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राजनीति की स्थिति

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महाराष्ट्र की राजनीतिक स्थिति दो बातों पर आधारित होकर तीन पार्टियों कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और शिव सेना को साथ ले आई है। इसमें पहली बात यह है कि इन तीनों पार्टियों को अनिवार्य तौर पर राज्य में सरकार बनानी चाहिए। वहीं दूसरी बात यह है कि तीनों पार्टियों को सरकार बनानी चाहिए। यहां 'अनिवार्य' शब्द जरूरत को रेखांकित करने वाला है तो 'चाहिए' इच्छा को। ये तीनों पार्टियों इन बातों के बीच डोलती रहीं और राजनीतिक तौर पर सही होने की बात करने वाले लोगों के लिए यह बात पचने लायक नहीं रही कि कांग्रेस और एनसीपी को शिव सेना के साथ मिलकर सरकार बनानी चाहिए। ये मानते थे कि इन्हें 'अनिवार्य' तौर पर ऐसी सरकार नहीं बनानी चाहिए। इस सोच में एक दिशा तय कर दी गई और बातचीत की कोई संभावना नहीं रही। वहीं कुछ राजनीतिक टिप्पणीकार राजनीति की 'शुद्धता' की बात करते हुए यह कह रहे थे कि तीनों पार्टियां मिलकर सरकार बनाने की पात्र नहीं हैं। इस विचार के मुताबिक कांग्रेस और एनसीपी दोनों पार्टियां 'धर्मनिरपेक्षता' के मामले में बुरी स्थिति में हैं। लेकिन इस बीच तीनों पार्टियों में बातचीत जारी है और मीडिया रिपोर्टस की मानें तो ये सरकार बनाने की दिशा में बढ़ रही हैं।



हालांकि, इनके बीच बातचीत अभी अंतिम रूप नहीं ले पाई है ताकि सरकार बनने का रास्ता साफ हो। लेकिन जिस ढंग से इन पार्टियों के बीच बातचीत चल रही है, उससे यही लगता है कि तीनों पार्टियां इस बात पर सहमत हैं कि सरकार बनाना एक व्यावहारिक अनिवार्यता बन गई है। कांग्रेस और एनसीपी की ओर से जो बात आ रही है, उसमें यह पता चलता है कि दोनों पार्टियां पूरी सतर्कता के साथ चलना चाह रही हैं। इससे बातचीत के असंभव होने की संभावना खत्म होती है। बातचीत में देरी से यह भी लग रहा है कि दोनों पार्टियां यह चाहती हैं कि शिव सेना हिंदुत्व पर अपने रुख को नरम करे। इससे यह बात भी निकल रही है कि बहुलतावाद और सांप्रदायिक सौहार्द पर मोलभाव नहीं हो सकता लेकिन अपवाद की परिस्थिति में इन्हें साइनपोस्ट की तरह रखकर काम किया जा सकता है। इस संबंध में यह दिलचस्प है कि शिव सेना प्राकृतिक आपदा से प्रभावित किसानों को राहत पहुंचाने की बात कर रही है। इस वजह से संभव है कि हिंदुत्व के मसले पर शिव सेना का रुख नरम हो। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शिव सेना अपने रुख में बदलाव लाएगी? क्योंकि इसका अतीत प्रतिक्रियावादी रहा है। कांग्रेस और एनसीपी के संदर्भ में यह सवाल प्रासंगिक है कि क्या ये दोनों पार्टियां अपनी राजनीति में जिम्मेदारी की प्रतिबद्धता दिखाएंगी? इन पार्टियों से सीधा जवाब अभी संभव नहीं है और काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि आगे इन पार्टियों के बीच किस तरह की बातचीत होगी और विवादास्पद मुद्दे कैसे बाहर रहते हैं।



संवाद पर आधारित राजनीति में जिम्मेदारी को लेकर प्रतिबद्धता होनी चाहिए। इस तरह की प्रतिबद्धता में अनिवार्यता की भाषा की जगह नहीं होती। इस तरह की बातचीत में शामिल पार्टियां आपसी लाभ के लिए काम करती हैं। ऐसे में आम आदमी के प्रति प्रतिबद्धता का सबसे अधिक महत्व है।



इसका मतलब यह नहीं निकाला जाना चाहिए कि अनिवार्यता के बगैर प्रतिबद्धता की बात की जा रही है। राजनीतिक दलों में जिम्मेदारी की प्रतिबद्धता होनी चाहिए। इससे न सिर्फ समाज में शांति और सामाजिक सौहार्द सुनिश्चित होगा बल्कि दबाव झेल रहे लोगों को भी इससे बचाने में सुविधा होगी। अभी के दौर की राजनीति में महाराष्ट्र में अनिश्चितता बढ़ गई है और ऐसे में प्रतिबद्धता की संभावना बन रही है। अगर इस तरह की नैतिक प्रतिबद्धता पर सहमति बनती है तो इससे धर्म के आधार पर गोलबंदी को रोका जा सकता है। क्योंकि इस तरह की प्रतिबद्धता एक बार के लिए नहीं होती। इससे स्थायी स्तर पर चलने वाले संवाद के आधार पर और मजबूत बनाया जाना चाहिए। इसमें संवाद सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं के स्तर तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि आम लोगों के स्तर पर भी होनी चाहिए।

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