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छात्रों के विरोध की बढ़ती लहर

नकाबपोशों द्वारा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आतंक बरपाने का मुकाबला नए उत्साह और एकता के साथ हो रहा है

 

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5 जनवरी, 2020 को कुछ नकाबपोश लोगों ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों और शिक्षकों पर निर्मम हमले किए। ये लोग परिसर में शांतिपूर्ण सभा कर रहे थे। इस हमले का लक्ष्य सिर्फ छात्रों और शिक्षकों पर शारीरिक हमला करना नहीं था बल्कि यहां भय और आतंक का एक माहौल कायम करना था। जेएनयू से जो तस्वीरें मीडिया में दिखाई गईं, वे कई सवाल खड़े करती हैं। इन तस्वीरों में तोड़-फोड़ किए गए कमरे दिख रहे हैं जिनमें टूटी-फूटी लकड़ी की आलमारियां हैं जिन पर किताबें रखी हैं। कमरे में दरी और कंबल बिखरे हैं। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन कमरों के बाहर भीमराव अंबेडकर की तस्वीर लगी थी या जिनके बारे में यह जानकारी थी कि इसमें खास सामाजिक पहचान वाले छात्र रहते हैं, उन पर जानबूझकर हमला किया गया।



स्पष्ट है कि जेएनयू के छात्र बहुत सुविधासंपन्न जीवन नहीं जीते हैं। लेकिन जेएनयू बौद्धिक स्तर पर एक व्यापक दायरा उपलब्ध कराने की सुविधा देता है। यहां विविध दृष्टिकोण के लिए स्थान रहा है। वामपंथ इनमें सिर्फ एक है। यहां की जिंदगी ऐसी होती है जिसमें गरिमा और उम्मीद है। यह एक ऐसा विश्वविद्यालय जो प्रशिक्षण से आगे जाकर छात्रों को शिक्षित करने में यकीन करता है। यहां के अधिकांश छात्र दूर-दराज के क्षेत्रों के पिछड़े वर्गों से आते हैं। जेएनयू खुले तौर पर विचार-विमर्श का अवसर मुहैया कराता है। इससे समाज में मानवतावाद और नैतिकता कायम होती है। जो लोग यहां रहते हैं, उनके लिए इसने एक सुरक्षित माहौल बनाया है। यह किसी भी विश्वविद्यालय के संचालन के लिए जरूरी है।



यहां छात्र छात्रावास के शुल्कों में बढ़ोतरी को लेकर दो महीने से भी अधिक वक्त से विरोध कर रहे हैं। ताकि शिक्षा का बाजारीकरण न हो और यह सभी वर्गांे की पहुंच में रहे। लेकिन समाधान की हर कोशिश की प्रशासन ने अनदेखी की। पहले भी जेएनयू के छात्रों को ‘देशद्रोही’ कहकर बदनाम करने की कोशिश की गई। इस तरह का हमला विश्वविद्यालय में तब भी हो गया जब सुरक्षा पर विश्वविद्यालय 17 करोड़ रुपये खर्च कर रहा है। यह पुस्तकाल के बजट से चार गुना है। पुराने सुरक्षाकर्मियों को हटाकर सेना से सेवानिवृत्त हुए लोगों को सुरक्षा के काम में लगाया गया। वहीं सरकारपरस्त शिक्षकों की नियुक्ति की गई। इससे पता चलता है कि परिसर में शक्ति प्रदर्शन की राह कैसे प्रशस्त की गई।



हमले की तस्वीरों में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के करीबी शिक्षकों और छात्रों की भूमिका दिख रही है। जिस तरह से इस हमले को अंजाम दिया गया उससे पता चलता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन की भी मिलीभगत थी। मौजूदा सरकार जो दमन का रास्ता अपनाती है, विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी वही रास्ता अपनाया। जिस संस्थान की सेवा का दायित्व उन पर था, उसी संस्थान पर वे हमला करा रहे हैं।



जेएनयू के घटनाक्रम को देखें तो पता चलता है कि यह हमला पूरी योजना के साथ किया गया। इसका संकेत केंद्रीय गृह मंत्री के दिसंबर, 2019 के दिल्ली के उस भाषण से भी मिलता है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ को सजा दी जाएगी। बड़ी संख्या में दिल्ली पुलिस तैनात थी लेकिन इनकी भूमिका मूकदर्शक वाली थी। क्योंकि हमला करने वाले बहुत आसानी से परिसर से निकल गए। लेकिन 9 जनवरी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों को पीटने के लिए पुलिस में हिम्मत आ गई।

Updated On : 24th Feb, 2020

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