ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

राजग का अंतरिम बजट किस ओर ले जाने वाला है?

अनुचित लोकलुभावन घोषणाओं से आकांक्षाएं पैदा होती हैं लेकिन ये बयानबाजी से आगे नहीं बढ़ पाती हैं
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

अंतरिम बजट आम तौर पर उस सरकार के लिए अवसर की तरह होता है जिसे अपने कार्यकाल के अंत में चुनाव का सामना करना पड़ता है. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी राजग का अंतरिम बजट भी इसका अपवाद नहीं है. यह लोकलुभावन घोषणाओं से भरा हुआ है. कर रियायतों और अन्य घोषणाओं के जरिए इस सरकार ने अब तक हुए राजनीतिक नुकसानों की भरपाई की कोशिश की है. पहले की परंपरा से परे जाकर इस सरकार ने अंतरिम बजट का इस्तेमाल अपने दीर्घकालिक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए किया है. बजट सत्ताधारी दल के लिए न सिर्फ घोषणा पत्र का काम कर रहा है बल्कि इसके जरिए वह आकांक्षाओं की राजनीति पर भी कब्जा जमाना चाह रही है.
 
उदाहरण के तौर पर हर साल छोटे किसानों को 6,000 रुपये की आर्थिक मदद वाली प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि यानी पीएम-किसान योजना को लिया जा सकता है. यह रकम पर्याप्त है या नहीं, इस पर बहस चल रही है. लेकिन इस योजना के राजनीतिक प्रभावों पर भी चर्चा होनी चाहिए. अगर इस योजना के तहत 2,000 रुपये की पहली किश्त लोगों को मिल जाती है तो इससे सरकार पर वोट खरीदने का आरोप लगेगा. वहीं अगर भुगतान को चुनाव बाद तक रोका जाता है और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार वापस आती है तो विपक्ष का आरोप यह होगा कि भाजपा सरकार ने चुनावों को प्रभावित करने की कोशिश की. अगर दोबारा सत्ता में आई इस योजना को ठीक से नहीं लागू करती तो यह भी गलत होगा. अगर गैर-भाजपा सरकार सत्ता में आती है तो उस पर प्रदर्शन का काफी दबाव होगा. जिस तरह की लोकलुभावन योजना यह है, उसमें किसी भी सरकार के लिए इससे पीछे हटना आसान नहीं होगा. इस योजना के तहत मिलने वाली रकम को कम बताना विपक्ष के लिए बड़ी मुश्किल है. क्योंकि उसके समर्थकों को यह लग रहा है कि अगर विपक्षी पार्टियां सत्ता में आती हैं तो ये भुगतान की रकम को बढ़ा देंगे. इसी तरह के खतरे प्रधानमंत्री श्रम योगी मानधन योजना के साथ भी जुड़े हुए हैं.
 
ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने बेरोजगारी को चुनावी मुद्दा बना लिया है. पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी बेरोजगारी की उच्च दर को लेकर सरकार की आलोचना करते रहते हैं. लेकिन कांग्रेस इस पर अपना वैकल्पिक दृष्टिकोण नहीं पेश कर पा रही है. एक तरह से कांग्रेस भी जुमलेबाजी में उलझी हुई दिख रही है. लोग अपने प्रतिनिधि का चुनाव यह सोचकर करते हैं कि कौन उनके सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों की नुमाइंदगी करता है. इस संदर्भ में देखा जाए तो असंगठित क्षेत्र के लिए जो पेंशन योजना लाई गई है, वह सत्ताधारी दल के लिए कई वजहों से मास्टर स्ट्रोक है. पहली वजह तो यह है कि रोजगार के आंकड़ों को लेकर जो बहस चल रही है, उसे देखते हुए यह स्पष्ट है कि भारतीय रोजगार बाजार जोखिम वाला है. दूसरी वजह यह है कि समस्या को स्वीकार करने से ही इसके समाधान की राह खुलती है. तीसरी वजह यह है कि इस संदर्भ में मौजूदा सरकार ने अगली सरकार के लिए उच्च लेकिन कमजोर मानक स्थापित करने का काम किया है.
 
आकांक्षाओं की यह राजनीति जुमलेबाजी पर निर्भर दिखती है. पीएम-किसान और पीएमएसवाईएम और पांच लाख तक के आय वालों को आयकर में छूट, सभी विपक्ष के लिए दोधारी तलवार की तरह हैं. कल्याणकारी दिखने की वजह से इन योजनाओं को वापस लेना आसान नहीं होगा. लेकिन इन्हें लागू करना और भी मुश्किल होगा. आयकर में छूट के लिए वित्त विधेयक में जिस संशोधन की जरूरत है, उसमें वक्त लगेगा. इसके बावजूद क्या लोग इसे सही मानेंगे? यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार इसे किस तरह से लोगों के बीच ले जाती है. भाजपा ने एक वर्ग के लिए 10 फीसदी आरक्षण के फैसले से भी उसकी नाराजगी को दूर करने की कोशिश की है. वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार में आने के बाद अधिक आय वालों को भी आयकर में छूट दिया जाएगा. इससे भी आकांक्षाओं के पर लगे हैं.
 
ऐसे में इस तरह की राजनीति के आर्थिक आयामों पर सवाल उठते हैं. सरकार के अपने अनुमानों के मुताबिक ये फायदे 3.4 फीसदी वित्तीय घाटे की कीमत पर मिलेंगे. जो 3.3 फीसदी के संशोधित अनुमान से सिर्फ 0.1 फीसदी अधिक है. लेकिन ये सारे अनुमान 11.5 फीसदी जीडीपी दर और रिजर्व बैंक से मिलने वाले लाभांश के आधार पर लगाए जा रहे हैं. आर्थिक विकास में तेजी लाने का काम ढांचागत बदलावों के लिए नीतिगत फैसलों के जरिए ही हो सकता है. वित्तीय घाटा बढ़ने के जोखिम के बीच क्या वैकल्पिक सरकार के लिए कोई दीर्घ कालिक योजना बनाने की संभावना बचती है? ऐसे में अंतरिम बजट न सिर्फ वोट बैंक के लिए लोकलुभावन है बल्कि संभावित वैकल्पिक सरकार के लिए भी मुश्किलें पैदा करने वाला है. 

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top