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क्या सोशल मीडिया को लोकतांत्रिक बनाया जा सकता है?

विचारों के बाजार के तौर पर विकसित किया गया सोशल मीडिया ताकतवर लोगों की मदद करता ही दिखता है
 

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अनुराग ठाकुर की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय संसदीय समिति ने ट्विटर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी जैक डोरसी को अपने सामने पेश होने के लिए बुलाया ताकि सोशल मीडिया पर नागरिकों की सुरक्षा पर उनसे बातचीत की जा सके. ऐसा अनुमान है कि इस निर्णय के पीछे ट्विटर द्वारा संदेहास्पद खातों को हटाए जाने का निर्णय जिम्मेदार है. यह खबर भी आई कि भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी फेसबुक के अधिकारियों को भी इस समिति के सामने बुलाना चाहते हैं.
 
जैसे-जैसे 2019 का आम चुनाव नजदीक आ रहा है, मौजूदा सरकार सोशल मीडिया में विशेष दिलचस्पी लेती दिख रही है. चुनावी राजनीति में सोशल मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाने की जरूरत है लेकिन ऐसी किसी जांच के औचित्य को भी समझने की जरूरत है. डिजिटल जगत ने भारत में लोक विमर्श को बदलने का काम किया है. अब खबरों के संग्रह का काम भी बुनियादी तौर पर बदल रहा है. लेकिन इन ढांचागत बदलावों से लोक विमर्श कितना प्रभावित हुआ है? क्या ये वोट में तब्दील हो रहे हैं? भारत में जिस तरह की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक विविधता है, उससे सोशल मीडिया में आने वालों को लेकर भी तरह-तरह की सीमाएं हैं और ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सोशल मीडिया पर चल रहा है विमर्श हर वर्ग की नुमाइंदगी करता है?
 
अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप के चुनाव से यह पता चला कि चुनावों में कैसे सोशल मीडिया का इस्तेमाल एक हथियार के तौर पर किया जा सकता है. लेकिन सोशल मीडिया कंपनियां कोई भी जिम्मेदारी लेने से बच रही हैं. ट्रंप के चुनावों के बाद फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को जिम्मेदार ठहराया गया और उस वक्त से उन्होंने फेसबुक को और पारदर्शी बनाने की बात कई बार की. राजनीति दलों के विज्ञापनों को लेकर फेसबुक ने नए फैसले किए हैं. ट्विटर उन खातों पर निगरानी रख रहा है जो नफरत फैलाने वाले संदेश पोस्ट कर रहे हैं. भारत में चुनाव आयोग ने भी सोशल मीडिया को लेकर दिशानिर्देश जारी किए हैं. लेकिन इन कदमों से समस्या का समाधान होता नहीं दिख रहा. हमें डिजिटल लोकतंत्र को मुक्त बनाए रखने की जरूरत है ताकि निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किए जा सकें. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम डिजिटल जगत को अपने समाज का विस्तार मानें और इसके हिसाब से कदम उठाएं.
 
क्या सोशल मीडिया पर सबके लिए बराबरी के अवसर होने चाहिए? आम धारणा यह है कि इंटरनेट सबके लिए बराबरी वाला माध्यम है. जबकि इसके जानकार बताते हैं कि यह एक मिथक है और इसमें भी पारंपरिक विशेषाधिकार का विस्तार दिखता है.
 
गुमनाम कंपनियां अधिक पैसे देकर अपने संदेश का प्रसार बड़े वर्ग तक कर पा रही हैं. इंटरनेट पर हर आवाज को समान संख्या में स्रोता नहीं मिल रहे. अगर सोशल मीडिया पर आवाज उठाने का मतलब यह है कि विरोधियों को चुनाव जीतने तक के लिए शांत करा दिया जाए तो इससे लोकतंत्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है. जमीनी स्तर के विचारों को सोशल मीडिया में पर्याप्त स्थान नहीं मिल रहा है.
 
हम सोशल मीडिया पर राजनीति दलों के खर्चों पर निगरानी रख सकते हैं. साथ ही व्यक्तिगत स्तर पर किसी पार्टी के समर्थन में किए जा रहे खर्चों पर भी नजर रखी जा सकती है. इससे सही स्थिति का पता चल पाएगा. यहां जोर इस बात पर है कि कैसे अधिक से अधिक लोगों को अपने साथ जोड़कर रखा जाए. इसके लिए नफरत फैलाने वाले संदेशों का ही सहारा क्यों न लेना पड़े. ये प्लेटफाॅर्म खुद को लोकतांत्रिक तो कहते हैं लेकिन ये पूरी तरह से कारोबारी माॅडल पर काम कर रहे हैं. ये विचारों के बाजार बन गए हैं.
 
इससे राजनीतिक विचारों के आधार पर धु्रवीकरण हो रहा है. इंटरनेट में पहचान सार्वजनिक नहीं होने की वजह अभिव्यक्ति की आजादी और लोकतंत्र को मजबूती मिलने की उम्मीद थी. लेकिन राजनीतिक कुलीन लोगों ने अपने हिसाब का एजेंडा चलाने और लोगों के विचार को प्रभावित करने के लिए यहां भी संसाधनों का इस्तेमाल करके फर्जी खबरें देना शुरू कर दिया. यह चुनावी राजनीति की सेहत के लिए ठीक नहीं है. खास तौर पर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में. इसमें सुधार करना सोशल मीडिया कंपनियों और राजनीतिक दलों दोनों के अनुकूल नहीं है.
 
अभी सबसे अहम यह समझना हो गया है कि कैसे इंटरनेट हमारे राजनीतिक जीवन को प्रभावित कर रहा है. यह भी समझने की जरूरत है कि कैसे हम एक नया कानूनी तंत्र खड़ा कर सकते हैं जिससे हमारी अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित हो सके और निजी कंपनियों के साथ-साथ राजनीति दलों की जवाबदेही सुनिश्चित हो सके.

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