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मिलावटी सरकार’ के बचाव में

शुद्धता को लेकर भाजपा की ओर से जो भी बेतुके दावे किए जा रहे हैं, वे बताते हैं कि लोकतंत्र में कितनी मिलावट हो गई है
 

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विपक्षी एकजुटता को लेकर बनते माहौल के बीच भारतीय जनता पार्टी खेमे की बढ़ती बेचैनी दिखने लगी है. भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की ओर से जिस तरह की बयानबाजी हो रही है, उससे भी यह स्पष्ट हो रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में विपक्षी एकजुटता के बारे में कहा कि इसके जरिए ‘मिलावटी सरकार’ बनाने की कोशिश हो रही है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि अगर इन विपक्षी दलों की सरकार बनती है तो हर दिन कोई एक नया प्रधानमंत्री बनेगा. लोकसभा के आखिरी सत्र के आखिरी दिन मोदी ने अपने भाषण में कहा कि बहुमत की सरकार स्थिरता के लिए जरूरी है और इससे वैश्विक स्तर पर भारत की स्थिति सुधरी है. भाजपा और उसके समर्थक विपक्षी की कोशिशों को यह सवाल उठाकर बेअसर करने की कोशिश कर रहे हैं कि उनका नेता कौन है. भाजपा इसके पहले भी ‘मिलावटी विपक्ष’ की बात उठाकर आम मतदाताओं में भ्रम पैदा करने की कोशिश करती रही है. ऐसा करके भाजपा मतदाताओं के मन में यह बात बैठाना चाहती है कि स्थायी सरकार के लिए सिर्फ भाजपा ही विकल्प है. भाजपा अपनी सरकार की उपलब्धियों पर वोट मांगने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है. भाजपा की ओर से स्थिरता और एकरूपता की बात उठाना लोकतंत्र के अनुकूल नहीं है.
 
विपक्ष एकजुट होकर वैकल्पिक सरकार की रूपरेखा पेश करने की कोशिश में है. इसके जरिए विभिन्न दल एक मंच पर आने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन भाजपा के हिसाब से ऐसी हर कोशिश मिलावटी है. जबकि सच्चाई तो यह है कि विभिन्न राजनीतिक दलों का एक साथ आना भारत के संघीय ढांचे की ताकत को दिखाता है. साथ ही इससे केंद्र की मौजूदा सरकार को पूरे देश पर एकरूपता थोपने की कोशिश की नाकामी को भी दिखाता है. अलग-अलग पार्टियां अलग-अलग वर्गों और विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं. ऐसे में कोई एक पार्टी सभी की नुमाइंदगी का दावा नहीं कर सकती. आपस में समझौते करके इनका एक साथ आना केंद्र में स्थिरता का प्रतीक है न कि मौजूदा सरकार की तरह समाज के ताने-बाने की छिन्न-भिन्न करने की कोशिश.
 
मौजूदा सरकार में प्रधानमंत्री कार्यालय में शक्तियों को केंद्रीत करके कैबिनेट व्यवस्था को तार-तार कर दिया गया है. गठबंधन सरकार फिर से कैबिनेट व्यवस्था को बहाल करने का काम  करेगी. क्योंकि यहां कोई भी एक पार्टी दूसरे को दबा नहीं सकती. ऐसे में संसद के प्रति भी जवाबदेही फिर से बहाल होगी. पिछले पांच साल में प्रधानमंत्री कार्यालय में सारी शक्तियां केंद्रीत होने से संस्थाओं को खासा नुकसान पहुंचा है. संसदीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति के सर्वोच्च रहने वाली व्यवस्था दिख रही है. ऐसे में गठबंधन सरकार भारत में संसदीय व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अपरिहार्य दिख रही है.
 
बुनियादी तौर पर लोकतंत्र एक अस्थिर व्यवस्था है. क्योंकि इसमें स्थायी तौर पर संघर्ष चल रहा होता है. राजनीतिक शक्तियां एक जगह से दूसरी जगह जाती रहती हैं. राजनीति के किरदार भी बदलते रहते हैं. इसलिए एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोधी दलों को यह कहना उचित नहीं है कि वे इस चुनाव को छोड़ दें और अगले चुनाव की तैयारी करें. उल्लेखनीय है कि पहले जो गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस प्रयोग असफल हुए हैं, उनके लिए एक व्यक्ति की प्रधानता ही जिम्मेदार रही है. इसके बावजूद ऐसी कोशिशों को अक्सर होने वाले बदलावों के नाम पर बेपटरी करना लोकतंत्र के अनुकूल नहीं है.
 
आम तौर कमजोर गठबंधन में जनता-परस्त नीतियों के आगे बढ़ने की संभावना अधिक होती है. क्योंकि सत्ताधारी वर्ग की आंतरिक कमजोरियों की वजह से जनता के अनुकूल फैसले लेने में सहूलियत होती है. इसी संदर्भ में अमित शाह के बयान को देखा जाना चाहिए जिसमें वे कहते हैं कि विपक्षी की ओर से मजबूर सरकार का प्रस्ताव दिया जा रहा है जबकि भाजपा मजबूत सरकार का वादा कर रही है. लोकतंत्र में यह जरूर है कि सरकार आम जनता के सामने मजबूर रहे न कि जनमानस की इच्छाओं के खिलाफ जाकर मजबूत रहे.

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