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निगरानी में लोकतंत्र

नागरिक अधिकारों और मानवाधिकारों पर सीधे खतरे अब पूरी दुनिया में चिंता का विषय है

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हमारा लोकतंत्र निगरानी में है। आम लोग अगर संविधान के दायरे में अभिव्यक्ति की आजादी का इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा नहीं माना जाना चाहिए। हाल ही में एक रिपोर्ट आई है जिसमें यह बताया गया है कि पीगैसस सॉफ्टवेयर के जरिए भारत में बड़ी संख्या में लोगों की जासूसी की गई। वॉट्सएैप के जरिए संदेशों के आदान—प्रदान पर इस सॉफ्टवेयर के जरिए नजर रखी जा रही थी। एक बार इसे फोन में इंस्टॉल करने पर मोबाइल फोन की हर चीज खतरे में पड़ जाती है। कॉल, संदेश, पासवर्ड और संपर्क सूची आदि की जानकारी सुरक्षित नहीं रहती। इससे फोन का कैमरा और माइक्रोफोन भी दूर से इस्तेमाल करके रिकॉर्डिंग की जा सकती है।



पीगैसस सॉफ्टवेयर इजरायल की एनएसओ ग्रुप टेक्नोलॉजिज ने बनाया है। इसकी सेवाएं सउदी अरब की सरकार जासूसी के लिए ली थीं। जिन लोगों के खिलाफ इसका इस्तेमाल हुआ था, उनमें जमाल खसगोगी भी शामिल हैं। खसगोगी वाशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार थे और उनकी हत्या सउदी अरब के दूतावास में इंस्तांबुल में 2018 में हुई थी। भारत सरकार ने इस सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से संबंधित सवाल पर संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा उठाया। अभी के कानून के हिसाब से सरकार जन सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित खतरों की स्थिति में संदेशों के आदान—प्रदान पर निगरानी रख सकती है। केएस पुट्टास्वामी मामले में 2018 में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रावधान को अपनी सुविधा से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है।



जिन 121 लोगों की जासूसी की गई, उनमें बड़ी संख्या सामाजिक कार्यकर्ताओं, अकादमिक लोगों और पत्रकारों की थी। असहमति का स्वर रखने वाले इन लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बताया गया। इस आधार पर इनके मानवाधिकारों का हनन किया गया। हमें इस मामले में सरकार की ज्यादती पर सवाल उठाने चाहिए।



26/11 को मुंबई हमले में खुफिया सूचनाओं को हासिल करने में नाकामी सामने आई थी। उसके बाद से भारत एक व्यापक डेटाबेस बनाना चाहता है। इसके लिए सरकार काफी पैसे भी खर्च कर रही है। ताकि बड़ी संख्या में लोगों की निगरानी की जा सके। नैटग्रिड, केंद्रीय निगरानी तंत्र यानी सीएमएस और अपराध व अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क सिस्टम यानी सीसीटीएनएस मिलकर एक पुलिस स्टेट बनाने का काम कर रहे हैं जिनमें निगरानी को रोकने के लिए कोई बचाव का रास्ता नहीं है। इस तरह के तंत्रों के विस्तार से पता चलता है कि सरकार जब चाहे तब किसी की निगरानी करने की क्षमता हासिल करना चाहती है। ये डेटाबेस बन गए हैं। इसलिए हमें ये समझने की जरूरत है कि निगरानी के नियमन के मामले में हम एक दशक पीछे हैं। बगैर कानूनी प्रावधान के कार्यपालिका के आदेश से इस तरह से जानकारियां जुटाना एक गंभीर चिंता की बात है। उदाहरण के तौर पर कार्यपालिका को आधार ने कानून के बगैर तब तक आगे बढ़ाया जब तक यह अनिवार्य नहीं हो गया। डाटा सुरक्षा के लिए कोई व्यवस्था बनाए बगैर यह काम किया गया। इस परियोजना को लेकर सुरक्षा संबंधित काफी चिंताएं हैं और प्रभावित लोगों के लिए न्याय की कोई राह नहीं है।



सरकार को नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। इसमें निजता का अधिकार भी शामिल है। ऐसे में एनएसओ ग्रुप टेक्नोलॉजिज जैसी कंपनियों को काम करने की अनुमति देना इस मौलिक अधिकार का हनन है। निजता के अधिकार को सुरक्षा एजेंसियां बगैर तय प्रक्रियाओं का पालन किए बगैर नहीं ले सकती हैं और अपवाद वाली परिस्थितियों को छोड़कर इसका हनन नहीं किया जा सकता है। हाल ही में मुंबई उच्च न्यायालय में एक ऐसा मामला आया जिसमें सीबीआई ने गैरकानूनी ढंग से साक्ष्य जुटाए थे। लेकिन अदालत ने इन साक्ष्यों को नहीं माना और यह भी कहा कि ये सारी सूचनाएं मिटाई जाएं। अदालत ने माना कि इस मामले में जन सुरक्षा का कोई खतरा नहीं था और इस आधार पर सीबीआई ने जो निगरानी की, वह कानूनी नहीं है।



निगरानी का इस्तेमाल राजनीतिक फायदों के लिए भी किया जाता है। इटली की एक कंपनी हैकिंग टीम के जो ईमेल लीक हुए हैं, उनसे पता चलता है कि आंध्र प्रदेश सरकार फोन में सेंध लगाने वाले सामान खरीदने में दिलचस्पी ले रही थी। यह बात तब सामने आई जब आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री राजनाथ सिंह से शिकायत की कि उनके राजनीतिक प्रतिद्वंदी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने उनके फोन को टेप कराया। वहीं दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ पुलिस के प्रतिनिधियों ने एनएसओ ग्रुप टेक्नोलॉजिज के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। हालांकि, सरकार वॉट्सएैप से इस मामले में और जानकारियां मांगी हैं लेकिन उसने अपने एजेंसियों को इस तरह का काम करने से नहीं रोका है।



हर कानून में अपवाद नहीं होने की स्थिति में सूचना का अधिकार कानून के साथ दूसरे कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियां हमारे लोकतंत्र के लिए बोझ बन गई हैं। क्योंकि इनका मकसद जो लोग सत्ता में हैं, उन्हें बचाना हो गया है न कि कमजोर लोगों को। भारत में इस दिशा में सुधार की तत्काल जरूरत है। ऐसे में पर्सनल डेटा सुरक्षा विधेयक, 2019 पर ध्यान से बातचीत होनी चाहिए। जनप्रतिनिधियों को पारदर्शिता की मांग करनी चाहिए और जो लोग इस तरह का काम गैरकानूनी ढंग से कर रहे हैं, उनकी जवाबदेही तय करनी चाहिए। सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति को पीगैसस मामले की जांच तेज करनी चाहिए और इस संबंध में एक व्यापक रिपोर्ट जल्द से जल्द देनी चाहिए। यही मौके होते हैं जब हमारे लोकतांत्रिक ताने—बाने की परीक्षा होती है। जरूरत इस बात की है कि भारतीय संस्थाएं मौलिक अधिकारों के लिए मजबूती से खड़ी दिखें।

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