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गलत तरह के न्याय की मांग

महिलाओं पर यकीन करने के लिए समाज को किसी निर्मम आपराधिक घटना की जरूरत क्यों पड़ती है?

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जब तक कोई निर्मम घटना नहीं हो जाती है तब तक हम मूकदर्शक बने रहते हैं। इसके बाद हम रातोंरात न्याय के लिए लड़ने वाले योद्धा में तब्दील हो जाते हैं। हैदराबाद में एक पशुचिकित्सक की बलात्कार और हत्या की घटना ने पूरे देश को हिला दिया है। 2012 में दिल्ली के निर्भया मामले के बाद ऐसी घटना नहीं हुई थी। इस घटना के आरोपी पुलिस मुठभेड़ में मारे गए हैं। इससे संबंधित विवरण अभी आना बाकी है।
2012 के मामले के बाद आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 या निर्भया कानून पारित हुआ। पुलिस हेल्पलाइन स्थापित किए गए। जस्टिस वर्मा समिति ने ऐसे संशोधनों की सिफारिश की थी जिससे यौन उत्पीड़न के मामलों में जल्दी न्याय मिल सके। इसके बावजूद 2012 से अब तक कई बलात्कार हुए। दिल्ली, उन्नाव, कठुआ और अब हैदराबाद। लेकिन हमारी भावनाएं तब ही उद्वेलित होती हैं जब बलात्कार के बाद हत्या कर दी जाए। जब तक ऐसा नहीं होता हम तरह-तरह के तर्क तलाशते हैं। लेकिन जब ऐसा हो जाता है तब हम अन्याय की बात करते हैं।
यही वजह है कि पारंपरिक मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक इन घटनाओं को विचलन के तौर पर पेश किया जा रहा है। ऐसे मामलों को सनसनीखेज बनाकर पेश किया जाता है और इससे टीआरपी बढ़ती है। वेबसाइट के पेज व्यूज बढ़ते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में कुछ व्यक्तियों पर आरोप लगाया जाता है न कि पूरे समाज पर।
जब से हैदराबाद की पीड़िता का जला हुआ शव मिला तब से नेताओं से लेकर फिल्मी कलाकारों तक ने इस पर अपना गुस्सा जाहिर किया। तेलंगाना के गृह मंत्री ने कहा कि अगर पीड़िता ने अपनी बहन को फोन लगाने के बजाए पुलिस को फोन लगाया होता तो वह खुद को बचा सकती थी। लेकिन ऐसे बयान इन घटनाओं के प्रति संवेदनहीनता को ही दिखाते हैं। इस मामले में जिन चार लोगों को हिरासत में लिया गया, उनमें से एक के मुस्लिम होने की बात जानकार इस पूरे समुदाय को निशाने पर लिया गया। इस तरह के रवैये से महिलाओं की दिक्कतों के प्रति ध्यान बंटता है।
आरोपियों को तुरंत फांसी पर लटका देने की मांग शुरू हुई। मृत्यु दंड देने की मांग करने वालों में दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष भी शामिल थीं। जब भी ऐसी घटनाएं होती हैं तो मृत्यु दंड को भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने का उपाय माना जाता है। जबकि इस सजा का प्रावधान ‘दुर्लभतम’ मामलों में है। लेकिन यह तय कौन करेगा? बलात्कार और यौन अपराधों के प्रति समाज के रवैये को देखकर लगता है कि एक निश्चित सीमा में होने पर इनसे समाज को दिक्कत नहीं होती। लेकिन हम सिर्फ इन दुर्घटनाओं को अंजाम देने वालों को दानव कहकर खुद को अपनी जिम्मेदारियों से अलग कर रहे हैं। अपनी गलतियों से हम अपना मुंह चुरा रहे हैं।
इस समस्या की जड़ में सांस्कृतिक वजहें हैं। लैंगिक संबंधों की जो स्थिति है, वह इस समस्या के मूल में है। नारीवादी कार्यकर्ता इसके बारे में जागरूकता फैलाने की कोशिश करते रहते हैं। लेकिन इसके बावजूद गुस्सा भारी पड़ जाता है। पुरुषवादी सोच और लैंगिक भेदभाव को दूर करने जैसी मूल समस्याओं का समाधान करने की बजाए पूरा ध्यान ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार दानवों को मिटाते हुए खुद को अलग करने पर चला जाता है। ऐसा करने की प्रक्रिया में एक समाज के तौर पर हम नाकाम हो जाते हैं। हर घटना पर हम गुस्से और हिंसा के साथ प्रतिक्रिया देते हैं। हम ये नहीं समझ पाते कि हर दिन का अन्याय ऐसी घटनाओं की पृष्ठभूमि तैयार करता है। हम मीटू जैसे आंदोलनों को गलत ठहराने लगते हैं। हम तब तक महिलाओं की समस्याओं को सही नहीं मानते जब तक कोई निर्मम घटना न हो जाए।
हम यौन उत्पीड़न को ‘सुरक्षा’ से संबंधित मसला मानते हैं। हम महिलाओं पर ही ये जिम्मेदारी डाल देते हैं कि वे खुद को सुरक्षित रखें। जो बातें अभी कही जा रही हैं, वे पहले भी कही गई हैं। इसलिए नया कहने को कुछ भी नहीं है। समस्या उनसे संबंधित है जिन्हें सुनने की जरूरत है। लेकिन वे ठीक से सुन नहीं रहे हैं।

 
 
Updated On : 12th Feb, 2020

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