भूख और कुपोषण का संकट

खाद्य सुरक्षा और पोषण सुनिश्चित करने वाली नीतियों पर नए सिरे से तात्कालिकता को केंद्र में रखकर ध्यान देने की जरूरत है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

यह राष्ट्रीय तौर पर एक शर्म की बात है कि आजादी के कई दशक गुजरने के बाद भी देश को भूख और कुपोषण जैसी समस्याओं से छुटकारा नहीं मिल पाया है। बच्चे, महिलाएं और वंचित समाज के लोग इन समस्याओं का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं। इस साल प्रकाशित ग्लोबल हंगर इंडेक्स में कुपोषण, बाल मृत्यु दर, बच्चों का खराब स्वास्थ्य और इससे पैदा होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं जैसे चार संकेतकों का इस्तेमाल करके विभिन्न देशों के प्रदर्शन के मूल्यांकन की कोशिश की गई है। इस इंडेक्स में यह बताया गया है कि भारत में भूख की समस्या ‘गंभीर’ है।



संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में एक लक्ष्य यह है कि 2030 तक कोई भूखा नहीं रहे। लेकन इसे हासिल करने के लिए कई स्तर पर अभिनव पहल की जरूरत है। भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून, 2013 के लागू होने और अनाज भंडारों में भारी मात्रा में अनाज होने के बावजूद भूख की समस्या बनी हुई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कुछ दक्षिण एशियाई देश हमसे बेहतर स्थिति में हैं।



इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि इसके संकेतकों पर भारत के खराब प्रदर्शन की वजह से इस क्षेत्र के संकेतकों पर भी असर पड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 6 महीने से लेकर 23 महीने की उम्र वाले बच्चों में सिर्फ 9.6 फीसदी ऐसे हैं जिन्हें न्यूनतम जरूरी आहार मिल रहा है। वहीं पांच साल तक की उम्र के 20.8 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिनकी लंबाई के अनुपात में वजन कम है। इस रिपोर्ट में शामिल देशों में किसी देश की इतनी खराब स्थिति नहीं है। वहीं पांच साल तक उम्र के बच्चों में अपेक्षित लंबाई नहीं होने की समस्या 37.9 फीसदी बच्चों के साथ है। इससे पता चलता है कि किस तरह के कुपोषण का वे सामना कर रहे हैं। इस रिपोर्ट को तैयार करने की पद्धति को लेकर इसकी आलोचना भी होती रहती है। पद्धतियों में होने वाले बदलावों के बावजूद यह एक तथ्य है कि अलग-अलग देशों को हर साल इस रिपोर्ट में शामिल किया जाता है।



हालांकि, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि कुपोषण की दर अधिक होने की वजह से भारत में बच्चों की जिंदगी खतरे में पड़ती है। यूनीसेफ की स्टेट आॅफ दि वल्र्ड चिल्ड्रेन रिपोर्ट से भी यही बात सामने आती है। कुपोषण, एनीमिया और मोटापा समेत अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के आधार पर यह रिपोर्ट तैयार की गई है। भारत में पांच साल तक के बच्चों में मृत्यु दर प्रति 1,000 बच्चों पर 37 है। 2018 में ऐसी 8,82,000 मौतें हुई थीं। इसमें 62 फीसदी हिस्सेदारी नवजात बच्चों की मौतों की है। इस आयु वर्ग के 69 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। हर दूसरा बच्चा किसी न किसी तरह के कुपोषण का शिकार है। 33 फीसदी बच्चों का वजन कम है। वहीं 35 फीसदी बच्चे स्टंटिंग और 17 फीसदी बच्चे वेस्टिंग का सामना कर रहा है। 6 महीने से 23 महीने के बीच के सिर्फ 42 फीसदी बच्चों को पर्याप्त समय अंतराल पर खाना मिल रहा था, वहीं विविध खान-पान हासिल करने वाले बच्चों का आंकड़ा सिर्फ 21 फीसदी है। हर दूसरी महिला एनीमिया का सामना कर रही है। वहीं इस समस्या का सामना कर रहे बच्चों की संख्या 40.5 फीसदी है। स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के 2016-18 के आंकड़े भी बताते हैं कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों में से 34.7 फीसदी स्टंटेड हैं, 17.3 फीसदी वेस्टेड हैं और 33.4 फीसदी बच्चों का वजन कम है।



खराब पोषण की कई वजहें हैं। इसमें से एक राज्य के अंदर और विभिन्न राज्यों में अंतर दिखता है। इसमें गरीबी, अनाज और दाल की अनुपलब्धता, खाने में पोषक तत्वों की कमी, अप्रभावी सार्वजनिक वितरण प्रणाली, परिवार में महिलाओं की स्थिति, स्वच्छ पानी और सफाई का अभाव, अनुवांशिक समस्याओं और पर्यावरणीय समस्याएं शामिल हैं।  इस समस्या से निपटने में विभिन्न सरकारों में इच्छाशक्ति का अभाव दिखता रहा है।



प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत गर्भवती और दूध पिलाने वाली माताओं को नगद हस्तांतरण की सुविधा है। वहीं पोषण अभियान के तहत भारत को 2022 तक कुपोषण मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, अब तक की प्रगति को देखते हुए इस लक्ष्य को हासिल करना आसान नहीं दिख रहा है। क्रेडिट सुस ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत दुनिया में सबसे अधिक धन सृजन करने वाले देशों में एक है। इसके बावजूद कुपोषण और भूख जैसी समस्याओं का समाधान यहां नहीं हो पाना एक विडंबना है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पर्याप्त खान-पान और पोषण हर किसी को मिले। इसके लिए जरूरी निवेश सरकार को करना चाहिए। ताकि देश में सही मानव विकास हो सके और यहां के लोग अपनी संभावनाओं का सही इस्तेमाल कर सकें।

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