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एनआईए के हाथ में एल्गार मामला

एल्गार मामले को एनआईए के हाथ में देकर महाराष्ट्र सरकार की प्रशासनिक क्षमताओं को कम करके आंका गया है

 

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24 जनवरी को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एल्गार परिषद मामले को महाराष्ट्र पुलिस के हाथों से लेकर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण यानी एनआई को देने का निर्णय लिया। इससे पता चलता है कि कैसे एनआईए राज्यों के मामलों में दखल देकर संघीय भावना के प्रतिकूल काम कर रही है। इसके जरिए भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार राज्यों से टकराव के रास्ते पर भी बढ़ रही है। केंद्र सरकार ने यह निर्णय उस समीक्षा बैठक के तुरंत बाद लिया जिसमें राज्य के उपमुख्यमंत्री और गृह मंत्री ने इस मामले में हुई प्रगति का जायजा लिया। प्रदेश के गृह मंत्री ने यह भी कहा कि इस मामले को राज्य सरकार से लेने के पहले प्रदेश सरकार से कोई बातचीत नहीं की गई। सवाल यह उठता है कि प्रदेश के एक मंत्री द्वारा उसके तहत आने वाले मामले की समीक्षा से केंद्र सरकार इतना नाराज क्यों हो गई? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि एल्गार परिषद और भीमा कोरेगांव मामले में पिछली सरकार के रुख को लेकर मौजूदा सरकार सवाल उठा रही है।

पिछले महीने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार ने इस बात पर चिंता जताई थी कि एल्गार परिषद मामले में अब भी नौ सामाजिक कार्यकर्ताओं और वकीलों को पुणे पुलिस ने कैद में रखा है। उन्होंने इस मामले की एसआईटी जांच की मांग की थी। साथ ही पुरानी सरकार की जांच पर उन्होंने शंका जताई थी। पवार के बारे में यह भी कहा गया कि इस संदर्भ में उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा है। प्रदेश के दो मंत्रियों की बैठक को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। एसआईटी जांच की संभावना से भाजपा में हड़कंप मचा हुआ है। इसलिए इस मामले को राज्य सरकार के हाथ से ले लिया गया है। पूर्व मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार के इस निर्णय को जोरदार समर्थन किया है? ऐसे में किसी को भी यह आश्चर्य हो सकता है कि पूर्व मुख्यमंत्री को अगर अपने कार्यकाल में हुई जांच पर भरोसा होता तो वे फिर इस निर्णय का इतना समर्थन क्यों करते।

अब तक पुणे पुलिस ने इस मामले में दो आरोप पत्र दाखिल किए हैं। जो दो बड़े आरोप इस मामले में लगे हैं, उनके पक्ष में कोई साक्ष्य नहीं दिया गया है। इसमें पहला आरोप है प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचना और भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़काना। 1 जनवरी, 2017 को उस वक्त के मुख्यमंत्री ने विधानसभा में जो बयान दिया था, उसमें भी उन्होंने भीमा कोरेगांव की हिंसा के लिए एल्गार परिषद को जिम्मेदार नहीं मानकर इसमें हिंदुत्ववादी संगठनों की भूमिका की बात की गई थी। पुणे ग्रामीण पुलिस की जांच भी इसी तरफ बढ़ रही थी। इसलिए एल्गार परिषद से संबद्ध और असंबद्ध लोगों को भीमा कोरेगांव हिंसा से जोड़ने को हिंदुत्ववादी संगठनों पर लग रहे आरोपों से ध्यान भटकाने की कोशिश के तौर पर देखा गया। एसआईटी की निष्पक्ष जांच भाजपा की भूमिका उजागर करती। इससे पता चलता है कि पूरे मामले को राजनीति से प्रभावित होकर अलग रंग दिया गया।

प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश के संबंध में पुणे पुलिस के आरोपपत्र में क्या साक्ष्य हैं, उसकी जानकारी 2018 में एक प्रेस वार्ता में लीक हुई। उच्चतम न्यायालय के जज और बाॅम्बे उच्च न्यायालय के एक जज ने पुलिस की इस कार्रवाई से असहमति जताई। इसमें यह बात भी कही गई कि उच्चतम न्यायालय की निगरानी में एसआईटी जांच होनी चाहिए। इसलिए एसआईटी जांच की हालिया मांग को राजनीति से प्रेरित कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। बल्कि इसे निष्पक्षता की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन पुणे पुलिस के रुख को शहरी नक्सल के विमर्श को मजबूती देने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है। इस मामले को केंद्र सरकार की एजेंसी के हाथ में लेना जांच को इसी दिशा में बरकरार रखने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।

इस मामले को एनआईए के हाथ में जाने के बावजूद महाराष्ट्र की तीन पार्टियों वाली सरकार अब भी भीमा कोरेगांव हिंसा की जांच कर सकती है और इसके दोषियों को सजा दिला सकती है। यह सरकार एल्गार परिषद मामले की जांच राजनीति से प्रेरित होकर करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकती है। अगर ऐसा होता है तो इसके पहले की सरकार और पूर्व मुख्यमंत्री के कदमों पर सवाल खड़े होंगे। इससे मामले को केंद्र सरकार के हाथ में लेने के पीछे की राजनीतिक सोच का पता चलता है। इसका न्यायिक संदर्भ में बहुत उपयोग तो नहीं है लेकिन इससे भाजपा के विरोध में नैतिक ताकत को मजबूती मिलेगी।

 
 

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