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दिल्ली चुनावों में स्थानीय और सार्वभौमिक

राजनीति में अस्पष्टता जरूरी है लेकिन इससे नैतिक तौर पर स्वस्थ्य समाज का निर्माण नहीं होता

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की कामयाबी की कई तरह से आलोचनात्मक व्याख्याएं हुई हैं। जो लोग खुद को ‘कट्टर धर्मनिरपेक्ष’ मानते हैं, उन्हें कुछ ऐसी बातों को लेकर आपत्ति है जो ‘राजनीतिक तौर पर असहज’ करने वाली हैं। कुछ मसलों पर आप के रुख से इस तरह की आलोचना हो रही है। खास तौर पर शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन को लेकर। इसमें आप ने कोई स्पष्ट पक्ष नहीं लिया। इनमें से कुछ टिप्पणीकार यह मानते हैं कि राजनीतिक दलों को और स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

कुछ लोगों को यह बात खतरनाक लग रही है कि धर्मनिरपेक्षता के मसलों पर आप जानबूझकर कम बोलती है। ताकि धार्मिक मसले चुनाव प्रचार से बाहर रहें। माना जाता है कि ऐसा करके आप भारतीय जनता पार्टी की धार्मिक मुद्दों को उठाने की रणनीति को पटखनी देने की योजना पर काम कर रही थी।

यह भी कहा जा रहा है कि आप भी अंततः उसी तरह की भाषा अपना लेगी और अपनी ही रणनीति का शिकार हो जाएगी। धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाले कुछ लोग यह मानते हैं कि आप नरम हिंदुत्व की ओर बढ़ रही है। आप हिंदू प्रतीकों का इस्तेमाल करके अपने नेताओं की असहजता को कम करना चाहती थी। हाल के दिल्ली चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत भी बढ़ा। लेकिन फिर भी आप का मत प्रतिशत सबसे अधिक रहा और इसे सबसे अधिक सीटें मिलीं। लेकिन आप की इस जीत के कुछ प्रभाव भी हैं। पहली बात यह कि भाजपा के नेता ही मान रहे हैं कि आप के नेताओं के खिलाफ आतंकवादी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना और उत्तेजना पैदा करने वाले भाषण देने का नुकसान हुआ। जबकि आप की परहेज की रणनीति कामयाब साबित हुई। इससे अब भाजपा को लगा कि उत्तेजना पैदा करने वाली भाषा के इस्तेमाल से नुकसान भी हो सकता है। तो क्या भाजपा इससे कोई सबक लेगी? इसका जवाब भाजपा को छोड़कर कोई और नहीं दे सकता। भविष्य के चुनावों में भाजपा की रणनीति से इसका पता चलेगा।

आप के नेताओं ने यह स्पष्ट तौर पर नहीं बताया है कि भ्रम की स्थिति उन्होंने जानबूझकर चुनावी लाभ के लिए पैदा की थी। लेकिन यह भी एक सवाल है कि आप ने एक धर्म के प्रतीकों का इस्तेमाल किया। आप के नेताओं ने भाजपा के हिंदुत्व से संबंधित मुद्दों में नहीं शामिल होने की रणनीति अपनाई।

कुछ लोग आप की कामयाबी को स्थानीय मुद्दों में सीमित कर रहे हैं। ये लोग इसके अखिल भारतीय पार्टी होने की संभावनाओं को खारिज कर रहे हैं। लेकिन इस तरह से किसी पार्टी के प्रभाव को सीमित करते हुए हम एक गलती कर रहे हैं। आप ने दिल्ली में न सिर्फ 70 में से 62 सीटों पर जीत हासिल की है बल्कि भाजपा के सांप्रदायिक धु्रवीकरण की रणनीति को भी परास्त किया है। भाजपा यह रणनीति राष्ट्रीय स्तर पर अपना रही है।

हमें यह भी समझना होगा कि स्थानीय मुद्दों की ताकत ने भारत में संकीर्णता को बढ़ावा देने वाली परियोजना को पटखनी दे दी। आप की जीत से ये भी पता चलता है कि स्थानीय सच्चाइयों से दुष्प्रचार को हराया जा सकता है। इस संदर्भ में आप को स्थानीय या प्रांतीय स्तर पर सीमित करना ठीक नहीं है।

हालांकि, आप से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वह भ्रम का इस्तेमाल नहीं करेगी। क्योंकि इससे विचारधारा की अनदेखी होती है। आप को उस सच्चाई के साथ रहना चाहिए जिसमें विकास की बात हो और जिससे लोगों के जीवन में अमन आ सके। ये मुद्दे सिर्फ दिल्ली के लोगों से जुड़े हुए नहीं हैं। ये धर्मनिरपेक्षता और सार्वभौमिकता से जुड़े हुए हैं। स्थानीय चुनावी परिदृश्य में सार्वभौमिक सिद्धांत निहित हैं और इसने सांप्रदायिक विचारधारा को परास्त करने का काम किया है।

 
 
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