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निर्भिकता से साथ रहने के लिए विरोध

संविधान के प्रति प्रतिबद्धता के साथ खड़ा होना अनिवार्य और अपरिहार्य हो गया है

 
 

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नागरिकता संशोधन कानून के पारित होने के बाद के घटनाक्रम ने मौजूदा सरकार के चरित्र और जनता के धैर्य को उजागर किया है। इस कानून और नागरिकों के राष्ट्रीय रजिस्टर को लेकर पूरे देश में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। सरकार ने इन प्रदर्शनों से निपटने के लिए गैर-लोकतांत्रिक तरीका अपनाया है। सरकार आम लोगों की संवैधानिक आकांक्षाओं को कुचलना चाहती है। पूर्वोत्तर से शुरू हुआ विरोध-प्रदर्शन पूरे देश में फैलता गया।

असम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर के राज्यों से ये विरोध शुरू हुआ। लेकिन जामिल मिलिया विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जब इस पर विरोध होने लगा और इसके जवाब में जब पुलिस ने बर्बरता का सहारा लिया तो बात बहुत तेजी से फैली। मीडिया की खबरों से साफ है कि दिल्ली पुलिस ने जामिया पुस्तकालय में आंसू गैस के गोले छोड़े, हाॅस्टलों पर हमले किए और यहां तक की छात्रों पर रबर की गोलियां भी चलाईं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी यही सब हुआ। पुलिस ने छात्रों को शांत करने की जगह हिंसा का सहारा लिया। छात्रों पर आरोप लगाया गया कि वे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचा रहे हैं। जबकि ऐसे आरोपों को सही साबित करने वाली कोई घटना नहीं दिखी। जामिया में छात्राओं ने जिस तरह से पुलिसिया दमन का सामना किया, उसके जरिए इन लोगों ने सत्ताधारियों को यह संदेश देने का काम किया कि वे जनता के अधिकारों को नहीं छीन सकते। देश के अलग-अलग हिस्सों के शैक्षणिक संस्थानों के छात्रों ने जबर्दस्त साहस का परिचय देते हुए सीएए और एनआरसी का विरोध जारी रखा।

साहस के साथ किए जा रहे विरोध पर सवाल खड़ा करने के लिए सरकार ने तरह-तरह के आरोप लगाए। लोक संस्थाओं में अहम पदों पर बैठे लोगों ने भी सांप्रदायिक भाषा का इस्तेमाल करके इन छात्रों को गलत साबित करने की कोशिश की। हालांकि, सांप्रदायिकता फैलाने और धु्रवीकरण करने की ये कोशिशें सफल नहीं हुईं। 19 दिसंबर को जो देशव्यापी प्रदर्शन हुआ, उसमें एकजुटता देखने को मिली। इसमें देश की विविधता और एक साथ रहने की इच्छा भी परिलक्षित हुई।

सरकार ने प्रदर्शनकारियों के साथ संवाद की इच्छा तक नहीं दिखाई। इसके बदले सरकार ने धारा-144 लगाने, आंशिक तौर पर मोबाइल सेवा बंद करने और दिल्ली में कुछ मेट्रो स्टेशन बंद करने जैसे कदम उठाए। इसके बावजूद लोग शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन के लिए जमा हुए। इस मामले की जांच होनी चाहिए कि लूटपाट और हिंसा की घटनाएं भारतीय जनता पार्टी शासित राज्यों में ही हुईं। लखनउ और मेंगलुरु में पुलिस फायरिंग की वजह से तीन लोगों की मौत हुई। इससे पहले असम में विरोध प्रदर्शन के दौरान पांच लोगों की जान गई थी।

बेशकीमती इंसानी जिंदगियों का यह नुकसान इसलिए हो रहा है कि मौजूदा सरकार संवाद नहीं करने के जिद पर अड़ी रहती है। यह इस सरकार की गंभीर नैतिक नाकामी का प्रतीक है। लोकतंत्र में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए विपक्ष के सच को समझने की साहस की जरूरत होती है। ऐसा करने से देश हमेशा तनाव और संघर्ष की अवस्था में रहने से बचेगा। अगर सरकार शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व सुनिश्चित नहीं कर पाएगी तो फिर लोग अपने हिसाब से आगे बढ़ेंगे। इस मामले में अच्छी बात यह है कि लोगों का सविनय अवज्ञा और संवैधानिक मूल्यों में भरोसा बढ़ता जा रहा है।

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