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लोकतंत्र पर राजनीतिक वंशवाद की छाया

वंशवाद भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी समस्या बन गई है
 

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जब भी नेहरू-गांधी परिवार का कोई व्यक्ति राजनीति में आता है तब-तब भारत में राजनीतिक वंशवाद की बात चल पड़ती है. इसलिए भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री ने प्रियंका गांधी वाड्रा के मसले को जिस तरह से उठाया, उससे किसी को हैरानी नहीं हुई. किसी रसूख वाले परिवार के सदस्य की राजनीति में प्रवेश से यह बहस जिंदा रहती है. भाजपा भले ही इसकी आलोचना कर रही हो लेकिन इस मामले में उसका खुद का दामन बेहद साफ नहीं है. कांग्रेस की आलोचना करते वक्त भाजपा यह नहीं बताती है कि उसका वंशवाद कांग्रेस के वंशवाद से अच्छा कैसे है. 
 
भाजपा की प्रतिक्रिया ढांेग भरी लगती है. भाजपा यह नहीं बता पाती कि वंशवादी राजनीति की वजह से लोकतंत्र में समानता और न्याय के मूल्यों को कितना नुकसान पहुंचता है.
 
लोकतंत्र में समानता का भाव जागरूक नागरिकों के रवैये से आता है. जहां पर नागरिक लोक मसलों के प्रति प्रतिबद्ध हों, वहां इस तरह के लोकतांत्रिक मूल्य मजबूत हो जाते हैं. ऐसी जगहों पर जाति, धर्म, लिंग और पारिवारिक संरक्षण को बहुत भाव नहीं दिया जाता. बल्कि इन्हें बोझ माना जाता है. वंशवाद का इस्तेमाल करके विरोधियों की आलोचना करने की रणनीति की वजह से सक्षम लोग राजनीति में आकर प्रतिस्पर्धा करने को हतोत्साहित होते हैं.
 
समकालीन चुनावी राजनीति में नए लोगों के लिए सफल राजनीतिक परिवारों का आदर्श के तौर पर पेश किया जाता है. चुनावी राजनीति में ये परिवार निर्णय को प्रभावित करने की स्थिति में दिखते हैं. पदों के बंटवारे से लेकर टिकट वितरण में इन परिवारों की चलती है. पार्टी के चुने हुए प्रतिनिधियों पर भी इन परिवारों का नियंत्रण रहता है. इसके लिए ये अपने पसंदीदा लोगों की नियुक्ति पार्टी में या अन्य संस्थाओं में करते हैं.
 
सत्ता आसानी से एक जगह से दूसरी जगह नहीं जाती. राजनीतिक परिवार इसे उस परिवार के प्रति वफादारी के प्रसाद के तौर पर बांटते हैं. यह एक नए तरह का सामंतवाद है. कुछ दलित और आदिवासी परिवारों ने भी इस तरह के वंशवादी महत्वकांक्षाएं विकसित की हैं और वे उत्तराधिकारी अपने ही परिवार से चुन रहे हैं.
 
इस तरह की सोच लोकतंत्र से पहले की सोच को आगे बढ़ा रही है. उस वक्त के समाज में वंश के आधार पर उत्तराधिकार तय होता था. वफादारी के आधार पर उत्तराधिकारी तय होते थे. अब चुनावी लोकतंत्र में भी यही दिखने लगा है.
आखिर कैसे चुनावी परिदृश्य को लोकतांत्रिक बनाया जाए? इसके लिए कुछ कदम उठाए गए थे. 73वां और 74वां संविधान संशोधन विधेयक लाया गया. इसके जरिए स्थानीय निकायों में महिलाओं को सशक्त बनाने की कोशिश की गई. इससे राजनीतिक परिवारों की स्थिति थोड़ी कमजोर करने की कोशिश हुई. लेकिन इसका भी काट निकाल लिया गया. वंशवादी परिवारों ने यह रवैया अपनाया कि अपने परिवारों के जरिए वे शासन करेंगे और किसी दूसरे के शासन में नहीं रहेंगे. ऐसे में आम मतदाताओं को यह समझने की जरूरत है कि उन्हें ऐसा राजनीतिक निर्णय लेना होगा जिससे समानता और न्याय के लोकतांत्रिक सिद्धांत स्थापित हो सकें और वंशवादी राजनीति की जड़ें कमजोर हो सकें.

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