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उत्तर प्रदेश में ट्रायल पर कानून

पुलिस का आक्रामक और उकसाने वाला रवैया सभ्य समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है

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नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर को लेकर देश भर में विरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं। लेकिन जहां भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, वहां की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसात्मक रुख अपना रखा है। पुलिस फायरिंग में मौत की जो भी खबरें आई हैं, वे सभी भाजपा शासित राज्यों से हैं। हलांकि, इस पर कोई अफसोस दिखाने की जगह सत्ताधारी पार्टी और उसके समर्थकों ने इसे मजबूत नेतृत्व का परिचायक माना है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 19 दिसंबर, 2019 को खुलेआम ये बात कही कि प्रदर्शनकारियों से बदला लिया जाएगा। इसके बाद राज्य में पुलिस की बर्बरता लगातार देखी जा रही है। मनमाफिक गिरफ्तारियां हो रही हैं।



अब तक उत्तर प्रदेश में 19 लोगों की जान गई है। लेकिन सरकार इसकी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है। पहले तो पुलिस ने इस बात से इनकार किया कि उसने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की है और उलटे प्रदर्शनकारियों पर ही पुलिस ने आरोप मढ़े। लेकिन वीडियो फुटेज के रूप में प्रमाण सामने आने के बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई को स्वीकारा और इसे आत्मरक्षा के नाम पर सही ठहराने की कोशिश की। इंसानों की जान का नुकसान किसी भी सरकार की नाकामी की सबसे बड़ी कहानी कहते हैं। इसलिए यह जरूरी है कि कसूरवारों के खिलाफ सही ढंग से जांच हो और उन्हें सजा दी जाए। लेकिन उत्तर प्रदेश में ऐसा लगता है कि सरकार इनके बचाव में है। उत्तर प्रदेश पुलिस यह भूल गई है कि वह सैन्य सेवा नहीं बल्कि नागरिक सेवा वाली संस्था है।



बुलंदशहर में एक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या तब कर दी गई जब वह स्थिति को काबू में करने की कोशिश कर रहा था। उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का क्या हाल है, इसका अंदाज इस बात से ही लगाया जा सकता है कि स्थितियों को संभालने में लगे पुलिस अधिकारी की हत्या हो जाती है और अब पुलिस एक संप्रदाय के खिलाफ बदले की भावना से प्रेरित होकर भीड़ की तरह काम कर रही है। तीन दिनों के प्रशिक्षण के बाद बनाए गए पुलिस मित्र की संलिप्तता के बाद पुलिस पर झुंड की तरह बर्ताव करने की आशंका बढ़ जा रही है। इन पुलिस मित्र के बारे में यह संदेह व्यक्त किया जा रहा है कि इन्हें हिंदुत्व वाले संगठनों से नियुक्त किया गया है।



मुसलमानों को उकसाने का खुला प्रयास करते हुए उत्तर प्रदेश पुलिस ने घरों में तोड़फोड़ की, संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया और लोगों को गालियां दीं। लोगों को बेवजह गिरफ्तार किया गया। नाबालिगों को हिरासत में लेकर उनसे गलत व्यवहार किया गया। यह विडंबना ही है कि कानून के रक्षक ही इसके भक्षक बन गए हैं और उलटे ये प्रदर्शनकारियों से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। यह विश्वास करना मुश्किल है कि पुलिस इतना निरंकुश ढंग से बगैर राजनीतिक नेतृत्व के समर्थन के काम कर सकती है।



इन घटनाओं से पता चलता है कि मौजूदा सरकार के शासन काल में उत्तर प्रदेश एक पुलिस राज्य बनने की राह पर है। ऐसे राज्य में लोकतांत्रिक अधिकार स्थायी तौर पर निलंबित रहेंगे। यह तब दिखा जब वरिष्ठ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी की गई। उन पर बेबुनियाद गंभीर आरोप लगाए गए। कुछ को तो पीटा भी गया। उन्हें उनके बुनियादी अधिकारों से वंचित किया गया। इन गिरफ्तारियों से पता चलता है कि हाशिये के लोगों के लिए जो लोग संघर्ष करेंगे, उन्हें पुलिसिया कार्रवाई का उतना ही अधिक सामना करना पड़ेगा।



उत्तर प्रदेश सरकार की कार्रवाई से मुसलमानों का वह डर सच साबित होता जा रहा है जिसमें उन पर दोयम दर्जे के नागरिक होने का खतरा मंडरा रहा है। उन्हें जीने का हक, शांतिपूर्ण सभा और विरोध जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। कुछ मामलों को छोड़ दें तो अधिकांश मामले तो सामने आ भी नहीं रहे हैं। अगर आ भी रहे हैं तो उन पर पूर्वाग्रह हावी हैं। भय और दमन की इस तरह की भावना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। इसलिए यह जरूरी है कि समाज के हर वर्ग से सरकार से जवाब मांगा जाए और समाज के सभी वर्ग के लोग लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए खड़े हों। उत्तर प्रदेश की विपक्षी पार्टियों को लोगों की भावनाओं को गोलबंद करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सामाजिक ध्रुवीकरण एक स्थायी प्रवृत्ति न बन जाए।

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