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इंटरनेट बंद किए जाने पर अदालती निर्णय

उच्चतम न्यायालय ने जम्मू कश्मीर में इंटरनेट बंद किए जाने की घटनाओं को बंद करने के लिए कोई कोशिश नहीं की

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अनुराधा भसीन मामले में उच्चतम न्यायालय ने जो फैसला दिया है, उसे पढ़ना परेशान करता है। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद वहां इंटरनेट बंद किए जाने पर यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में पहुंचा था। अदालत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कई बातों की चर्चा की जिसमें अभिव्यक्ति की आजादी, प्रेस की आजादी और अभिव्यक्ति के उपकरण के तौर पर इंटरनेट की उपयोगिता के साथ तार्किक व्यवस्था बनाए रखना शामिल रहे। लेकिन जो निर्णय आया, वह इन चर्चाओं के उलट था।

उदाहरण के तौर पर अदालत ने कहा कि सरकार के स्तर पर यह गलत है कि जिस आदेश के तहत जम्मू कश्मीर में इंटरनेट बंद किया गया, उस आदेश की प्रति वह उपलब्ध नहीं करा रही है। केंद्र सरकार की ओर से अदालत में बहस कर रहे साॅलिसिटर जनरल आॅफ इंडिया ने ‘विशेषाधिकार’ की बात कहते हुए यह बताया कि सरकार के लिए हर आदेश की प्रति उपलब्ध कराना संभव नहीं है। लेकिन वे यह साबित करने में नाकाम रहे कि ऐसा करने की अनुमति कानून देता है। जब विशेषाधिकार के दावे को छोड़ दिया गया तो ‘आदेश के नमूने’ प्रस्तुत किए गए।

लेकिन अदालत ने इस पर भी कुछ नहीं किया। साक्ष्यों के मामले में यह स्वीकार्य सिद्धांत है कि जिस पक्ष के पास दस्तावेज हो, वह उपलब्ध कराए। उपलब्ध नहीं कराने वाले पक्ष के प्रति अदालत एक नकारात्मक राय बनाती है। अगर सरकार ने इंटरनेट बंद करने के आदेश की प्रतियां नहीं उपलब्ध कराईं जो अदालत को यह मानना चाहिए था कि ऐसा कोई आदेश जारी ही नहीं हुआ कि और गैरकानूनी ढंग से इंटरनेट बंद कराया गया है। लेकिन अदालत ने ऐसा नहीं किया बल्कि सरकार से यह अनुरोध किया कि वह उस आदेश को प्रकाशित कर दे ताकि भविष्य में लोग अगर उसे चुनौती देना चाहें तो दे सकें।

अधिकारों, राष्ट्रीय सुरक्षा, मौलिक आजादी आदि मामलों पर भी अदालत ने सरकार के रुख को खारिज किया। लेकिन याचिकाकर्ता को कोई भी सार्थक राहत अदालत ने नहीं पहुंचाई। अदालत ने जो ‘निर्देश’ सरकार को जारी किए, उनमें सरकार के लिए समय की कोई सीमा नहीं निर्धारित की गई। आदेश के पालन से संबंधित बात को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। आदेश की इसी अस्पष्टता का लाभ सरकार ने जम्मू कश्मीर के कुछ क्षेत्रों में इंटरनेट और कुछ खास वेबसाइटों को गैर प्रतिबंधित करने का निर्णय लिया।

अदालत के इस आदेश को पढ़कर यही लगता है कि यह कोई नीति दस्तावेज है, जिसमें इंटरनेट बंद किए जाने पर विस्तार से चर्चा है और इसमें सरकार के लिए कुछ सिफारिशें हैं। यह आदेश कहीं से भी न्यायपालिका का वैसा आदेश नहीं दिखता जिसके जरिए सरकार की कार्रवाई को रोकने की कोशिश की गई हो। इस तरह का निर्णय या तो मिलीभगत है या फिर कायरता। पाठक इस बारे में अपनी राय बना सकते हैं।

भारत में इंटरनेट पर जितना प्रतिबंध लगता है, उतना किसी और देष में नहीं लगता। कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो जम्मू कश्मीर में पांच महीने से इंटरनेट बंद है। इसके लिए अपराध प्रक्रिया संहिता, 1974 की धारा-144 और टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 की धारा-7 के तहत बनाए दूरसंचार सेवाओं के अस्थाई निलंबन संबंधित नियमों को आधार बनाया जाता है। ये दोनों कानून साम्राज्यवादी पृष्ठभूमि वाले हैं, इसलिए इंटरनेट बंद करने का मामला कहीं गहरा मालूम पड़ता है।

भारत के बहुत सारे लोगों की जीवन का एक अहम हिस्सा इंटरनेट है। इस पर अब शहरी क्षेत्रों और मध्यम वर्ग के लोगों का एकाधिकार नहीं रहा। सस्ते पर मिलने वाले कनेक्शन और अलग-अलग भाषाओं में सामग्री की उपलब्धता की वजह से इंटरनेट इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या तकरीबन 50 करोड़ हो गई है। यह चीन के बाद सबसे अधिक है।

इंटरनेट की पहुंच में इस विस्तार से सरकार की क्षमता को लेकर कुछ सवाल उठते हैं। सरकार एक तरफ तो इंटरनेट के इस्तेमाल को बढ़ावा देती है लेकिन दूसरी तरफ इसके गलत उपयोग को रोकने और ऐसा करने वालों को दंडित करने की क्षमता नहीं विकसित करती। यही वजह है कि सरकार इंटरनेट बंद करने का निर्णय बार-बार लेती है। पुलिस और सरकारी मशीनरी इस प्रतिबंध को एक औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं। दूसरी बात यह कि गलत ढंग से भी इस तरह का निर्णय लेने का कोई परिणाम किसी को नहीं भुगतना पड़ता। अगर किसी व्यक्ति को इंटरनेट प्रतिबंधित किए जाने की वजह से कोई नुकसान होता है तो उसे राहत पहुंचाने की कोई व्यवस्था नहीं है।

अनुराधा भसीन मामले ने उच्चतम न्यायालय को एक अवसर दिया था कि वह इंटरनेट को प्रतिबंधित किए जाने पर नुकसान उठाने वालों के अधिकारों को लेकर कुछ कर सकती। असहमति जताने वाले समाज को सामूहिक तौर पर दंडित करने की इस व्यवस्था पर जवाबदेही तय करने के लिए कुछ दिशानिर्देश अदालत दे सकती थी। लेकिन जाॅर्ज बर्नाड शाॅ के शब्दों में कहें तो उच्चतम न्यायालय ने अवसर को गंवाने के अवसर का लाभ उठाया। जो खुद उसकी विश्वसनीयता और हमारे अधिकारों के लिए ठीक नहीं है।

 
 

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