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ट्रंप और तेहरान

युद्ध को लेकर अमेरिका की लोलुपता ने एक बार फिर से विश्व शांति के लिए खतरा पैदा कर दिया है

 

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अमेरिका की ओर से 3 जनवरी को किए गए एक ड्रोन हमले में ईरान के इस्लामिक रिवाॅल्यूशनरी गार्ड काॅप्र्स यानी कुदस फोर्स के मेजर जनरल कासिम सोलेमानी और इराक के पोपुलर मोबलाइजेशन फोर्सेस के डिप्टी कमांडर अबु महदी अल-मुहांदिस की हत्या के बाद पश्चिम एशिया में हिंसा का नया दौर शुरू हो गया है। इस कार्रवाई के बाद डोनल्ड ट्रंप प्रशासन ने यह घोषणा कर दी है कि 2020 हिंसा का साल होगा। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने भी अनवर प्रांत के एन अल-असद और ईराक के इरबिल के अमेरिका बेस पर मिसाइल हमला शुरू कर दिया है।

हर तरह के अमेरिकी संभ्रांत वर्ग, चाहे वे लिबरल हों या कंजरवेटिव, अमेरिका की सैन्य श्रेष्ठता को लेकर दंभ में हैं और उन्हें लगता है कि दुनिया उनके नियमों से चलनी चाहिए। इसलिए अमेरिका से सैन्य परहेज की उम्मीद गलत होगी। पेंटागन ने शीत युद्ध के अंत के बाद से लगातार पश्चिमी एशिया का इस्तेमाल अपनी नवीनतम युद्ध तकनीक के परीक्षण के लिए किया है। 700 अरब डाॅलर के सैन्य बजट के साथ अमेरिका विश्व शांति को एक सपना ही रहने देगा। अमेरिका एक और हमले की तैयारी में है और पूरा विश्व पश्चिम एशिया में कूटनीतिक संभावनाओं को खत्म होते देख रहा है।

अमेरिका ने एक ऐसे विदेशी नेता पर हमला किया जिसे राजनयिक प्रतिरक्षा मिली हुई थी। ऐसा करना सैन्य नैतिकता के खिलाफ है। यह युद्ध को आमंत्रण देने जैसा है। देश केंद्रीत विश्व व्यवस्था ही ऐसे विदेशी नेताओं पर इस तरह के आक्रमण की छूट दे सकती है। 1907 के हेग कन्वेंशन के मुताबिक इसे ‘विश्वासघाती हत्या’ कहा जाएगा। ट्रंप प्रशासन नियम आधारित विश्व व्यवस्था को आघात पहुंचा रहा है और मध्ययुगीन हत्या आधारित व्यवस्था को बढ़ावा दे रहा है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने इसे यह कहकर सही ठहराने की कोशिश की है कि सोलेमानी लंबे काल खंड में हजारों अमेरिकियों को मारने के गुनहगार थे और वे ऐसी और हत्या करने की योजना पर काम कर रहे थे लेकिन पकड़े गए। फ्लोरिडा के पाम बीच के अपने रिसाॅर्ट से ट्रंप ने दावा किया कि यह हमला युद्ध को रोकने के लिए किया गया और अमेरिका कोई युद्ध शुरू करने का काम नहीं करता। लेकिन सच्चाई ये है कि अमेरिका एक बार फिर कूटनीतिक रास्तों को छोड़कर सैन्य रास्तों को अपना रहा है।

तेल संकट के बाद हेनरी किसिंजर ने अमेरिका के नेतृत्व वाला जो ‘मध्य-पूर्व व्यवस्था’ बनाई थी और तीसरी दुनिया के नेताओं ने 1970 के दशक के मध्य में जिस नई अंतरराष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की परिकल्पना की थी, उसकी धज्जियां उड़ गई हैं। ट्रंप ने अपनी रैलियों में पश्चिमी एशिया के युद्ध का विरोध किया था। लेकिन 2017 में उन्होंने अपना सुर बदल लिया। उन्होंने एकतरफा निर्णय करते हुए ईरान परमाणु समझौते से अमेरिका को अलग कर लिया। जेरूसलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता दे दी और अमेरिकी दूतावास को वहां ले गए। ईरान के लोगों पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए। ईरान के रिवाॅल्यूशनरी गार्ड काॅप्र्स को आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया। ये सब उकसाने वाले काम थे और इनके जरिए ईरान की ‘रणनीतिक धैर्य’ की परीक्षा ली गई।

अमेरिका और उसके क्षेत्रीय सहयोगी सीरिया में और आईएसआईएस के खिलाफ अपनी लड़ाई में ईरान के किसी तरह के सहयोग के खिलाफ हैं। क्योंकि अगर इस क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ेगा तो इससे अमेरिका के हितों पर नकारात्मक असर पड़ेगा। अमेरिका इस बात को लेकर चिंतित है कि इराक में राष्ट्रीय भावनाओं का उभार हो रहा है और वहां के लोग इराक की धरती से अमेरिकी सेना को हटाने की मांग कर रहे हैं।

यह हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र का सबसे गरीब देश यमन ईरान और सउदी के दुश्मनी के केंद्र में है। क्षेत्रीय एकता अमेरिका के हित में नहीं है। अमेरिका तेल का सबसे बड़ा निर्यातक बनना चाहता है। शिया-सुन्नी एकता वाला पश्चिम एशिया इजरायल के लिए भी ठीक नहीं है। 1970 के दशक में अमेरिका ने पश्चिम एशिया को विकासशील और गरीब देशों के समूह से अलग कर दिया। ताकि उनकी एकजुटता को तोड़ा जा सके। इस क्षेत्र में अपना अधिकार स्थापित करने के बाद अमेरिका अब इन्हें गरीब देशों में तब्दील करना चाहता है।

भूराजनीतिक सच्चाई यह है कि ईरान बगदाद से बेरुत तक एक पुल बनाना चाहता है। ताकि ईराकी, लेबनानी और सीरियाई बंदरगाहों के जरिए वह भूमध्यसागर तक पहुंच सके। अमेरिका, इजरायल और सउदी अरब इसे रोकना चाहते हैं क्योंकि अगर ऐसा हो गया तो अमेरिकी नौसेना द्वारा नियंत्रित क्षेत्रीय व्यापार खुल जाएगा। यहां इस बात का उल्लेख जरूरी है कि प्रथम विश्व युद्ध का एक कारण यह भी था कि जर्मनी बर्लिन से बगदाद तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना पर काम कर रहा था। इससे स्वेज नहर की उपयोगिता कम हो जाती।

अमेरिका और ईरान के बीच जिस तरह से तनाव बढ़ रहा है, उससे स्ट्रेट आॅफ होरमुज के बंद होने का खतरा पैदा हो गया है। तेल ढोने वाले विश्व के 20 फीसदी पानी जहाज इसी मार्ग से गुजरते हैं। अगर तेल की आपूर्ति बाधित होती है तो इससे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी होगी और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पैदा होंगी। पहले से ही आर्थिक सुस्ती का सामना कर रहे भारत के लिए इसका सामना करना मुश्किल होगा। भारतीय विदेश नीति निर्धारित करने वालों को ट्रंप प्रशासन से अपने अच्छे संबंधों का इस्तेमाल करते हुए इस युद्ध की स्थिति को शांति की ओर मोड़ना चाहिए। लेकिन यह तो तब होगा जब अमेरिका इसके लिए तैयार हो कि भारत मध्यस्थता करे।

 
 

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