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झारखंड के संदेश

झारखंड आंदोलन के दिनों में आदिवासी आबादी के लिए जो वादे किए गए थे, उन्हें पूरा करने का काम नई सरकार को करना चाहिए

 

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मई, 2019 में लोकसभा चुनावों में जीत के बाद विधानसभा चुनावों में झटकों का सामना कर रही भारतीय जनता पार्टी के लिए झारखंड विधानसभा चुनावों का नतीजा एक और झटका है। महाराष्ट्र और हरियाणा के उलट झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल गठबंधन के पक्ष में स्पष्ट जनादेश दिया। ऐसे में भाजपा के साथ संख्या बल जुटाकर सरकार बनाने की कोशिश करने का भी अवसर नहीं रहा।

भाजपा झारखंड चुनावों के लिए कोई गठबंधन नहीं कर पाने की वजह से अकेले ही चुनाव मैदान में उतरी थी। इसे भाजपा की हार की एक वजह बताया जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि 2014 के लोकसभा चुनावों की तुलना में भाजपा और उसकी सहयोगी रही आॅल झारखंड स्टूडेंट यूनियन के मत प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई। लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दोनों पार्टियां अधिक सीटों पर चुनाव लड़ी हैं। गठबंधन नहीं होने को भाजपा के हार की वजह मानना सामाजिक हकीकतों से मुंह मोड़ने की तरह है। अपने गठन से ही झारखंड ने कई अस्थिर सरकारों का सामना किया है। राज्य में बार—बार सरकारें बदली हैं और इस राज्य को कई बार राष्ट्रपति शासन का सामना करना पड़ा है। जबकि पिछली सरकार स्थिर रही है। लेकिन जनता पर और खास तौर पर हाशिये के लोगों पर इस सरकार के कामकाज का नकारात्मक असर पड़ा है।

झारखंड में बहुत ऐसे लोग थे जो पिछली भाजपा सरकार से नाखुश थे। आदिवासी विरोधी कानूनों, भीड़ द्वारा की जाने वाली हिंसा, रोजी—रोटी का छूटना और नस्ल व धर्म के आधार पर ध्रुवबंदी की वजह से जो परिस्थितियां पैदा हुईं, उससे अल्पसंख्यकों और आदिवासी समाज में असंतोष पैदा हुआ। लोगों की आर्थिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं के समाधान के लिए कोई खास काम नहीं किया गया। आदिवासी विरोधी रवैया भी प्रभावी दिखता था। इसके पहले भी झारखंड में भाजपा सरकार रही है लेकिन इतनी आदिवासी विरोधी सरकार कभी नहीं रही। आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ कि सरकार ने एक ऐसा विधेयक लाया जिसके जरिए छोटानागपुर और संथाल परगना टेनेंसी कानूनों को संशोधित करने की कोशिश की गई। आदिवासी लोगों ने इसके विरोध में प्रदर्शन किए और इसका परिणाम यह हुआ कि राज्यपाल ने इस विधेयक को अपनी मंजूरी नहीं दी। ये दोनों कानून आदिवासियों के संघर्ष के बाद बने थे। सरकार ने धर्म की आजादी संबंधित विधेयक लाकर राज्य में आदिवासी लोगों को बांटने की कोशिश की। इसके अलावा सरकार ने आदिवासी इलाकों में आतंक का राज बढ़ने दिया। अधिकारों के लिए अगर किसी भी तरह का संघर्ष हुआ तो सरकार ने उसे राष्ट्र विरोधी कहा और इन संघर्षों में शामिल लोगों पर राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें जेल में बंद किया गया। इस तरह के आरोपों की वजह से हजारों लोग जेल में हैं। इसलिए आदिवासी बाहुल्य विधानसभा सीटों पर भाजपा की हार पर किसी को हैरानी नहीं हुई। धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति भाजपा का रुख और बुरा रहा। इन्हें कई तरह से प्रताड़ित किया गया। भाजपा की हार की एक वजह यह भी रही। झारखंड में कई ऐसे औद्योगिक शहर हैं जिस वजह से उद्योगों से संबंधित कई तरह की सहयोगी गतिविधियों को गति मिली। इस तरह के कामों में लगे लोगों को आर्थिक मंदी की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसलिए इस बात में किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए कि जेएमएम और उसकी सहयोगी दलों ने अर्ध—शहरी इलाकों में भी बेहतर प्रदर्शन क्यों किया।

15 नवंबर, 2000 को एक नए राज्य के तौर पर झारखंड का गठन छह दशकों के संघर्ष का नतीजा था। बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और पहले के मध्य प्रदेश के जुड़े हुए इलाके में रहने वाले आदिवासी समाज के लिए एक नए राज्य की परिकल्पना की गई थी। बाद में यह अभियान बिहार के छोटानागपुर और संथाल परगना क्षेत्र के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों तक सीमित हो गया। जब झारखंड अलग राज्य के तौर पर अस्तित्व में आया तो राज्य में आदिवासी आबादी 2011 में घटकर 26 फीसदी रह गई। 1951 में यह आंकड़ा 36 फीसदी था। अंग्रेजों के शासन काल में यहां से जो पलायन शुरू हुआ, वह आजादी के बाद भी जारी रहा। इससे आदिवासी अल्पसंख्यक होते चले गए। इसलिए झारखंड को आदिवासी राज्य कहा जाना वस्तुस्थिति से अलग है। सांकेतिक महत्व के अलावा इसका कोई और मतलब नहीं है।

झारखंड संसाधनों के मामले में संपन्न राज्य है। निजी और सरकारी क्षेत्र के उद्यमों के आधार पर भी यह बात सही लगती है। लेकिन इस तरह के विकास के लाभ झारखंड के आदिवासी समाज तक नहीं पहुंचा है। बल्कि इनकी विपन्नता बढ़ती ही गई है। ये लोग आर्थिक और सामाजिक विकास के मामले में अब तक पिछड़े हुए हैं। ऐसे में नई सरकार के लिए यह जरूरी है कि वह इन स्थितियों को समझे और इस तरह की नीतियां और कार्यक्रम बनाए जिसमें हाशिये पर रह रहे लोग शामिल हो सकें।

Updated On : 12th Feb, 2020

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