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पारदर्शिता और चुनावी बाॅन्ड

भारत की चुनावी प्रक्रिया में क्या पारदर्शिता के साथ जवाबदेही आएगी?

 

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फिर से एक बार चुनावी बाॅन्ड को लेकर हो-हल्ला क्यों मचा है? क्या हमें यह नहीं मालूम है कि इसे कई कानूनी हेरफेर के जरिए सरकार ने लाया था? याद कीजिए चुनाव आयोग की 27 मई, 2017 के उस पत्र को जो आयोग ने केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्रालय को लिखा था। इसमें वित्त अधिनियम में संशोधन के प्रति चेताया गया था और कहा गया था कि कंपनियां इन प्रावधानों का इस्तेमाल मनी लांडिं्रग के लिए कर सकती हैं। दिल्ली के गैर सरकारी संगठनों में जनहित याचिका दायर करके यह बताने की कोशिश की थी कि संवैधानिक कायदों का उल्लंघन करके सरकार ऐसा कर रही है।



इन गंभीर आपत्तियों के बावजूद चुनावी बाॅन्ड सच्चाई बन गया। केंद्र सरकार इसके पक्ष में ‘पारदर्शिता’, ‘साफ धन’ और ‘दानदाताओं की पहचान उजागर नहीं होने’ जैसे तर्क देती रही। लेकिन यह सब करते हुए इनकी खामियों को नजरंदाज किया गया है। ऐसी पारदर्शिता का क्या मतलब जिसमें सब कुछ थोड़ा ध्यान देने पर दिख जाए। इसमें फिर दान देने वाले की पहचान भी गोपनीय नहीं रहेगी। इसमें पारदर्शिता का भी स्पष्ट अभाव दिखता है। इसके तहत दान लेने के लिए नेटवर्क का सहारा लिया जाएगा। चुनावों से काला धन दूर करने का दावा भी खोखला लगता है। हाल ही में हफपोस्ट ने इस बारे में जो पड़ताल की है, उससे इसकी सच्चाई खुलकर सामने आ जाती है। लेकिन एक सवाल लाजिमी है कि क्या ये प्रमाण ऐसे हैं जिससे राजनीतिक विमर्श उस दिशा में बढ़े जिसमें मौजूदा सरकार द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों के हनन पर विमर्श हो? इस बारे में चिंता की कई तरह वजहें हैं।



पहली वजह तो भारत के चुनावी लोकतंत्र की प्रकृति है। इसमें धनबल काफी प्रमुखता लेता जा रहा है। इसके जरिए सत्ता हासिल करने की होड़ में भ्रष्ट लोग शामिल होते जा रहे हैं। इससे सही लोगों के लिए इनका मुकाबला करना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में विपक्षी पार्टियों की ओर से मूल्यों की बात खो जा रही है।



दूसरी बात यह कि ऐतिहासिक तौर पर भारत में चुनावी बाॅन्डों का इस्तेमाल पहले के उन आयों को लगाने के लिए होता आया है जिनकी घोषणा पहले नहीं की गई। इससे सरकारी खजाने में काला धन चला आता है। ऐसी योजनाओं जाहिर तौर पर छूट के साथ आती हैं। हाल ही में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन ने चुनावी ट्रस्ट की परिकल्पना को अपने काॅरपोरेट दानदाताओं की सुविधा के लिए की थी। इसलिए चुनावों में लगने वाले पैसों के भ्रष्टाचार के लिए अकेले मौजूदा सरकार को ही सारा दोष नहीं दिया जा सकता है।



चिंता की तीसरी बात यह है कि मौजूदा सरकार ने ‘विदेशी स्रोत’ की नई परिभाषा को एफसीआरए, 2010 लागू होने के दिन से ही प्रभावी बना दिया है। इससे इसके राजनीतिक विरोधियों को भी राहत मिलेगी। एसोसिएशन आॅफ डेमोक्रेटिक रिफाॅम्र्स के 2014 के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को वेदांता रिसोर्सेज से गलत ढंग से विदेशी दान लेने का दोषी माना था। अगर एफसीआरए का संशोधन विपक्षी पार्टियों के लिए भी अनुकूल है तो फिर वे क्यों इसका विरोध करेंगी?



विपक्ष की ओर से कोई विरोध नहीं होते देख सरकार इस योजना पर आगे बढ़ने के लिए प्रतिबद्ध दिख रही है। अगर इस पूरे तंत्र में पारदर्शिता होती तो सरकार को अपने इस कार्य के लिए शर्मशार होना पड़ता। भारत में चुनावी प्रक्रियाओं को भ्रष्ट बनाने में हर सरकार इस तरह से संलिप्त रही है कि कोई भी इस पर कुछ बोल नहीं सकता। लेकिन फिर भी मौजूदा सरकार ने पारदर्शिता खत्म करने में जितनी प्रतिबद्धता दिखाई है, वह चिंताजनक है।



सरकार ने पारदर्शिता का एक भ्रम पैदा किया है। इसमें संस्थानों की जवादेही ही खत्म हो जाती है। हालांकि, सामाजिक संस्थाएं पारदर्शिता के लोकतांत्रिक अधिकार की मांग उठा रही हैं लेकिन हमें यह समझना होगा कि यह एक व्यवस्थागत मसला है। यह तब ही सुनिश्चित हो पाएगी जब सत्ता में बैठे लोग और सामाजिक संगठन संस्थाओं की जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने का काम करें।

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