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किसानों की कर्ज माफी की अदूरदर्शिता

बहुत गहरी जड़े जमाए हुए कृषि संकट से निपटने के लिए प्रभावी दीर्घकालिक समाधान करने होंगे

 

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किसानों के संकट का राजनीतिकरण होने की वजह से सरकारों के लिए किसानों की कर्ज माफी एक अनुकूल नीति बन गई है। बढ़ते कर्ज के दबाव और उचित मूल्य नहीं मिल पाने की वजह से किसान कर्ज माफी की मांग करते हैं। कृषि उत्पादों के मूल्यों में उतार-चढ़ाव से भी किसानों का संकट गहराता है। अनिश्चित मौसम की वजह से यह स्थिति और बिगड़ रही है।



महात्मा ज्योतिराव फुले किसान कर्ज काफी योजना की घोषणा महाराष्ट्र की महा विकास अघाड़ी सरकार ने की है। 1 मार्च, 2015 से 30 सितंबर, 2019 के बीच के दो लाख रुपये तक के कृषि कर्जों को इस योजना के तहत माफ किया जाना है। सरकार इस योजना को तीन से छह महीने के भीतर लागू करना चाहती है। जून, 2017 में महाराष्ट्र सरकार ने प्रदेश के 89 लाख किसानों को राहत पहुंचाने के लिए 34,044 करोड़ रुपये की कर्ज माफी की घोषणा की थी। उस वक्त किसान पूरे प्रदेश में प्रदर्शन कर रहे थे। लेकिन अर्हता शर्तों की जटिलता, आॅनलाइन प्रक्रिया और सरकार से बैंकों को अनियमित भुगतान किए जाने की वजह से यह योजना ठीक से लागू नहीं हो पाई। इससे कर्ज माफी का दावा करने की प्रक्रिया बेहद जटिल हो गई।



हालांकि, कर्ज माफी कृषि संकट के लिए एक बहुत कम समय का समाधान है। कई अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि कर्ज माफी का कोई खास सकारात्मक प्रभाव नहीं होता। इसलिए जरूरत इस बात की है कि ऐसी योजनाओं के लिए और बेहतर सोच अपनाई जाए। इसमें यह जरूरी है कि कर्ज माफी की योजनाओं को इस तरह से लागू किया जाए कि सीमांत, छोटे और मध्यम जोत वाले सभी किसान इसके दायरे में आ जाएं। 2006 से काम कर रहे केरल राज्य किसान कर्ज राहत आयोग इस संदर्भ में एक उदाहरण पेश करता है। इसके आधार पर एक समावेशी कर्ज माफी योजना बनाई जा सकती है। इसमें कृषि विशेषज्ञ, किसानों के प्रतिनिधि और पूर्व जज शामिल हैं। ये हर मामले पर अलग-अलग विचार करते हैं। ऐसी स्थायी व्यवस्था होने का लाभ यह है कि यह पूरी प्रक्रिया चुनावी चक्र से अलग हो जाती है।



हालांकि, कृषि संकट के समाधान के लिए और दीर्घकालिक कदमों की जरूरत है। ढांचागत बदलाव के बगैर संकट बना रहेगा। ऐसा इसलिए क्योंकि कर्ज माफी से कृषि लागत में बढ़ोतरी और मुनाफे में कमी की समस्या का समाधान नहीं होगा। कृषि संकट के गहराने का मूल वजह यही है। अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि कृषि कर्ज माफी से संस्थागत कर्ज लेने वालों के साथ-साथ आर्थिक तौर पर संपन्न किसानों को ही लाभ मिल पाता है। इससे ग्रामीण कर्ज की व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है। बैंकों की गैर निष्पादित संपत्तियां बढ़ती हैं। कर्ज माफी से सरकार के वित्तीय संसाधन पर भी बोझ बढ़ता है। इससे कृषि के क्षेत्र में होने वाला सरकारी निवेश भी प्रभावित होता है।



सूखा, लागत में बढ़ोतरी, उपज की उचित कमी नहीं मिलने और आमदनी कम होने की वजह से जो कृषि संकट पैदा हुआ है, उसका समाधान क्या कर्ज माफी से होगा। संकट इसलिए भी है क्योंकि सरकार की नीति महंगाई को काबू में रखने की है। इसमें किसानों के मुकाबले उपभोक्ताओं के हितों का अधिक ध्यान रखा जा रहा है। कृषि के क्षेत्र में ढांचागत बदलाव भी हुए हैं। मशीनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। फसलों का चक्र बदला है। नगदी फसलों और बागवानी के प्रति अधिक झुकाव है। इनमें अधिक निवेश होता है। किसान मूल्यों में उतार-चढ़ाव से अधिक प्रभावित हो रहे हैं। इस वजह से कर्ज के दुष्चक्र में फंसे रह रहे हैं।



कर्ज माफी जैसे उपाय से तत्काल तो थोड़ी राहत मिल जाएगी लेकिन इससे मूल समस्याओं का समाधान नहीं होगा। आमदनी में बढ़ोतरी नहीं होना और कृषि उत्पादन में कमी आना गांवों में इस समस्या को और गहरा बना रहा है। पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग में कमी आई है। इसमें गैर-कृषि क्षेत्र भी शामिल है। असंगठित क्षेत्र में आई मंदी की वजह से बेरोजगारी बढ़ी है और ग्रामीण मांग में कमी आई है।



इस संकट के समाधान के लिए वैसे नीतिगत निर्णय लेने होंगे जिससे उत्पादकता बढ़े, लागत घटे और स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक किसानों को उनके उत्पाद का उचित और लाभकारी मूल्य मिल सके। साथ ही संस्थागत कर्ज, जोतों को संगठित करना, सरकारी निवेश बढ़ाना, संस्थागत कृषि बीमा कार्यक्रमों को लागू करना और कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने जैसे उपाय भी जरूरी हैं। लेकिन इन ढांचागत उपायों की अनदेखी सरकारों ने लगातार की है। बेहतर तकनीक, शोध और भंडारण की सुविधा भी किसानों को सुनिश्चित करना जरूरी है। साथ ही बाजार की जमाखोरी रोकने और स्थिर आयात-निर्यात नीति की भी आवश्यकता है।

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