था के लिए खतरा हैं तो पहले ही इन्हें पीएसए के तहत गिरफ्तार क्यों नहीं किया गया? इन नेताओं के पहले के कार्यों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। फिर सवाल यह उठता है कि मौजूदा केंद्र सरकार इन नेताओं से पहले बातचीत क्यों कर रही थी और इनमें से कुछ लोगों के साथ मिलकर सरकार क्यों चला रही थी? इन सवालों को कोई भी ढंग का जवाब सरकार की तरफ से नहीं आ रहा है। इससे पता चलता है कि इन नेताओं पर लगाए आरोप गंभीर जांच पर आधारित नहीं हैं। इससे पता चलता है कि केंद्र सरकार विपक्षी आवाजों को जम्मू कश्मीर में जानबूझकर दबाने की रणनीति पर काम कर रही है। प्रधानमंत्री ने भी नजरबंदी को यह कहते हुए जायज ठहराने की कोशिश की है कि इनके कुछ बयान अस्वीकार्य हैं। अस्वीकार्यता की परिभाषा अगर यह है कि सरकार को अपने विरोध की बात पसंद नहीं है तो फिर राजनीतिक विपक्ष की पूरी अवधारणा ही दिखावटी साबित हो जाएगी।

ऐसा करने से कश्मीर में स्थापित लोकतांत्रिक राजनीतिक ताकत खत्म हो जाएगी। इससे कश्मीर के लोगों से लोकतांत्रिक विचार-विमर्श की संभावना भी खत्म होती जाएगी। ऐसा रास्ता अपनाने का क्या मतलब है जिससे राजनीतिक खालीपन पैदा हो? अगर सिर्फ कानून व्यवस्था की दृष्टि से भी देखें तो यह सही नहीं लगता।

एनसी और पीडीपी जैसी पार्टियां लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होती रही हैं। ऐसे में इस रास्ते को बंद करना ठीक नहीं होगा। खास तौर पर ऐसे वक्त में जब अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाने और दो केंद्र शासित प्रदेश की घोषणा के बाद अविश्वास का माहौल बना हुआ है। इससे लोगों में बेवजह और संदेह पैदा होगा। जबकि यही पार्टियां लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में शामिल होकर लोगों में विश्वास जगाने का काम करेंगी। दिखावटी शांति की बात दुनिया भर में करना ठीक नहीं है। सरकार को समस्याओं का समाधान ईमानदारी और पारदर्शिता से करने की कोशिश करनी चाहिए।

अगर जम्मू और कश्मीर में सब कुछ सामान्य है तो फिर सरकार विपक्ष को काम क्यांे नहीं करने दे रही है? अगर सरकार के दावे सही हैं तो इन विपक्षी नेताओं को जन समर्थन नहीं मिलना चाहिए। अगर ये सही है तो फिर सरकार को कैद में रखे गए नेताओं की क्षमताओं से डरने की कोई जरूरत नहीं है। अगर सरकार के दावे सच हैं तो क्या यहां के लोग नए कश्मीर या नए भारत के लिए वोट नहीं देंगे?

हालांकि, स्थिति सामान्य होने के हर दावे के बीच सरकार को सच्चाई मालूम है। सरकार अपने कदमों में सुधार को स्वीकार तक नहीं कर रही है। एक ईंच भी पीछे नहीं हटने की रणनीति इस सरकार ने शुरुआत से अपनाई है। इसलिए अपवाद के तौर पर इस्तेमाल होने वाले कानूनों का भी सहारा लिया जा रहा है। इन परिस्थितियों में जम्मू और कश्मीर के एक नेता की यह मांग गैरवाजिब नहीं लगती कि पूरे जम्मू कश्मीर को ही जेल घोषित कर देना चाहिए।

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