नागरिकता संशोधन विधेयक की पड़ताल

सीएबी ने कई वैसी बातों को उजागर किया है हमारे समाज की विविधता को कमतर साबित करने वाली हैं

 

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नागरिकता संशोधन विधेयक को संसद की दोनों सदनों ने पारित कर दिया। हालांकि, यह विधेयक संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ है और इससे देश का सामाजिक तानाबाना भी प्रभावित होता है। यह कानून सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाने वाला है।

ऐसा इसलिए क्योंकि इसके जरिए कौन भारतीय है, ये तय करने के लिए भेदभाव और मनमानी वाले रवैये को बढ़ावा मिलेगा। संविधान निर्माताओं ने इसके लिए उचित रास्ता अपनाया था। लेकिन अभी के सत्ताधारी यह तय करने के लिए संकीर्ण रवैया अपना रहे हैं। यह एक विचित्र विडंबना है लेकिन हैरान करने वाला नहीं है। इसमें अल्पसंख्यकों के प्रति चिंता दिखाकर सब कुछ किया जा रहा है। इन दावों की पड़ता जरूरी है। क्योंकि इससे ही सत्ताधारी पार्टी के दावों की पोल खुलेगी।

इस कानून का लक्ष्य यह है पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से उत्पीड़ने की वजह से भागने वाले हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों को नागरिकता दी जाएगी। यह एक बार तो तारीफ करने लायक लगता है। लेकिन इसमें पड़ोसी देशों के कुछ संप्रदायों को शामिल नहीं किया जाना संवैधानिक बाध्यता पर सवाल खड़े करता है। तीन पड़ोसी देशों के चयन के लिए भी यह तर्क दिया गया कि ये तीनों मुस्लिम देश हैं। लेकिन इस तर्क के हिसाब से श्रीलंका और भूटान को भी शामिल किया जाना चाहिए था। क्योंकि इन दोनों देशों का राजकीय धर्म बौद्ध है। बड़ी संख्या में श्रीलंका से हिंदू और मुस्लिम आए हैं जो शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। वहां बहुसंख्यकों द्वारा अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाएं भी हुई हैं। इसी तरह से पाकिस्तान और अफगानिस्तान में क्रमश: अहमदिया और हजरस मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदाय के उत्पीड़न को नजरअंदाज किया गया। यही बात म्यांमार के रोहिंग्या समुदाय के लिए भी सच है। क्या धर्म को आधार बनाना भारतीय संविधान के अनुच्छेद—14 के अनुकूल है जिसके तहत कानून के समक्ष समानता की बात की गई है? इस कानून में धार्मिक उत्पीड़न को भी परिभाषित नहीं किया गया है। अगर वाकई चिंता उत्पीड़न की होती तो उत्पीड़ित अल्पसंख्यक या उत्पीड़ित समाज जैसी शब्दावली का इस्तेमाल होता। क्योंकि तब इसके दायरे में वे भी आते जो किसी धर्म को नहीं मानते। यह काम संयुक्त राष्ट्र के समझौतों को आधार बनाकर किया जा सकता था।

हालांकि, इस विधेयक में जिस तरह से भेदभाव और मनमानी अपनाने का रुख दिखाया गया है, उससे लगता है कि इसमें चिंता दूसरे देशों से आने वाले अल्पसंख्यकों के बजाए देश के अल्पसंख्यकों को निशाने पर लेने की इच्छा अधिक है। सीएबी को राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर यानी एनआरसी से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सत्ताधारी दल के नेता दोनों को एक—दूसरे से जुड़ा हुआ मसला मानते हैं। हालांकि, दोनों की पृष्ठभूमि अलग—अलग है। सत्ताधारी पार्टी ये कह रही है कि अगर किसी को सीएबी में शामिल किया गया है और एनआरसी में शामिल नहीं किया तो उन्हें दूसरे ढंग से नागरिकता दी जा सकती है। वहीं सीएबी से बाहर रहने वालों के लिए यह स्पष्ट संकेत दिया जा रहा है कि उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक की तरह माना जाएगा। उन्हें अनिश्चितताओं और असुरक्षाओं का सामना करना होगा। इसमें हमारे समाज की विविधता के प्रति हिकारत का भाव भी दिखता है। इन अंतर्विरोधों के प्रबंधन को लेकर भाजपा के अतिआत्मविश्वास की वजह से असम से शुरू हुई विरोध की आग पूरे देश में फैल गई है। विविधताओं से भरे समाज में नागरिकों को एक—दूसरे के खिलाफ खड़ा करने की रणनीति लंबे समय तक काम नहीं कर सकती। लेकिन इससे सामाजिक समरसता के लिए संकट जरूर पैदा होता है। समाज का अमन—चैन भी प्रभावित होता है। अगर समाज में सरगर्मी बनाए रखने की सत्ताधारी पार्टी की प्रवृत्ति को रोकना है तो बहुसंख्यक हिंदुओं को ही खड़ा होना होगा। क्योंकि सत्ताधारी पार्टी इनके नाम पर ही ये सब कर रही है। लेकिन इस वर्ग को यह समझना होगा कि मौजूदा विधेयक संवैधानिक मूल्यों के लिए खतरा है और इस वर्ग को इन मूल्यों की रक्षा के लिए मजबूती से खड़ा होना होगा।  

 
 

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