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राजमार्गों पर गति के लिए फास्टैग

क्या व्यवस्थागत सुधार किए बगैर सिर्फ इलैक्ट्राॅनिक टोल संग्रहण से राजमार्गों का विकास हो पाएगा?

 

केंद्र सरकार ने 15 दिसंबर, 2019 से भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के तकरीबन 500 टोल प्लाजा में से 90 प्रतिशत से अधिक पर फास्टैग को अनिवार्य कर दिया। यह एक इलैक्ट्राॅनिक टोल संग्रहण प्रणाली है जिसका संचालन नैशनल पेमेंट्स काॅरपोरेशन आॅफ इंडिया, इंडियन हाईवे मैनेजमेंट कंपनी लिमिटेड और कई वाणिज्यि बैंकों द्वारा मिलकर किया जा रहा है। रेडियो फ्रिक्वेंसी आधारित इस व्यवस्था में टोल शुल्क सीधे संबंधित वाहन से संबंधित बैंक खाते या वैलेट से कट जाता है। इस तरह से टोल पार करने में अब नगदी की भूमिका खत्म हो जाएगी। कहा जा रहा है कि इससे टोल पर जाम नहीं लगेगा, राजस्व का लीकेज कम होगा और टोल पर होने वाले लेन-देन में पारदर्शिता बढ़ेगी। लेकिन मूल सवाल यह है कि क्या इससे देश में राजमार्गों के विकास के काम में गति आएगी। क्योंकि एनएचएआई पर कर्ज का बोझ बढ़ता ही जा रहा है।

के्रडिट रेटिंग एजेंसी आईसीआरए के मुताबिक एनएचएआई पर तकरीबन 63,000 करोड़ रुपये की देनदारी है। हालांकि, एनएचएआई के ही कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक आंकड़े इससे तीन गुना अधिक हो सकते हैं।

भारतीय स्टेट बैंक के कैपिटल मार्केट अनुमानों में बताया गया है कि हाल के सालों में एनएचएआई परियोजनाओं में कर्ज के जरिए होने वाली फंडिंग का अनुपात काफी बढ़ा है। जबकि टोल संग्रहण में प्रति किलोमीटर सालाना 6 फीसदी की ही वृद्धि दर्ज की गई है। 2013 में जहां यह रकम 55 लाख प्रति किलोमीटर थी, वहीं 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 80 लाख प्रति किलोमीटर पर पहुंचा। इस गति से परियोजनाओं पर रिटर्न आना दूर की कौड़ी है। इससे सिर्फ ब्याज चुकाने का ही काम हो पा रहा है।

कर्ज का बोझ बढ़ने के पीछे एक वजह यह है कि जमीन अधिग्रहण की कीमतें काफी बढ़ गई हैं। खास तौर पर 2013 के नए कानून के लागू होने के बाद से। एनएचएआई के आंकड़ों के मुताबिक जमीन अधिग्रहण पर जहां 2016-17 में 17,824 करोड़ रुपये खर्च हुए थे, वहीं 2017-18 में यह खर्च तकरीबन दोगुना 32,143 करोड़ रुपये हो गया। इसके बावजूद राष्ट्रीय राजमार्गों का दायरा बढ़ाने को लेकर कोई बंदिश नहीं रही। प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी इस पर सवाल उठाए थे।

पिछले एक दशक या उससे कुछ अधिक वक्त से भारत सरकार ने राजमार्गों को विकास के तौर पर पेश किया है। लेकिन सड़क निर्माण में कोई उल्लेखनीय निजी निवेश नहीं हुआ। एनएचएआई अब भी इंजीनियरिंग, प्रोक्योरमेंट और कंस्ट्रक्शन यानी ईपीसी माॅडल में ही अधिकांश सड़कों का निर्माण कर रही है। इसमें अधिकांश पैसा सरकार को लगाना होता है। पिछले कुछ सालों में एनएचएआई को मिलने वाली सरकारी मदद में 36,691 करोड़ रुपये की कमी आई है। इस वजह से इसने 2019-20 में 85,000 करोड़ रुपये कर्ज लेने का लक्ष्य रखा। राष्ट्रीय छोटी बचत कोष से यह अपना कर्ज दोगुना करने वाली है। जाहिर है कि ऐसा करने से ब्याज चुकाने पर इसे अधिक पैसे खर्च करने होंगे। क्या ये सही वक्त नहीं है जब सरकार अपनी अतिमहत्वकांक्षी योजनाओं पर फिर से विचार करे?

इस संदर्भ में यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या इलैक्ट्राॅनिक टोल संग्रहण से राजस्व में वृद्धि होगी और अगर ऐसा होता है तो सरकारी खजाने पर पड़ने वाला बोझ कम होगा? अगर अधिक राजस्व मिलता है तो इसका इस्तेमाल कहां होगा? यह पैसा सड़क निर्माण में लगेगा या कर्जों के ब्याज चुकाने में? इन सवालों का जवाब तो तब ही मिल पाएगा जब ठीक-ठाक समय तक फास्टैग का इस्तेमाल हो जाएगा। लेकिन इस पूरे मामले का एक आयाम यह भी है कि सरकार इससे टोल संग्रह रसीद का डेटा बैंक बनाकर सरकारी राजमार्गों का विनिवेश कर सकती है और राजमार्गों से संबद्ध संपत्तियों को बेचकर पैसे निकाल सकती है।

राजस्व संग्रहण में पारदर्शिता का दावा तब सही साबित हो पाएगा जब एनएचएआई और सरकार आंकड़ों को लेकर पारदर्शी बनी रहे। अब तक सरकार ने आंकड़ों को लेकर पारदर्शिता नहीं दिखाई है। हाइब्रिड एन्यूटी माॅडल में 40 प्रतिशत सरकारी हिस्सेदारी के बावजूद इस माॅडल के तहत निजी क्षेत्र निवेश करने सामने नहीं आया।

यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि निजी निवेश में यह सुस्ती हर क्षेत्र में दिख रही है। लेकिन एनएचएआई के मामले में यह सुस्ती काफी समय से दिख रही है और इसके लिए इसकी कार्यप्रणाली को भी जिम्मेदार माना जाता है। सीएजी की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक खराब परियोजना प्रबंधन की वजह से एनएचएआई ने 44 करोड़ रुपये रोक रखे थे।

हमें सीडीएम स्मिथ का विवादास्पद मामला भी नहीं भूलना चाहिए। इसमें गलत ढंग से हासिल किया गया सेवा कर रिफंड अधिकारियों के रिश्वत के रूप में गया था। इस तरह की संस्थागत गड़बड़ियों की कोई जांच नहीं होती तो ऐसे में सिर्फ टोल संग्रह के आंकड़ों को डिजिटल कर देने मात्र से क्या राजमार्ग परियोजनाओं में निवेशकों का विश्वास जगेगा?

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