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विजयी भाव की सीमाएं

सिविल सोसाइटी की सोच को असैन्य बनाने के लिए जरूरी है सीमा पर शांति सुनिश्चित की जाए
 

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पुलवामा में जैश-ए-मोहम्मद द्वारा किए गए आतंकी हमले के जवाब में भारतीय वायु सेना की कार्रवाई पर दो अपेक्षित प्रतिक्रियाएं ही आईं. विपक्ष के नेताओं समेत देश के राजनीतिक वर्ग ने इस कार्रवाई के लिए भारतीय वायु सेना को बधाई दी. वहीं सत्ता पक्ष में आॅपरेशन बालाकोट को लेकर विजयी भाव मुखर रूप से दिखा. सत्ताधारी दल के प्रवक्ताओं ने कहा कि इस कार्रवाई के जरिए जनता की उस इच्छा का सम्मान किया गया है जो पुलवामा हमले के बाद यह चाहती थी कि इसका जवाब दिया जाए. दूसरी बात यह देखने को मिली कि अब मानवता को शर्मसार करने वाली घटनाओं को सबक देने के मसले पर सरकार और जनता एक ही तरह सोच रही है. सोच की इस समानता को प्रधानमंत्री ने व्यक्त किया, ‘आपके दिमाग में जो है, वही मेरे दिमाग में भी है.’ ऐसे में यह समझना जरूरी है कि जनता की इस जंगी मानसिकता का समाज में और देशों के बीच शांति और समरसता पर क्या असर पड़ सकता है.
 
कुछ सवाल हैं जिन्हें इस वक्त उठाना चाहिए. पहला सवाल तो यही है कि इस बात की क्या गारंटी है कि यह जंगी मानसिकता हमेशा देश के बाहर के ताकतों के खिलाफ ही काम करेगी और देश के अंदर लोगों के खिलाफ नहीं काम करेगी? क्या यह किसी भी सरकार का लोकतांत्रिक कार्य नहीं है कि अगर उसके यहां के लोगों में यह मानसिकता विकसित हो रही हो तो वह उसका समाधान करे?
 
पुलवामा के बाद जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, उससे तो यही लगता है कि जनता ने खुद सैन्य थिंक टैंक की जगह लेकर युद्ध, आक्रमण, साहस और निडरता के सवाल दे डाले. लोगों के दिमाग को सैन्य दिमाग में तब्दील कर दिया गया. हां, यह बात अलग है कि वे न तो सैन्य चिन्ह पहनते हैं और न ही सैन्य लिबास. इनके पास दूसरे हथियार हैं जिससे कश्मीर के लोगों में खौफ पैदा किया जाता है. कश्मीर के लोगों को आतंकवादियों से जोड़कर देखा जा रहा है. कुछ लोग तो इनके सामाजिक बहिष्कार तक की बात कर रहे हैं. देश के कुछ प्रतिष्ठित लोग भी ऐसी बातें कर रहे हैं. जबकि ये लोग संवैधानिक तौर पर देश में शांति और समरसता बनाए रखने के लिए जिम्मेदार हैं. सच्चाई तो यह है कि ये लोग कुछ खास समुदायों के खिलाफ हिंसा के पक्षधर हैं. सामाजिक बहिष्कार जैसे सुझावों से ये एक तरह से आम जनता की सोच और सैन्य सोच के बीच की दूरी को घटा रहे हैं. 
 
सैन्यीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे हिंसा की स्थितियां पैदा होती हैं. जबकि सिविल सोसाइटी की जिम्मेदारी अहिंसा, सहनशीलता और तार्किकता जैसे लोकतांत्रिक चीजों को बढ़ावा देने की है. सिविल सोसाइटी के लोगों को यह समझना होगा कि रक्षा बलों के पास किसी बाहरी खतरे से निपटने के लिए अपनी रणनीति, योजना और कूटनीति होती है. आम नागरिकों को उनकी यह भूमिका नहीं लेनी चाहिए. इसके बावजूद यह लगता है कि सिविल सोसाइटी के लोगों ने अपनी सीमाएं लांघी हैं और रक्षा बलों को यह सलाह दी है कि युद्ध ही एकमात्र रास्ता है. वे यहीं तक नहीं रुके हैं बल्कि अपने देशवासियों के खिलाफ ही अपना गुस्सा भी निकाला है.
 
विपदाएं कई बार विजयी भाव को प्रचार-प्रसार का अवसर बन जाती हैं. एक शांति प्रिय लोकतांत्रिक देश में, इस विजयी भाव की सीमाएं हैं.  ऐसे देश की सरकार को भी यह सोचना चाहिए कि इस तरह का भाव आम लोगों में स्थायी तौर पर न बैठ जाए. लेकिन मौजूदा भारत सरकार के खिलाफ समस्या यह है कि यह अक्सर लोगों में इस तरह का भाव बनाए रखना चाहती है.
 
जंगी राष्ट्रवाद से ‘राष्ट्रीय अवमान’ की स्थिति पैदा होने की भी आशंका बनी रहती है. इससे बदले की भावना बढ़ती जाती है. जंगी मानसिकता जब देश में बनी हुई हो तो इसके सम्मान के लिए सीमा पर तनाव बनाए रखना जरूरी हो जाता है. ऐसे में सीमा के दोनों तरफ बदले की भावना बनी रहती है. भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की सरकारों को इस सोच पर काबू पाने की दिशा में काम करना चाहिए. युद्ध का इतिहास हमें बताता है कि सैन्यीकरण मानवीय मूल्यों पर भारी पड़ने लगता है.
Updated On : 5th Mar, 2019

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