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कानूनी प्रक्रिया से बढ़ती दूरी

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बलात्कार के चार आरोपियों के पुलिस मुठभेड़ के बाद पुलिस और तेलंगाना सरकार को थोड़ी विश्वसनीयता हासिल हुई होगी। इससे पीड़िता के परिजनों को भी थोड़ी राहत मिली होगी। लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि इस तरह के मुठभेड़ से कानून को लागू करने वाली एजेंसी पुलिस और न्याय करने वाली न्यायपालिका के बीच एक तरह का द्वंद पैदा होता है। इस घटना से विधायक और राजनीतिक नेता की दूरी भी खत्म होती दिख रही है। विधायिका के सदस्यों से यह उम्मीद की जाती है कि वे कानून बनाएंगे। इस प्रक्रिया में वे संवैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करेंगे। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे सार्वजनिक तौर पर अपनी राय देते वक्त कानूनी प्रक्रियाओं का ध्यान रखेंगे। लेकिन इस मामले में विधायिका के कुछ सदस्य इस बात को भूलते हुए नजर आए। विधायिका के कुछ लोगों ने इस मामले के आरोपियों को तुरंत मारने की बात की तारीफ की।

जल्दबाजी में पुलिस ने जो कदम उठाए, उसे देखते हुए विधायिका के सदस्यों से यह उम्मीद की जा रही थी कि वे कानूनी प्रक्रियाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी प्रतिक्रिया देंगे। लेकिन संविधान का पालन करने की शपथ लेने वाले ये लोग संविधान की मूल भावना का ही अनादर करते दिखे। पुलिस की कार्रवाई में प्रक्रियाओं के पालन के संबंध में कई तरह की बातें हो रही हैं। कानून के कई विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिस ने ऐसी कार्रवाई करके तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया।

इस मुठभेड़ के मामले में पुलिस और न्यायपालिका आपसी विरोध की स्थिति में आ गए हैं। पुलिस ने यह कार्रवाई करके न्यायपालिका की वैधता पर सवाल खड़े किए हैं। इस तरह की घटनाओं से लगता है कि पुलिस ने इस मामले की जांच को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी सावधानी नहीं बरती थी जिससे आगे की कानूनी प्रक्रियाओं के जरूरी आरोपियों को सजा दिलाई जा सके। इस त्वरित कार्रवाई ने कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी की है। इससे तय कानूनी प्रक्रियाओं की अनदेखी हुई है।



इस प्रक्रिया के तहत पुलिस से भी उसकी कार्रवाई के लिए जवाब मांगा जाना चाहिए और विधायिका के सदस्यों से भी उनके बयान के लिए जवाब की मांग होनी चाहिए। इन्हें न्यायिक प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसमें अगर कोई गलती का दोषी पाया जाता है तो उसे कठोर सजा का सामना करना पड़ेगा। पुलिस की कार्रवाई ने न्यायपालिका से आरोपियों को दोषी ठहराने का हक छीन लिया।



इसी वजह से कई प्रमुख वकीलों ने पुलिसिया कार्रवाई को लेकर गंभीर आपत्तियां जताईं। पुलिसिया कार्रवाई की वजह से आम लोगों को कानूनी प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक करने का अवसर भी छीन लिया। वैसे भी न्यायिक प्रक्रिया और संविधान के मूल्यों के प्रति अपेक्षाकृत कम जागरूकता है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या कानून लागू करने वाली एजेंसियां आम लोगों में कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति सम्मान का भाव स्थापित करना चाहती हैं या नहीं? आपराधिक मामलों में जो भी कार्रवाई हो वह संविधान के दायरे में होनी चाहिए। लेकिन पुलिस ने इसके पालन की परवाह नहीं की। इस मामले में पुलिस का 'आत्मरक्षा' का तर्क सही नहीं लग रहा क्योंकि इस मामले को अंजाम देने वालों के अलावा इस घटना का कोई और गवाह नहीं है।

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