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कृषि विविधता से संबंधित उलझनें

कृषि विविधता को लेकर एनडीए का रवैया किसानों के कल्याण के उलट है

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राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए सरकार ने अंतरिम बजट में पशुपालन और मछली पालन से संबंधित प्रावधानों को देखकर लगता है कि एक समावेशी कृषि विविधता के अवसर को गंवा दिया गया. कृषि जीडीपी में पशुपालन की हिस्सेदारी 25 फीसदी और मछली पालन की हिस्सेदारी छह फीसदी है. अगर यह सरकार वाकई 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने को लेकर प्रतिबद्ध होती तो वह ज्यादा उपयोगी घोषणाएं करती. सच तो यह है कि आज किसानों की जो दुर्दशा है उसके लिए प्रकृति की अनिश्चितताओं के बराबर ही सरकार भी जिम्मेदार है. ऐसे में राष्ट्रीय गोकुल मिशन का आवंटन बढ़ाने और राष्ट्रीय कामधेनु आयोग बनाने की घोषणा भारतीय जनता पार्टी की हिंदी पट्टी में गाय राजनीति का ही हिस्सा है. इससे पशुपालन क्षेत्र में कोई खास विकास नहीं होगा. मछली पालन को लेकर एक अलग विभाग बनाने की घोषणा इस काम में लगे वर्ग को वास्तविक फायदा पहुंचाने के बजाए इस वर्ग के वोट बटोरने की कोशिश अधिक दिखती है.
 
दरअसल, तटीय क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे से संबंधित परियोजनाओं को लेकर सरकार ने जो नीति बनाई है, उससे मछुआरों की रोजी-रोटी पर संकट पैदा हो रहा है. ऐसे में एक अलग मंत्रालय बनाने भर से इनकी समस्याओं का समाधान कैसे होगा? जब मछुआरों से उनका रोजगार छीना जा रहा है तो उन्हें किसान क्रेडिट कार्ड और ब्याज दरों में दो फीसदी छूट का क्या लाभ होगा. खबरों में इस नीति से निर्यात में होने वाले फायदों की बात की जा रही है. 2000 के बाद से एक करोड़ रुपये से अधिक के कृषि कर्जों की संख्या बढ़ी है. इसका इस्तेमाल कृषि आधारित उद्योगों में हो रहा है. ब्याज दरों में छूट से भारत से होने वाला निर्यात इक्वाडोर, इंडोनेशिया और वियतनाम की प्रतिस्पर्धा का सामना करने में मदद मिलेगी. लेकिन ऐसी नीतियों का फायदा उन्हीं को मिल पाता है जो निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित कर पाते हैं.
 
प्रधानमंत्री ने यह कहा कि हम राष्ट्रीय उत्पादन में बढ़ोतरी से खेतों के स्तर पर उत्पादन में बढ़ोतरी की ओर बढ़ रहे हैं और इससे आमदनी बढ़ेगी. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या छोटे किसान उत्पादकता बढ़ाने के उपाय कर पाने में सक्षम हैं? कृषि कीमतों की नीति न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे लोकलुभावन कदमों से आगे नहीं बढ़ पाई है. लेकिन बढ़ी हुई एमएसपी किसानों को नहीं मिल पाती. क्योंकि सरकारी खरीद बड़े पैमाने पर नहीं हो पा रही है. 12 जून, 2014 को केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश देकर केंद्रीय भंडार के लिए खरीददारी को कम करके इसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत जरूरतों तक सीमित कर दिया है. वहीं दूसरी तरफ गैर अनाज क्षेत्र में कई तरह की खामियां हैं. इससे कीमतों का जोखिम बना रहता है. इसका सबसे ताजा उदाहरण महाराष्ट्र के डेयरी किसानों का है. कीमतों में आई तेज गिरावट से इनकी हालत खराब हो गई.
 
लेकिन यह विडंबना ही है कि नीतियों में आमदनी बढ़ाने के उपाय के तौर पर गैर-अनाज क्षेत्र में विविधता की सलाह दी जाती है. लेकिन इस तरह के अधिक कीमत वाली चीजों का उत्पादन जब किसान करते हैं तो इनकी कीमतों पर सिर्फ 20 फीसदी ही किसानों का नियंत्रण रहता है. 80 फीसदी नियंत्रण उनके हाथों में होता है, जो अधिक जोखिम ले सकते हैं. उल्लेखनीय है कि बाजार में दूध की कीमतों में इसलिए कमी आई क्योंकि प्रसंस्करण कंपनियों ने पाउडर बनाने के लिए दूध की खरीद बंद कर दी ताकि वे पहले से बने दूध के पाउडर बेच सकें. बड़ी कंपनियों में कीमतों को लेकर जो प्रतिस्पर्धा चली उससे छोटे खिलाड़ी बाजार से बाहर हो गए. अगर बाजार से संबंधित सुधार नहीं किए जाते तो फिर उत्पादन बढ़ाने का क्या फायदा होगा?
एनडीए ने जो एग्रीकल्चर प्रोड्यूस ऐंड लाइवस्टाॅक मार्केटिंग कानून बनाया है उससे किसानों के हितों की रक्षा होती नहीं दिखती. उदाहरण के लिए शोषण करने वाले आढ़तियों की व्यवस्था खत्म नहीं की गई है. कानून के तहत मंडी से बाहर सुपरमार्केट, निर्यातकों और कारोबारियों द्वारा की जा रही खरीद को भी नियंत्रित नहीं किया जा रहा है. कैसे इस कानून के तहत निजी कारोबारियों के लिए एमएसपी पर खरीद को अनिवार्य किया जा सकता है? क्यों फसल और पशुपालन को एक ही कानून के दायरे में रखा गया है? 
 
अब जब चुनाव नजदीक हैं तो ग्रामीण मतदाता परेशान हैं. ऐसे में राजनीतिक तौर पर यह उपायोगी है कि उन्हें भावनाओं की राजनीति के जरिए प्रभावित करने की कोशिश हो. क्योंकि कोई परिणामकारी नीति लोगों के सामने रखने के लिए नहीं है. भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों के तहत अनुच्छेद-48 में पशुओं के संरक्षण से संबंधित विवादित मुद्दे को अनसुलझा छोड़ दिया गया है. इन बातों को आधार बनाकर सामाजिक-आर्थिक भावनाओं को उभार दिया जा सकता है. इससे लोगों को पशुपालन आधारित रोजगार के आर्थिक पक्षों और आमदनी की अनिश्चितता से संबंधित सवाल सरकार से पूछने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.

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