निर्भिकता से साथ रहने के लिए विरोध

संविधान के प्रति प्रतिबद्धता के साथ खड़ा होना अनिवार्य और अपरिहार्य हो गया है

 
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

नागरिकता संशोधन कानून के पारित होने के बाद के घटनाक्रम ने मौजूदा सरकार के चरित्र और जनता के धैर्य को उजागर किया है। इस कानून और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर को लेकर पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। सरकार ने इन प्रदर्शनों से निपटने के लिए गैर-लोकतांत्रिक तरीका अपनाया है। सरकार आम लोगों की संवैधानिक आकांक्षाओं को कुचलना चाहती है। पूर्वोत्तर से शुरू हुआ विरोध-प्रदर्शन पूरे देश में फैलता गया।

असम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों से ये विरोध शुरू हुआ। लेकिन जामिल मिलिया विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जब इस पर विरोध होने लगा और इसके जवाब में जब पुलिस ने बर्बरता का सहारा लिया तो बात बहुत तेजी से फैली। मीडिया की खबरों से साफ है कि दिल्ली पुलिस ने जामिया पुस्तकालय में आंसू गैस के गोले छोड़े, हाॅस्टलों पर हमले किए और यहां तक की छात्रों पर रबर की गोलियां भी चलाईं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी यही सब हुआ। पुलिस ने छात्रों को शांत करने की जगह हिंसा का सहारा लिया। छात्रों पर आरोप लगाया गया कि वे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जबकि ऐसे आरोपों को सही साबित करने वाली कोई घटना नहीं दिखी। जामिया में छात्राओं ने जिस तरह से पुलिसिया दमन का सामना किया, उसके जरिए इन लोगों ने सत्ताधारियों को यह संदेश देने का काम किया कि वे जनता के अधिकारों को नहीं छीन सकते। देश के अलग-अलग हिस्सों के शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों ने जबर्दस्त साहस का परिचय देते हुए सीएए और एनआरसी का विरोध जारी रखा।

साहस के साथ किए जा रहे विरोध पर सवाल खड़ा करने के लिए सरकार ने तरह-तरह के आरोप लगाए। लोक संस्थाओं में अहम पदों पर बैठे लोगों ने भी सांप्रदायिक भाषा का इस्तेमाल करके इन छात्रों को गलत साबित करने की कोशिश की। हालांकि, सांप्रदायिकता फैलाने और धु्रवीकरण करने की ये कोशिशें सफल नहीं हुईं। 19 दिसंबर को जो देशव्यापी प्रदर्शन हुआ, उसमें एकजुटता देखने को मिली। इसमें देश की विविधता और एक साथ रहने की इच्छा भी परिलक्षित हुई।

सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ संवाद की इच्छा तक नहीं दिखाई। इसके बदले सरकार ने धारा-144 लगाने, आंशिक तौर पर मोबाइल सेवा बंद करने और दिल्ली में कुछ मेट्रो स्टेशन बंद करने जैसे कदम उठाए। इसके बावजूद लोग शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए जमा हुए। इस मामले की जांच होनी चाहिए कि लूटपाट और हिंसा की घटनाएं भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में ही हुईं। लखनउ और मेंगलुरु में पुलिस फायरिंग की वजह से तीन लोगों की मौत हुई। इससे पहले असम में विरोध प्रदर्शन के दौरान पांच लोगों की जान गई थी।

बेशकीमती इंसानी जिंदगियों का यह नुकसान इसलिए हो रहा है कि मौजूदा सरकार संवाद नहीं करने के जिद पर अड़ी रहती है। यह इस सरकार की गंभीर नैतिक नाकामी का प्रतीक है। लोकतंत्र में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए विपक्ष के सच को समझने की साहस की जरूरत होती है। ऐसा करने से देश हमेशा तनाव और संघर्ष की अवस्था में रहने से बचेगा। अगर सरकार शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित नहीं कर पाएगी तो फिर लोग अपने हिसाब से आगे बढ़ेंगे। इस मामले में अच्छी बात यह है कि लोगों का सविनय अवज्ञा और संवैधानिक मूल्यों में भरोसा बढ़ता जा रहा है।

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Biden’s policy of the “return to the normal” would be inadequate to decisively defeat Trumpism.

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Only a generous award by the Fifteenth Finance Commission can restore fiscal balance.

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The assessment of the new military alliance should be informed by its implications for Indian armed forces.

The fiscal stimulus is too little to have any major impact on the economy.

The new alliance is reconfigured around the prospect of democratic politics, but its realisation may face challenges.

A damning critique does not allow India to remain self-complacent on the economic and health fronts.

 

The dignity of public institutions depends on the practice of constitutional ideals.

The NDA government’s record in controlling hunger is dismal despite rising stocks of cereal.

 

Caste complacency of the ruling combination necessarily deflects attention from critical self-evaluation.

Rape atrocities tragically suggest that justice is in dire need of egalitarian commitment by every citizen.

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