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आदिवासियों की जमीन पर किसका कब्जा?

आदिवासियों की जमीन पर किसका कब्जा?
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

सदियों से आदिवासी समाज जिन अन्यायों का सामना कर रहे थे, उसे दूर करने के मकसद से 2006 में वन अधिकार कानून बनाया गया. अब इस समाज का वन अधिकार खतरे में है. उच्चतम न्यायालय ने राज्यों को यह आदेश दिया है कि उन लोगों को जंगल से बेदखल किया जाए जिनका वन अधिकार की मान्यता से संबंधित आवेदन खारिज कर दिया गया है. इस आदेश से 16 राज्यों के दस लाख से अधिक परिवार प्रभावित होंगे. यह संख्या और बड़ी हो सकती है. क्योंकि कई राज्यों ने अब तक अदालत को इस बारे में जानकारी नहीं दी है. यह अदालती आदेश एक गैरसरकारी संगठन वाइल्डलाइफ फस्र्ट और कुछ सेवानिवृत्त वन अधिकारियों की याचिका पर आया है. इसमें इन लोगों ने वन अधिकार कानून की वैधानिकता को चुनौती दी है. प्रेस में जाने के समय यह जानकारी मिली कि उच्चतम न्यायालय ने अपने इस आदेश पर रोक लगा दी है और सभी राज्यों से इस संबंध में विस्तृत जानकारी मंगाई है कि वन अधिकारों की मान्यता को खारिज करने के लिए क्या प्रक्रिया अपनाई गई. हालांकि, यह राहत अस्थायी ही लग रही है.
 
ऐसा पहली बार नहीं हुआ कि उच्चतम न्यायालय ने आदिवासियों को अपनी पैतृक जगह से हटने को कहा हो. ऐसे ही एक अदालती आदेश से 2002 से 2004 के बीच पूरे देश में आदिवासियों को अपनी जगह छोड़कर हटना पड़ा था. तीन लाख परिवारों को हटाए जाने की इस प्रक्रिया में हिंसा, मौत और विरोध की घटनाएं हुई थीं. हालिया आदेश से भी आदिवासी समाज के प्रति सरकार के सोच की झलक मिलती है. अगर सरकार के वकीलों ने आदिवासियों के हितों का बचाव किया होता तो यह आदेश अलग होता.
 
याचिका करने वाले आदिवासियों पर अतिक्रमण और जंगल नष्ट करने का आरोप लगाते हैं. वे इन्हें वन्यजीवों के लिए खतरा मानते हैं. लेकिन यह कितना सच है? साम्राज्यवादी सरकारी ने उनके वनाधिकार पर कब्जा जमा लिया था. इसके बावजूद कुछ बंदिशों के साथ उनके पास अधिकार रहा. आजादी के बाद एक नई वन नीति के तहत इस छूट को स्वभाविक अधिकार के तौर पर खत्म कर दिया गया. देश की एक तिहाई जमीन पर वन लगाने की इच्छा से आदिवासियों की खाली जमीन को भी वन विभाग ने अपने हाथ में लेना शुरू कर दिया. वन विभाग ने आदिवासियों की हजारों किलोमीटर जमीन पर कब्जा जमा लिया. बाद में वन्यजीव संरक्षण कानून, 1972 और वन संरक्षण कानून, 1980 के जरिए इस अतिक्रमण को और बढ़ाया गया. इससे यह स्पष्ट होता है कि इस मामले में सरकार ही अतिक्रमणकारी है.
 
अहम सवाल यह है कि क्या वन में आई कमी के लिए आदिवासी या जंगल में रहने वाले लोग जिम्मेदार हैं? आजादी के बाद से लगातार आदिवासी क्षेत्रों का दोहन खनन, औद्योगिकरण और बिजली, बांध, सड़क व रक्षा से संबंधित परियोजनाओं के जरिए किया गया है. इससे बड़े पैमानों पर जंगल नष्ट हुए हैं. साथ ही इससे बड़े पैमाने पर आदिवासियों को जंगल से बाहर निकाला गया है. उदारीकरण के बाद से आदिवासी क्षेत्रों में संसाधनों के दोहन के लिए देसी-विदेशी कंपनियां घुस आईं. इसके बावजूद यह विडंबना ही है कि आदिवासियों को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है! उन्हें नहीं जिम्मेदार ठहराया जा रहा जिन्होंने अपने फायदे के लिए न सिर्फ जंगलों को नष्ट किया बल्कि पर्यावरण और वन्य जीवों को भी नुकसान पहुंचाया.
उल्लेखनीय है कि आज भी आदिवासी इलाकों में वनों की स्थिति सबसे अच्छी है. इस तथ्य के आधार पर होना तो यह चाहिए कि वन और वन्यजीव संरक्षण के लिए जो तरीके सरकारी विभाग अपना रहे हैं, उन पर सवाल उठाए जाएं.
 
वन विभाग, इसके अधिकारियों और शहरी अभिजात्य पर्यावरणविदों को वन अधिकार कानून से शुरू से ही समस्या रही है. जिस तरह से इसे लागू किया गया, उसे लेकर भी कई शिकायतें की गईं. अधिकारों को मान्यता देने की प्रक्रिया के तीन चरण हैं. सबसे पहले दावे की सिफारिश ग्राम सभा करती है. इसे फिर सब-डिविजन के स्तर पर भेजा जाता है. इसके बाद इसे जिला स्तर पर भेज दिया जाता है जहां सिर्फ अधिकारी रहते हैं. यहीं पर दावों को खारिज करने का काम होता है. खारिज किए जाने का मतलब यह कतई नहीं होता कि आवेदन करने वाले का दावा सही नहीं है. आम तौर पर खारिज करने की प्रक्रिया एकतरफा होती है. इसमें ग्राम सभा की सिफारिशों को दरकिनार करने का काम कारोबारी दबाव में निजी फायदों के लिए किया जाता है. जनजातीय कार्य मंत्रालय ने खुद माना है कि बेबुनियाद बातों को आधार बनाकर भी ये दावे खारिज किए जा रहे हैं. दावे खारिज किए जाने पर लाखों अपील किए गए हैं लेकिन इनकी सुनवाई नहीं हो रही है. वन अधिकार कानून की धारा 4.5 में कहा गया है कि बगैर उचित प्रक्रिया को किसी को हटाया नहीं जा सकता लेकिन सरकारी अधिकारी खुद इसकी अनदेखी कर रहे हैं. कई मामलों में तो वन अधिकार के दावों को खारिज करने में वन अधिकार कानून के प्रावधानों की भी अनदेखी की गई है. आम तौर पर दावों को खारिज करने के लिए उपग्रहों से मिले नक्शों को आधार बनाया जाता है. जबकि कानून में यह स्पष्ट उल्लेख है कि इसकी पुष्टि के लिए जमीनी स्थिति का जायजा लेना अनिवार्य है.
 
जिस तरह से दशकों पुरानी याचिका पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय आया है उससे इस निर्णय में भी बहुत विश्वास नहीं जगता. सच्चाई तो यह है कि जज और वकील आदिवासियों से संबंधित मसले से वाकिफ नहीं हैं. संविधान आदिवासी समाज को अलग तरह से देखता है. ऐसे में यह जरूरी है कि जज और वकील आदिवासी समाज से जुड़े कानूनों को और अच्छे से समझें और साथ में संविधान बनाने वालों की उस भावना को भी समझें जिसके तहत संविधान में आदिवासियों को विशेष स्थान दिया गया है. इसे देश के विधि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए.

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