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खाद्यान्न महंगाई

खाद्यान्न की कीमतों में अभी की महंगाई कृषि में आपूर्ति प्रबंधन की संरचनात्मक समस्या से संबंधित है

 

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दिसंबर, 2019 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में 14.12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई। यह पिछले छह साल में सबसे अधिक है। इससे खुदरा मूल्यों में तेजी देखी जा रही है। हालांकि, कोर महंगाई दर अब भी 2 से 6 फीसदी के रिजर्व बैंक के दायरे में है। यह केंद्रीय बैंक के लिए भ्रम की स्थिति है। क्योंकि इस संदर्भ में भी देखा जाए तो देश की कई आर्थिक समस्याएं जस की तस हैं।

भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत सरकार के वित्तीय घाटे के पिछले दो साल के आंकड़ों में गड़बड़ी है। कहा गया है कि इसमें घाटे को 1.5 से 2 फीसदी कम करके दिखाया गया है। राष्ट्रीय छोटी बचत कोष से लिए गए कर्ज का उल्लेख इसमें नहीं है। इस आधार पर अगर इस रकम को निकालें तो यह तकरीबन 1.5 लाख करोड़ रुपये होता है।

खाद्यान्न पर भारत की सब्सिडी छह साल में दोगुनी हो गई है। 2019-20 के बजट में इस मद में 1.84 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी का प्रावधान था। जबकि भारतीय खाद्य निगम का पुराना बकाया ही 1.86 लाख करोड़ रुपये है। मौजूदा सरकार खाद्य सब्सिडी को बचत योजनाओं से उधारी में तब्दील कर रही है। इससे एफसीआई कर्ज के दुष्चक्र में फंसता जा रहा है। पिछले तीन साल में एफसीआई के इस तरह के कर्ज की हिस्सेदारी कुल बढ़े हुए कर्ज में 70 फीसदी है।

कोई यह कह सकता है कि सब्सिडी को इस तरह से पेश करने का काम करने वाली यह कोई इकलौती सरकार नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि यह काम इतने बड़े पैमाने पर पहले नहीं हुआ। वित्तीय घाटे के आंकड़े को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। इससे मौजूदा सरकार की खाद्यान्न प्रबंधन के प्रति सोच का पता चलता है। यह मान लिया गया है कि नई फसल आने के बाद आपूर्ति सुधरेगी और महंगाई काबू में आ जाएगी। यह बात प्याज की महंगाई के संदर्भ में सही हो सकती है जिसकी कीमतों में नवंबर, दिसंबर, 2019 में 200 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई। लेकिन गेहूं और दूसरे अनाजों की महंगाई के संदर्भ में यह बात सही नहीं साबित हो सकती।

अभी सरकार एफसीआई की 2.75 करोड़ टन की भंडारण बाध्यता से अधिक 4.58 करोड़ टन गेहूं का भंडारण कर रही है। चावल का बफर भी दोगुना कर दिया गया है। इस तरह से देखें तो भारत में अनाज आवश्यकता से अधिक है? फिर इसकी कीमतें क्यों बढ़ रही हैं? क्या सरकार जानबूझकर कीमतों में बढ़ोतरी करा रही है। ऐसे में कुछ चिंताएं उभरती हैं।

पहली बात यह कि एफसीआई द्वारा खरीद और भंडारण में होने वाला खर्च इसके वितरण से होने वाली आमदनी के 12 गुना या इससे अधिक है। गेहूं के लिए यह 3 रुपये प्रति किलो के मुकाबले 35 रुपये प्रति किलो और चावल के लिए 2 रुपये प्रति किलो के मुकाबले 25 रुपये प्रति किलो है। दूसरी बात यह कि बगैर किसी योजना के अनाज जारी करने से राजनीतिक लाभ तो होता है लेकिन वास्तविक लाभ नहीं हो पाता। तीसरी बात यह कि कर्जों को लेकर जो हेरफेर किया जा रहा है, उससे कई तरह के नुकसान होंगे। इससे राष्ट्रीय आय से संबंधित आंकड़ों को छिपाने का काम हो रहा है।

अगर किसी सरकार को इस व्यवस्था से इतने फायदे हों तो वह आपूर्ति की समस्याओं के सामधान के लिए क्यों कुछ करेगी? किसानों की आमदनी दोगुनी करना और अधिक मूल्य वाले फसलों के बढ़ावा देने के अलावा 2015 के शांता कुमार समिति की सिफारिशों को स्वीकार करने की बात चलती रहती है। लेकिन इसी वजह से इन पर ठोस काम नहीं होता।

दूसरी तरफ उपभोक्ताओं के अनुकूल काम करने वाली यह सरकार महंगाई को एक निश्चित दायरे तक सीमिति रखना चाहती है। लेकिन इस सरकार को यह समझना होगा कि स्वीकार्य सीमा उपभोक्ताओं पर बोझिल होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि लोगों के पास पैसे बच रहे हैं या नहीं। सरकार अपने फायदे के लिए इन बातों का गलत ढंग से इस्तेमाल कर रही है।

 
 

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