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कूटनीति ही आगे की राह है

भारत-पाकिस्तान रिश्तों में आए गतिरोध को दूर करने के लिए कूटनीतिक कदम उठाए जाने जरूरी हैं
 

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भारतीय लड़ाकू विमानों ने पिछले सोमवार को पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण कैंप पर कार्रवाई करने के लिए अपनी सीमा पार की. इस सफल हमले से भारत में पुलवामा हमले के बाद बने माहौल में लोगों के मन को थोड़ी राहत मिली. पुलवामा आतंकी हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 40 जवानों की जान गई थी. भारतीय वायु सेना की इस कार्रवाई की पूरे देश में वाहवाही हुई.
 
भारतीय रणनीतिक चिंतकों ने तुरंत यह निष्कर्ष निकाल लिया कि हवाई हमले एक प्रभावी माध्यम हैं खास तौर पर पाकिस्तान के संदर्भ में. क्योंकि पाकिस्तान के परमाणु संपन्न होने की वजह से उस पर दूसरे तरह की कार्रवाई को आसान नहीं समझा जाता. यह माना जा रहा था कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ा और कर्ज से डूबा पाकिस्तान जवाबी कार्रवाई नहीं करेगा. लेकिन देश में बना विजयी उत्साह उस वक्त ठंढा पड़ने लगा जब विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान की पाकिस्तानी सेना के कब्जे में होने संबंधित वीडियो सामने आने लगे. हालांकि, बाद में उन्हें पाकिस्तान ने वाघा सीमा के जरिए भारत को वापस सौंप दिया. इस गतिरोध के बीच दोनों देशों को अपनी कूटनीतिक कोशिशों को तेज करना चाहिए ताकि स्थिति सामान्य हो सके.
कूटनीतिक कोशिशों से दोनों देशों को अपने आंतरिक सवालों का सामना करने में सहूलियत होगी. उदाहरण के तौर पर भारत सरकार को यह समझना होगा कि विमुद्रीकरण के जरिए आतंकवाद के समाधान की बात बेबुनियाद साबित हुई. सीमा पर आतंकी गतिविधियों को देखते हुए यह बात पूरी तरह साबित हो गई है. इसके साथ ही भारत सरकार को यह भी स्वीकार करना होगा कि वह भारतीय अर्थव्यवस्था, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता से संबंधित बुनियादी समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रही है. पुलवामा हमले में खुफिया एजेंसियों की नाकामी और कश्मीर के अतिसंवदेनशील क्षेत्र में इतनी भारा मात्रा में आरडीएक्स आने से संबंधित नाकामियों पर सवाल दबकर रह गए हैं. जिस तरह की सैन्य भाषा का इस्तेमाल करके युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है, उससे इन बुनियादी सवालों पर लोगों का ध्यान ही नहीं जा रहा है.
 
हम अपने बनाए भ्रम में ही फंस गए हैं. सरकार कश्मीर और पाकिस्तान के संदर्भ में जिन राजनीतिक लक्ष्यों को हासिल करना चाहती है, उसमें दीर्घकालिक दृष्टि का अभाव है. सरकार के आलोचक मानते हैं कि मौजूदा सरकार तनाव की पक्षधर है, चाहे वह देश के अंदर हो या फिर सीमा पर हो. लेकिन कूटनीतिक प्रयासों के बगैर युद्ध में कूद जाना बुनियादी तौर पर गलत है. आंतरिक राजनीतिक महत्वकांक्षाओं के आधार पर विदेश नीति नहीं चलनी चाहिए. दक्षिण एशिया में परमाणु युद्ध के खतरों का अंदाजा कोई भी लगा सकता है. बगैर समझे कोई भी जोखिम लेना ठीक नहीं है. न ही किसी लाॅबी को यह छूट दी जानी चाहिए कि वह सरकार पर सैन्य खर्च बढ़ाने का दबाव बनाए. लोकतंत्र और युद्ध पर हुए कई अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि मतदाताओं के दबाव की वजह से लोकतांत्रिक नेता युद्ध में जाने से बचते हैं. ऐसे में युद्ध के पक्ष में माहौल बनाए रखना कोई अच्छी नीति नहीं है.
 
सरकार इस बात को मानने को तैयार नहीं है कि शक्ति के इस्तेमाल के अलावा दूसरे रास्ते भी हैं. पाकिस्तान के साथ स्थितियों में बदलाव के लिए दूसरे रास्ते भी उपलब्ध हैं. सालों से यह समझा गया कि कश्मीर की समस्या का समाधान सैन्य तरीकों से होगा. लेकिन इसने समस्या को और बिगाड़ने का ही काम किया है. हमें रणनीतिक तौर पर भारत-पाकिस्तान के बीच बने गतिरोध को दूर करने के लिए दूसरे विकल्पों पर भी सोचना होगा. मौजूदा गतिरोध और सैन्य कार्रवाई करने से नहीं दूर होगा. स्थितियों के शांत होने से सत्ताधारी पार्टी की चुनावी संभावनाएं चाहे जितनी भी प्रभावित हों लेकिन देश के राजनयिकों को अब अपने काम में लग जाना चाहिए.
 
तनाव और संघर्ष की स्थिति बने रहने से असंतोष और बढ़ेगा और इससे शांति नहीं स्थापित होगी. इस बात पर जोर देने की जरूरत है कि शांति बहाली और हितों की रक्षा के लिए कूटनीतिक तरीके अधिक कारगर हैं.

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