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जीएटी भुगतान का संकट

अर्थव्यवस्था में वित्तीय दायरे में आती कमी की वजह से जीएसटी राजस्व मुआवजे के भुगतान के लिए नए तरह का संकट पैदा हो गया है

 

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किसी भी सरकार के लिए कर सुधार से राजस्व के मामले में पैदा होने वाली अस्थिरता चिंता की वजह रही है। इसलिए ऐसे सुधारों के प्रति सहमति बनाने के लिए नुकसान की भरपाई का वादा किया जाता है। वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू करते वक्त 2017 में यही वादा बाकायदा एक कानून बनाकर केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों को किया। पहले पांच साल के लिए यह व्यवस्था की गई।

कानून में इस तरह के वादे के बाद जीएसटी परिषद ने जीएसटी की संरचना और क्रियान्वयन से संबंधित कई प्रयोग किए। ताकि इस व्यवस्था के तहत अनुपालन सुनिश्चित हो और अर्थव्यवस्था पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़े। लेकिन जब जीएसटी संग्रहण में कमी आ रही हो और इस वजह से राज्यों को दिए जाने वाले मुआवजे के भुगतान में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हो तो परेशानी होती है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच मतभेद पैदा हो रहा है। इससे राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए बनी व्यवस्था पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

एसजीएसटी राजस्व के लिए जो अनुमान लगाए गए थे उसमें 14 फीसदी के सालाना विकास दर को आधार बनाया गया था। 2015—16 में यह अनुमान सामने आया था। नई व्यवस्था में 30 जून, 2022 तक राज्यों को होने वाले नुकसान की भरपाई की बात कही गई थी। 1 जुलाई, 2017 से पान मसाला, तंबाकू, तंबाकू उत्पादों, शीतल पेय और यात्री कारों पर जीएसटी सेस का प्रावधान किया गया था ताकि नुकसान की भरपाई के लिए राजस्व जुटाया जा सके। इसके बावजूद राज्यों के बकाये के भुगतान में देरी हो रही है। जुलाई, 2019 में 17,789 करोड़ रुपये इस नुकसान की भरपाई के लिए जारी किए गए। लेकिन यह बकाया अप्रैल और मई, 2019 का था। अगस्त में जून और जुलाई का 27,995 करोड़ के बकाये का भुगतान हुआ। दिसंबर के मध्य तक जिस 35,298 करोड़ रुपये के जारी होने का अनुमान है, वह अगस्त और सितंबर, 2019 के लिए होगा।

जीएसटी मुआवजे के भुगतान में देरी कोई नई समस्या नहीं है। कई वजहों से इस मामले में तनाव पैदा होना अलग माना जा रहा है। पहली बात तो यह कि इस देरी की वजह एसजीएसटी संग्रहण में कमी और राजस्व संग्रहण में आई अस्थिरता को माना जा रहा है। इसके लिए अर्थव्यवस्था के विकास दर में आई कमी को भी वजह बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि जब तक इस मोर्चे पर सुधार नहीं होता तब तक राज्यों और केंद्र सरकार और राज्यों के बीच बकाये के भुगतान को लेकर तनातनी बनी रहेगी। दूसरी बात यह कि नई व्यवस्था में राज्यों को मुआवजा देने की संभावित प्रक्रिया का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। खास तौर पर तब के लिए जब सेस के संग्रह में कमी आए। कानून के मुताबिक राज्यों को मुआवजे के भुगतान की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है।

बिहार जैसे राज्यों को छोड़ दें तो अधिकांश राज्यों के लिए जीएसटी में समाहित करों के संग्रहण में 14 फीसदी की विकास दर हासिल करना संभव नहीं लगता। यही वजह है कि कुछ राज्यों ने 15वें वित्त आयोग से यह गुहार लगाई है कि जीएसटी मुआवजे की व्यवस्था को तीन साल के लिए और बढ़ाकर इसे 2024—25 तक कर दिया जाए।

जीएसटी मुआवजे की अवधि में विस्तार का निर्णय लेने का अधिकार जीएसटी परिषद को है। लेकिन व्यावहारिक तौर पर देखें तो यह निर्णय केंद्र सरकार का होगा। जिस तरह से जीएसटी संग्रहण में कमी आ रही है, उसे देखते हुए लगता नहीं कि जीएसटी सेस को हटा लिया जाएगा। अगर जीएसटी मुआवजे को 30 जून, 2022 से बढ़ाकर और आगे के लिए किया जाता है तो क्या केंद्र सरकार के पास इतना वित्तीय साधन है कि वह 14 फीसदी की सालाना कर संग्रह विकास दर के आधार पर राज्यों को भुगतान कर सके? वह भी तब तक जब तक जीडीपी की दर न सुधरे और अर्थव्यवस्था की सुस्ती नहीं दूर हो।

क्या मौजूदा स्थिति भारत के वित्तीय संघवाद के लिए एक संकट की तरह है? हालांकि, ऐसे किसी नतीजे पर अभी पहुंचना जल्दबाजी होगी लेकिन विश्वास की कमी को भी खारिज करना ठीक नहीं होगा। मुआवजा खत्म होने की स्थिति में राज्यों के लिए जीएसटी की व्यवस्था को मानते रहने की कोई वजह नहीं रहेगी। लेकिन इसके साथ ही राज्यों को भी इस बात को स्वीकार करना होगा कि जीएसटी के मुआवजे की अवधि को हमेशा के लिए नहीं बढ़ाया जा सकता है। राज्यों को या तो अपने संसाधनों से अपना कर संग्रह बढ़ाना होगा या फिर अपने खर्चों को व्यवस्थित करना होगा। मौजूदा स्थिति का इस्तेमाल राज्यों को अनुभव हासिल करने के लिए करना चाहिए ताकि जीएसटी का मुआवजा वापस लेने के बाद पैदा होने वाली परिस्थितियों का वे सामना कर सकें।

Updated On : 12th Feb, 2020

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