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जहर और मौत तैयार करना

सुरक्षित शराब सुनिश्चित करने की जगह सरकारें मुआवजा देकर बच निकलती हैं
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में जहरीली शराब के इस्तेमाल से 116 लोगों को जान गंवानी पड़ी. इससे एक बार फिर पूर्ण शराबबंदी बनाम सुरक्षित शराब के इस्तेमाल की बहस छिड़ गई है. अध्ययनों से यह बात साबित हुई है कि शराब के सेवन से संबंधित मौजूदा स्थिति में कम आय वाले लोग जो कम या मध्यम आमदनी वाले देशों में रहते हैं, उनके लिए जोखिम अधिक होता है. जहरीली शराब के सेवन से नुकसान की स्थिति में गरीब लोग ही रहते हैं. ऐसी दुर्घटनाओं और उसके बाद की चीजें एक निश्चित ढंग से होती हैं. सरकार ऐसे गरीब लोगों को मुआवजा देकर गुस्सा शांत करने की कोशिश करती है. क्या अगर इतनी संख्या में अमीर लोगों की मौत खराब शराब पीने से हो तो भी क्या सरकार की प्रतिक्रिया ऐसी ही होगी?
 
इस तरह की घटनाओं इतनी आम हो गई है कि अब लोगों में इनकी खास चर्चा तक नहीं होती. रोती-बिलखती महिलाओं और बच्चों की तस्वीरें, सरकारों द्वारा मुआवजे की घोषणा और कुछ गिरफ्तारियों के साथ ऐसी घटनाएं दम तोड़ देती हैं. इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इसे नया रंग दिया है. राज्य सरकार ने एक समिति बनाकर इस घटना में विपक्षी पार्टियों की साजिश की जांच के आदेश दिए हैं. इससे तो यही लगता है कि मरने के बाद भी गरीब लोग कम से कम राजनीतिक वर्ग के किसी काम के तो हैं!
 
शराबबंदी के असर को लेकर भारत में लंबे समय से बहस चलती रही है. शराबबंदी से जहरीली और मिलावटी शराब के बिक्री का समानांतर तंत्र खड़ा हो जाता है. सत्ताधारी नेताओं को सुरक्षित शराब सुनिश्चित करने की बजाए शराबबंदी ज्यादा आसान काम लगता है. शराब पीने वालों के परिवारों के दुख-दर्द का हवाला देकर शराबबंदी करना अधिक नैतिक लगता है. आर्थिक तौर पर संपन्न लोग शराबबंदी के दौरान भी ब्रांडेड शराब खरीद पाते हैं. जबकि गरीबों को देसी शराब नहीं मिल पाती. खबरों में यह बार-बार आया है कि जिस शराब को पीने से लोग मरते हैं, उनका उत्पादन गुपचुप तरीके से होता है ताकि कर नहीं चुकाना पड़े. इस प्रक्रिया में सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा जाता. इसमें बड़ी मात्रा में मेथनाॅल का इस्तेमाल होता है, बैटरी के तेजाब का इस्तेमाल होता है और चमड़े के पुराने सामानों का इस्तेमाल होता है. इनमें कोई भी चीज जानलेवा साबित हो सकती है. जब हूच के इस्तेमाल से मौत नहीं होती तो इससे कई अंगों को नुकसान पहुंच रहा होता है. इससे अपंगता और अंधे होने की घटनाएं भी होती हैं.
 
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को यह लगता है कि विपक्षी दलों की हालिया घटना विपक्षी दलों की साजिश का नतीजा है. ऐसा करके वे मूल समस्या से आंख मूंदने का काम कर रहे हैं. शराबबंदी के पक्षधर भी इस समस्या को ठीक से नहीं समझ रहे. एक राज्य की सरकार ने तो स्वीकृत देसी शराब बार का चलना यह कहते हुए मुश्किल कर दिया था कि इससे उपभोक्ताओं को खतरा है. जबकि यह आरोप लगता है कि इससे देश में बनने वाले विदेशी शराब की बिक्री बढ़ाने की कोशिश हुई. इन कदमों से पता चलता है कि गरीब लोगों की फिक्र नहीं की जा रही है. यह सोचना कि लोग शराब नहीं पीएंगे बहुत ही अव्यावहारिक अपेक्षा है. जरूरत इस बात की है कि ऐसे नियम बनाए जाएं जिससे सुरक्षित शराब की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके. पुलिस के उन अपराधिक गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए जो जहरीली शराब का उत्पादन कर रहे हैं.
 
2015 में मुंबई में जहरीली शराब पीने से 106 लोगों की जान गई थी. 2011 में पश्चिम बंगाल के संग्रामपुर में इस वजह से 170 लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था. हर राज्य में ऐसी दर्दनाक घटनाएं हुई हैं. शराब राज्य का विषय है. इसलिए हर राज्य सरकार को ठोस नीतियां बनानी चाहिए. तमिलनाडु में देसी शराब की बिक्री राज्य सरकार 2011 से ही करती है. 2014-15 से तमिलनाडु सरकार ने अपनी एक एजेंसी के जरिए सस्ते शराब की बिक्री शुरू की है. गरीब लोगों को सस्ती और सुरक्षित शराब मुहैया कराने के लिए तमिलनाडु का प्रयोग दूसरे राज्यों में अपनाया जा सकता है.
 
गरीब शराब उपभोक्ताओं के संदर्भ में बेतुके नैतिक रवैया अपनाने के बजाए उनके प्रति गंभीरता से वाजिब चिंता अगर सरकारें करेंगी तो भविष्य में इतनी बड़ी संख्या में होने वाली मौतों को रोका जा सकता है.

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