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गहराती आर्थिक मंदी

विस्तारवादी वित्तीय प्रोत्साहन पैकेज देने से ही अर्थव्यवस्था में व्यापक मांग में बढ़ोतरी होगी

 

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सरकार द्वारा कई कदम उठाने के बावजूद जुलाई-सितंबर, 2019 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी और गहराई। पहली तिमाही के 5 प्रतिशत के मुकाबले दूसरी तिमाही में जीडीपी की दर 4.5 फीसदी हो गई। विकास दर लगातार छह तिमाही से कम होती जा रही है। इस दौरान इसमें 3.6 फीसदी की कमी आई है। मौजूदा जीडीपी सीरिज में वित्तीय वर्ष 2013 की आखिरी तिमाही में जीडीपी की दर 4.3 फीसदी थी। 4.5 फीसदी की दर उसके बाद सबसे कम दर है।

इससे पता चलता है कि मांग कमजोर है। सरकार खर्च बढ़ा रही है लेकिन फिर भी स्थितियां खराब होती जा रही हैं। ऐसा इसलिए भी हो रहा है कि खपत में तेजी आ नहीं रही और निवेश के मामले में भी हलचल नहीं हो रही है। वार्षिक स्तर पर गणना करके जो हिसाब लगाया गया है उसके हिसाब से जीडीपी की दर 3.6 फीसदी है। खर्चों के ट्रेंड को देखें तो पहली तिमाही में इसमें 3.1 फीसदी की तेजी दिखी जबकि दूसरी तिमाही में 5 फीसदी की। लेकिन यह वृद्धि इसलिए समझ में नहीं आ रही क्योंकि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों से खपत में तेजी की जानकारी नहीं मिल रही है। हालांकि, सरकार ने खपत से संबंधित अपने खर्चों को पहली तिमाही में 8.8 फीसदी बढ़ाया वहीं दूसरी तिमाही में यह बढ़ोतरी 15.6 फीसदी रही। काॅरपोरेट कर्जों और बैंकों की एनपीए जैसी समस्याओं से निवेश का माहौल गड़बड़ बना हुआ है। भारत में कर्ज देने की स्थिति ठीक नहीं होने की वजह से निवेश की स्थिति गड़बड़ है। इससे आर्थिक संकट के दीर्घकालिक होने की आशंकाएं पैदा हो गई हैं।

जीवीए के लिहाज से देखें तो अर्थव्यवस्था की विकास दर पिछली तिमाही में 4.9 फीसदी के मुकाबले 4.3 फीसदी रही। उत्पादक क्षेत्रों में विकास के संकेत दिखे लेकिन स्थितियां अब भी चिंताजनक हैं। कृषि की विकास दर पहली तिमाही के 2 फीसदी के मुकाबले दूसरी तिमाही में 2.1 फीसदी रही। वहीं खनन की विकास दर पहली तिमाही के 2.1 फीसदी के मुकाबले दूसरी तिमाही में 0.1 फीसदी रही। कमोबेश यही स्थिति दूसरे क्षेत्रों की भी रही।

अनौपचारिक क्षेत्र भी इससे बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। लेकिन यह आधिकारिक आंकड़ों में नहीं दिखा है। श्रम बाजार पर भी आर्थिक मंदी का असर पड़ा है। सेंटर फाॅर माॅनिटरिंग इंडियन इकाॅनोमी के आंकड़ों के मुताबिक बेरोजगारी की दर अक्टूबर महीने में तीन साल के उच्चतम स्तर 8.45 फीसदी पर पहुंच गई। सितंबर और अगस्त के महीने में यह दर क्रमशः 7.16 फीसदी और 8.19 फीसदी थी। सीएमआईई के उपभोक्ताओं से संबंधित सर्वेक्षण से यह पता चलता है कि श्रम बल भागीदारी दर में 77 आधार अंकों की गिरावट आई है और यह आंकड़ा नवंबर में 42.37 प्रतिशत पर पहुंच गया है। जनवरी, 2016 के बाद यह न्यूनतम स्तर है। 15 राज्यों में यह गिरावट दर्ज की गई है। नौकरी और आमदनी में कमी होने की वजह से खपत में कमी आई है। इसकी एक प्रमुख वजह ग्रामीण क्षेत्रों का संकट भी है।

जब पहली तिमाही के आंकड़े आए थे, उसके बाद मांग बढ़ाने के लिए जो काम किए जाने चाहिए थे, वे नहीं किए गए। न ही प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधी योजना को सही ढंग से लागू किया गया और न ही प्रधानमंत्री रोजगार गारंटी योजना के बकाये के भुगतान की चिंता की गई। अब यह बकाया बढ़ता हुआ 25,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है। इन सब मोर्चों पर सुधार की जरूरत है लेकिन यह हाल-फिलहाल होता हुआ नहीं दिख रहा है।

आसान घरेलू वित्तीय शर्तों और वित्तीय प्रोत्साहन के जरिए स्थितियों को सुधारने की दिशा में बढ़ा जा सकता है। विस्तारवादी वित्तीय नीतियों को अपनाना होगा। सकल मांग को बढ़ाने के लिए मौद्रिक नीतियों को भी अपना काम करना होगा। ब्याज दरों में कटौती का लाभ ग्राहकों तक पहुंचना चाहिए। हालांकि, उम्मीदों से परे जाते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने रेपो दर पर 5 दिसंबर को यथास्थिति बनाए रखने की घोषणा की। पिछले नौ महीनों में इसमें 135 आधार अंकों की कमी की गई है। वित्तीय वर्ष 2020 के लिए जीडीपी की दर के अनुमान को रिजर्व बैंक 6.1 फीसदी से घटाकर 5 फीसदी कर दिया है। वहीं खुदरा महंगाई के अनुमानों को भी 5.1 प्रतिशत से 4.7 प्रतिशत के दायरे से घटाकर 3.5 प्रतिशत से 3.7 प्रतिशत के दायरे में लाने की घोषणा की गई है। वित्तीय घाटे का जो लक्ष्य था, अक्टूबर में ही घाटा उसके पार चला गया। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार वित्तीय घाटे के 3.3 फीसदी के लक्ष्य में बदलाव करे। क्योंकि इस पर टिके रहने से सरकार को अपने खर्चों में और कटौती करनी पड़ेगी और इससे विकास दर पर नकारात्मक असर पड़ेगा।

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