दिल्ली में चुनाव प्रचार अभियान का स्वर

चुनाव प्रचार अभियान के दो माॅडलों में से चुनावी जीत किसे हासिल होगी?

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

दिल्ली विधानसभा चुनावों में विचारधारा के स्तर पर विरोध के बीच जनता की आवाज को सुन पाना मुश्किल है। मुकाबला राजनीति के दो माॅडलों के बीच है। एक माॅडल के तहत पड़ोस की राजनीति की जा रही है। जिसमें रोजमर्रा की सेवाओं की आपूर्ति उचित कीमत पर करने की बात कही जा रही है। दूसरे माॅडल के मूल में धार्मिक राष्ट्रवाद है। विकास और धार्मिक राष्ट्रवाद का संघर्ष चुनाव नजदीक आने के साथ गहराता जा रहा है।

चुनाव प्रचार अभियान की शुरुआत में आम आदमी पार्टी मजबूत दिख रही थी। जमीनी रिपोर्ट से यह बात सामने आई है कि पिछले पांच साल में इस पार्टी ने अपने वादों को निभाया है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इसने उल्लेखनीय कार्य किए हैं। आप के कार्यकाल में सरकारी स्कूलों को नई विश्वसनीयता हासिल हुई है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में मोहल्ला क्लिनिक का प्रयोग सफल साबित हुआ है। इसका अनुकरण कुछ और राज्यों में हो रहा है। दिल्ली का मध्य वर्ग भी इन सेवाओं का लाभ ले रहा है। मोदीकेयर और मोहल्ला क्लिनिक के बीच चल रहा विमर्श बेकार है। क्योंकि मोदीकेयर अभी काल्पनिक है जबकि मोहल्ला क्लिनिक का अनुभव लोग ले रहे हैं।

आप ने हाशिये के लोगों के बीच अपनी स्थिति मजबूत की है। अब इनके बीच दूसरी पार्टी के लिए जगह बनाना अभी मुश्किल लग रहा है। ये लोग हिंदू राष्ट्रवाद के नारों से प्रभावित नहीं दिख रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने इन्हें अपने पाले में लाने के लिए अनाधिकृत काॅलोनियों को नियमित करने का काम किया लेकिन इसका लाभ भी उसे मिलता नहीं दिख रहा।

दिल्ली चुनाव में बिहार और उत्तर प्रदेश के पूर्वांचली मतदाताओं की भी अहम भूमिका होती है। पिछले 25 सालों में इनकी संख्या काफी बढ़ी है। भाजपा के समर्थकों में मुख्य तौर पर वे हिंदू हैं जो बंटवारे के बाद आए हैं और छोटे कारोबारी हैं। भाजपा के इस पारंपरिक वोट बैंक और पूर्वांचली मतदाताओं के बीच हितों का टकराव है। पूर्वांचल के लोगों को कांग्रेस और भाजपा दोनों ने नजरंदाज किया है। आप ने इन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिया। भाजपा अब इन्हें अपने पाले में लाने के लिए मनोज तिवारी को मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की सूची में शामिल दिखाने की कोशिश की है। लेकिन भाजपा में नेता का चयन आसान नहीं होने जा रहा।

विकास के मुद्दे पर पिछड़ती भाजपा नए मुद्दों पर चुनाव प्रचार को लाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए भाजपा नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों को हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी कह रही है। पार्टी ने मोदी ब्रांड के राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति के लिए ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ का ब्रांड खड़ा किया है। भाजपा को ‘देश के गद्दारों को. . .’ जैसे नारे गढ़ने पड़ रहे हैं। इससे न सिर्फ लोग भ्रमित हो रहे हैं बल्कि हिंसा की भी स्थिति पैदा हो रही है।

दोनों पार्टियों के लिए शाहीन बाग एक मुद्दा बन गया है। किसी को नहीं पता कि इससे लाभ किसे होगा। अरविंद केजरीवाल ने वहां जाने और इनका समर्थन करने का निर्णय नहीं लिया। क्योंकि उन्हें डर था कि भाजपा उन्हें भी टुकड़े-टुकड़े गैंग का सदस्य ठहराने की कोशिश करेगी। कांग्रेस खुलकर इस प्रदर्शन का समर्थन कर रही है।

दिल्ली में चार तरह के मतदाता हैं। पहली श्रेणी में पार्टी के कैडर के लोग हैं। जो पूरी तरह से पार्टी के प्रति प्रतिबद्ध हैं। दूसरी श्रेणी नेटवर्क मतदाताओं की है, जो किसी खास पार्टी के समर्थक नहीं हैं। ये लोग मुद्दों के आधार पर प्रभावी पार्टी को वोट देते हैं। तीसरी श्रेणी उन मतदाताओं की है जो पार्टी कार्यकर्ताओं से प्रभावित होकर मुद्दों के आधार पर वोट देते हैं। अंतिम श्रेणी उन मतदाताओं की है जो अनिर्णय की स्थिति में हैं और आखिरी के दो दिन में निर्णय लेते हैं। 2015 में भाजपा की हार की वजह यह बताई गई थी कि कैडर ने तो पार्टी को वोट दिया लेकिन दूसरे मतदाताओं को प्रभावित करने का काम नहीं किया।  इसकी एक वजह यह हो सकती है कि मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी कार्यकर्ताओं से संवाद स्थापित करने में नाकाम रही हों।

अभी की स्थिति में राजनीतिक पर्यवेक्षक बता रहे हैं कि आप को बढ़त हासिल है क्योंकि पार्टी का विमर्श विकास पर आधारित है। वहीं विपक्ष इसे गलत साबित करने में लगा हुआ है। इस चुनाव में दिल्ली के मतदाताओं की राजनीतिक सजगता और दूरदर्शिता की भी परीक्षा होनी है।

 
 

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Biden’s policy of the “return to the normal” would be inadequate to decisively defeat Trumpism.