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सस्ती जिंदगी, महंगा कारोबार

भारत के कारोबारी शहरों की कीमत गरीब और पलायन करके आने वाले श्रमिक चुका रहे हैं

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

भारत के शहरों में आग लगने की कई दुर्घटनाएं हुई हैं। अस्पतालों में भी कई ऐसी घटनाएं हुई हैं। रेस्टोरेंट, पब और छोटे—बड़े होटल भी इसके शिकार हुए हैं। इन दुर्घटनाओं में लोगों की जान भी गई है और संपत्तियों का भी नुकसान हुआ है। ऐसी घटनाओं की लंबी सूची हैं। लेकिन तीव्र शहरीकरण के पक्षधर लोग कानून और पर्यावरणीय नुकसानों की चिंता नहीं कर रहे हैं। 'ईज आॅफ डूइंग बिजनेस' के पैरोकारों ने भी शहरीकरण के कीमतों की चिंता नहीं की है। कहा जाता है कि इन वजहों से कारोबार करने वालों पर दबाव नहीं बनाया जा सकता क्योंकि अगर कारोबार बंद होगा तो इससे श्रमिकों का रोजगार जाएगा।



विडंबना यह है कि शहरों में रहने वाले भारत के गरीब और श्रमिक वर्ग के लोगों की तारीफ इसलिए होती है कि वे चुनौतीपूर्ण माहौल में भी काम करते रहते हैं। मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों के माहौल के लिए उनकी सहनशीलता की तारीफ होती है। दिल्ली के अनाज मंडी में 8 दिसंबर, 2019 को आग लगने के बाद दम घुटने से 43 मजदूरों की मौत की दुर्घटना हुई। इस दुर्घटना से कई सवाल उठते हैं।



सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि जिस माहौल में ये मजदूर काम करने को बाध्य हैं, उसमें इनके सामने कोई दूसरा विकल्प है या नहीं। क्योंकि सच्चाई तो यह है कि अपनी सुरक्षा और सुविधा को ध्यान में रखे बगैर ये मजदूर काम करने को बाध्य हैं। इस दुर्घटना में जिन मजदूरों की जान गई, उनमें से अधिकांश उत्तर प्रदेश और बिहार से आए हुए मजदूर थे। वे उसी फैक्टरी में काम करते हुए थैले, टोपी और कपड़े बनाते भी थे और उसी में रहते भी थे। वे राष्ट्रीय राजधानी में बहुत तंग रिहायशी इलाकों में रह रहे थे।



भारत के शहरी केंद्रों के विकास में गरीब मजदूरों और प्रवासी मजदूरों की क्षमताओं और सहनशीलता के योगदान को स्वीकार किया जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि उनके रोजगार के स्थल कारोबारी ईकाई तो हैं लेकिन वे असुरक्षित और जोखिम वाले भवनों में हैं। नौकरी छूटने के भय से वे असंभव माने जाने वाले घंटों में भी काम करने को विवश हैं। इन ईकाइयों को चलाने में सुरक्षा और पर्यावरणीय नियमों की जमकर अनदेखी की जाती है। मजदूरों की जिंदगी को सस्ता माना जाता है और इसमें भी प्रवासी मजदूरों की जिंदगी की कीमत तो और भी काम मानी जाती है। जटिल कानूनों को लागू करने में ऐसी ईकाइयां अपनी असमर्थता जताती हैं और यह माना जाता है कि अगर इन्हें बहुत बाध्य किया गया तो इससे नौकरियों में कमी आएगी।



अनाज मंडी की फैक्टरी में लगी आग में इससे जुड़ा हर आयाम उजागर हो गया। तीव्र और अनियोजित शहरीकरण की कीमत गरीब लोग चुका रहे हैं। कम मजदूरी पर काम करने वाले ये लोग कारोबार की लागत को कम बनाए रखते हैं। कायदे से तो रिहायशी इलाकों में प्रदूषण नहीं फैलाने वाली इकाइयां ही काम कर सकती हैं। लेकिन सरकारी एजेंसियों में काम करने वाले लोगों की शह पर ये कायदे सिर्फ कागज पर ही रह पाते हैं। मीडिया ने इस मामले में सबसे खराब बात यह कि अनाज मंडी में श्रम विभाग इसलिए जांच नहीं कर सकता था क्योंकि यह अवैध था। एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से यह कहा गया कि वे उन ईकाइयों की ही जांच कर सकते हैं जो उनके साथ पंजीकृत हों।



अनाज मंडी का भवन रिहायशी इलाके में था। मीडिया में बताया गया कि यहां मिश्रित उपयोग की मंजूरी थी। अनुमति सिर्फ भूतल के लिए दी गई थी। लेकिन इस मामले में पूरे भवन का कारोबारी इस्तेमाल किया जा रहा था। वह भी बगैर किसी लाइसेंस के। अग्निशमन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिला था। भवन की योजना को भी मंजूरी नहीं मिली थी। आग लगने वाली कई वस्तुएं वहां मौजूद थीं।



8 दिसंबर को आग लगने के बाद राजनीति दलों और नेताओं में आर्थिक मुआवजा घोषित करने और आरोप—प्रत्यारोप की होड़ लग गई। किसी भी ऐसी दुर्घटना के बाद ये सब आम है। यही पार्टियां अवैध कॉलोनियों की वकालत करती हैं। वह भी खास तौर पर चुनावों के वक्त। अग्निशमन सेवाओं को दुरुस्त करने जैसी बुनियादी सुविधाओं को ठीक करने पर कोई बात नहीं होती।  



अनाज मंडी जैसी दुर्घटनाओं के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए जो करना चाहिए, वो करने का वक्त न तो मीडिया के पास है और न ही सिविल सोसाइटी के पास। दिल्ली में उपहार सिनेमा में आग लगने की घटना के पीड़ितों को न्याय के लिए 18 साल तक न्यायिक लड़ाई लड़नी पड़ी। जो नतीजा आया, वह उनके गुस्से और धैर्य का मजाक उड़ाने वाला था। अनाज मंडी की दुर्घटना के पीड़ितों को कुछ ही दिनों में भुला दिया जाएगा।

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