महाराष्ट्र में राजनीतिक बदलाव

भारतीय जनता पार्टी एकरूपता की परियोजना ने महाराष्ट्र में विविध राजनीतिक प्रयोगों के मार्ग खोल दिए

 

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महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के महीने भर से अधिक बाद प्रदेश में एक नई सरकार बनी। शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस की गठबंधन सरकार एक अलग तरह का प्रयोग है। तकनीकी तौर पर कहें तो शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी के चुनाव पूर्व गठबंधन को बहुमत मिला था लेकिन यह गठबंधन सरकार नहीं बना पाई।

ऐसे में जवे राजनीतिक परिस्थितियां बनीं, उसमें इन तीनों पार्टियों का एक अभूतपूर्व गठबंधन हुआ। ऐसा इसलिए क्योंकि ये पार्टियां धुर विरोधी रही हैं। भाजपा की एकरूपता वाली नीतियों की प्रतिक्रिया में यह गठबंधन बना है। इस गठबंधन को सिर्फ अवसरवादिता के चश्मे से देखना ठीक नहीं है। हमें यह समझना होगा कि सक्रिय राजनीति में व्यावहारिक विकल्पों की ओर भी देखना पड़ता है। क्योंकि अगर ऐसा नहीं होगा तो दूसरी ताकतें उस जगह को भर देंगी। अगर ऐसा नहीं हो पाता तो भाजपा प्रदेश में सरकार बनाती। ऐसे में इस तरह का गठजोड़ न सिर्फ इन तीन पार्टियों के लिए जरूरी था बल्कि मुश्किलों का सामना कर रही जनता की दृष्टि से भी जरूरी था। इस गठबंधन के सूत्रधार एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार रहे। अभी तक कांग्रेस पार्टी ने विपक्षी पार्टी के तौर पर बहुत सक्रिय रुख नहीं दिखाया था। इसलिए वह राजनीतिक एजेंडा नहीं निर्धारित कर पाई। इस बार संभवतः पवार की सलाह पर कांग्रेस ने दीर्घकालिक फायदों के लिए जूनियर पार्टनर बनने की बात मान ली। अब जिस तरह से भाजपा अपने रुख में लचीलेपन को कम करते जा रही है, उसमें कांग्रेस ने इस लचीले रुख को अपनाए रखा तो वह भाजपा के खिलाफ एक मजबूत विपक्षी गठबंधन खड़ा कर सकती है।

सत्ताधारी पार्टी बहुलतावाद को खारिज करके एकरूपता कायम करने की योजना पर काम कर रही है। ऐसी योजना से विविधता के साथ ही निपटा जा सकता है। हालांकि, सत्ताधारी पार्टी जिस तरह की चालाकी दिखा रही है, उसमें विपक्ष के प्रयोगों की सीमाएं भी हैं। लेकिन अतिआत्मविश्वास में भाजपा गलती भी कर रही है। महाराष्ट्र में आनन-फानन में 23 नवंबर को अपनी सरकार को शपथ दिलाना ऐसी ही एक गलती थी। उन्हें लग रहा था कि धनबल और दबाव की रणनीति के जरिए वे विपक्ष में फूट डाल देंगे। लेकिन लोकतंत्र में जमीनी जनबल की राजनीति का कोई विकल्प नहीं है। जिस तरह की बेचैनी भाजपा सत्ता में बने रहने के लिए दिखा रही है, उससे लगता है कि उनकी योजनाओं के लिए सत्ता में बने रहना कितना जरूरी है।

भाजपा की योजनाओं को नाकाम बनाने के बाद तीन दलों की इस गठबंधन सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह लोगों का भरोसा हासिल करे। इसके लिए उसे काम करना होगा। समान न्यूनतम कार्यक्रम में जिन नीतियों की बात की गई है, उन्हें लागू करना होगा। जो लोग संकटों का सामना कर रहे हैं, उन्हें तुरंत राहत देनी होगी। साथ ही उसे भाजपा और मीडिया के एक तबके द्वारा बिछाए जा रहे जाल से बचते हुए काम करना होगा। एनसीपी और कांग्रेस ने अपनी विचारधारा से बिल्कुल अलग विचारधारा वाली पार्टी से गठबंधन किया है। ऐसे में इन तीनों पार्टियों को वैचारिक स्तर पर स्पष्टता के साथ चलना होगा। इस सरकार में ‘रणनीतिक लचीलेपन और वैचारिक प्रतिबद्धता’ के मूलमंत्र के साथ आगे बढ़ते रहना होगा।

 
 

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