अयोध्या पर आए निर्णय के मायने

क्या न्यायिक विवेक और परिणामकारी दिशाएं पूर्ण न्याय की गारंटी देते हैं?

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बाबरी मस्जिद विवाद मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले के बारे में यह कहा जाता है कि इसके बाद जिस तरह की शांति है, वे भी उतनी ही मजबूती से अपनी बात कह रही है जिस तरह की बातें शब्दों के जरिए बयां की जा रही हैं। इसलिए इस फैसले को सही अर्थों में समझने के लिए यह जरूरी है कि जो बातें कही जा रही हैं, उन्हें समझने के साथ उन बातों को भी समझा जाए जो बातें नहीं कही गई हैं।



2.77 एकड़ की विवादित भूमि का स्वामित्व ‘भगवान श्री राम विराजमान’ और उनके संरक्षकों को दिया गया है। हर किसी को इस बात पर हैरानी हो रही है कि अदालत ने आठ निर्देश क्यों जारी किए। क्योंकि यह तो स्वामित्व विवाद का मसला था जो 1949 से लंबित रहा है। इस जमीन पर बाबरी मस्जिद थी। इस वजह से हिंदू और मुस्लिम पक्ष में विवाद रहा है। अगर अदालत को इस बात का पक्का यकीन था कि यह जमीन भगवान की है तो फिर उसे इस बात की चिंता क्यों थी कि इस संपत्ति के साथ आगे क्या होगा।



अयोध्या कानून, 1993 के जरिए कुछ और जमीन का अधिग्रहण किया गया था। अदालत ने ट्रस्ट बनाकर इस जमीन पर मंदिर बनाने की बात कही है। हालांकि, अदालत अपना फैसला सुनाकर इस कानून के तहत आगे की कार्रवाई की बात केंद्र सरकार पर छोड़ सकती थी। लेकिन अदालत ने ऐसा नहीं किया।



इस तरह के फैसले का अधिकार न्यायपालिका को संविधान के अनुच्छेद-142 के जरिए हासिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल तब किया जाता है जब विवाद के विभिन्न पक्षकारों को पूर्ण न्याय सुनिश्चित करना हो। अदालत के निर्णयों से यह साफ है कि इस प्रावधान की जरूरत इसलिए है क्योंकि कानून कई बार कुछ जटिल आयामों पर उतना स्पष्ट नहीं होता है जितनी स्पष्टता की जरूरत होती है।



इस फैसले के संदर्भ में अगर देखें तो यह कहा जा सकता है कि हिंदू पक्षकारों ने यह साबित कर दिया कि विवादास्पद संपत्ति पर उनका दावा मजबूत है लेकिन इस मामले में मुस्लिम पक्ष को बराबरी का न्याय दिया जाना जरूरी था। यही वजह है कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए जमीन देने का फैसला अदालत ने सुनाया।



लेकिन सवाल फिर भी यह है कि क्या यह ‘न्याय’ है? अगर कानून के हिसाब से हिंदू समाज ने अपना पक्ष साबित भी कर दिया था तो भी ‘मानवीय इतिहास और गतिविधियों की क्या जटिलताएं’ थीं जिनकी वजह से उत्तर प्रदेश सरकार को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को जमीन देने के लिए कहा गया?



उत्तर तलाशना इतना मुश्किल नहीं है। अदालत ने यह माना कि बाबरी मस्जिद को दो बार ढहाया गया। पहली बार 1949 में जब रात के अंधेरे में इसमें मूर्तियां रख दी गईं। दूसरी बार 1992 में सबकी आंखों के सामने इसके गुंबदों को ढहा दिया गया। लेकिन अदालत ने इन दोनों घटनाओं से हिंदू पक्ष की वैधानिकता को प्रभावित नहीं होने दिया। इसमें इस बात पर खास महत्व दिया गया कि मुख्य गुंबद के नीचे ही राम जन्मभूमि था। इसमें मुस्लिम समाज के उस दावे को नहीं माना गया कि 1857 के बाद भी इस जगह का इस्तेमाल मस्जिद के तौर पर हो रहा था।



अदालत ने इस मामले में यह नहीं बताया कि हिंदू समाज का दावा 1949 और 1992 की गैरकानूनी कार्रवाई से मजबूत हुआ लेकिन फिर भी अदालत ने उन्हें इसका फायदा उठाने दिया। हम उम्मीद कर सकते हैं कि मुस्लिम समाज को जो मिला है, उससे वे संतुष्ट होंगे क्योंकि 1949 और 1992 की गैरकानूनी कार्रवाइयों के लिए हम उन्हें न्याय नहीं दे पाएंगे।



अदालत ने इस संबंध में जो निर्देश दिए हैं उन्हें न्यायिक दान कहा जा सकता है। पूर्ण न्याय के प्रावधान के जरिए अदालत ने 1992 की घटना का न्याय देने की कोशिश की है। अदालत का रिकार्ड भी इस मामले में ठीक नहीं रहा। उस वक्त के मुख्यमंत्री पर अपनी जिम्मेदारियों को नहीं निभाने के लिए उसने कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की थी। बाबरी विध्वंश के आरोपितों के खिलाफ चल रहे मामलों में अदालत ने बार-बार तारीख पर तारीख दी है।



बाबरी मस्जिद विवाद के स्वामित्व वाले में मामले में अनुच्छेद-142 के इस्तेमाल के जरिए जहां अदालत को ‘पूर्ण न्याय’ देना था। लेकिन जो फैसला आया है उसे या तो ‘अपूर्ण न्याय’ या ‘पूर्ण अन्याय’ कहा जा सकता है।

Updated On : 23rd Dec, 2019

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