आरसीईपी के बिना अर्थव्यवस्था

क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी से भारत के बाहर निकलने से बीमार अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक होती नहीं दिख रही है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

आरसीईपी से भारत के बाहर निकलने के निर्णय के बारे में क्या कहा जाए? क्या यह निर्णय उन आम भारतीय के चुनावी जनादेश से संबंधित है जिसमें लोगों ने इस तरह के मुक्त व्यापार समझौतों से अपनी रोजी-रोटी पर संकट को लेकर चिंता जाहिर की थी? या फिर यह सरकार की स्वायत्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की जीत है जिसके जरिए उसके सामने क्षेत्रीय स्तर पर एक आर्थिक ताकत बनकर उभरने का अवसर था? या फिर यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में शामिल कूटनीतिक हितों की जीत का मामला है? चाहे जो भी हो, हमें मौजूदा सरकार के साहस की सराहना करनी चाहिए कि उसने उस करोबारी ब्लाॅक से खुद को अलग किया जिसके पास विश्व व्यापार का 40 फीसदी हिस्सा होता। लेकिन अगर ऐतिहासिक तथ्यों के संदर्भ में देखें तो यह साहस टिकती हुई नहीं दिखती। क्योंकि इसमें आर्थिक एकीकरण को लेकर कोई व्यापक नीति नहीं दिखती।

आरसीईपी आसियान देशों पर केंद्रित व्यवस्था है। पिछले एक दशक में इसे लेकर काफी बातचीत हुई है। इसमें डंपिंग एक अहम मुद्दा रहा। सिंगापुर के साथ भारत का मुक्त व्यापार समझौता और दोहरे कराधान से बचाव यानी डीटीएए समझौता भी है। चीन इसका इस्तेमाल करके भारत में डंपिंग करता आया है। भारत ने जितने भी एफटीए पर दस्तखत किए हैं, उनमें अधिकांश में ‘उत्पाद के बनने’ का प्रावधान शामिल नहीं है। भारत आरसीईपी में इस प्रावधान को शामिल करने की बात कह रहा था। अगर भारत इसमें शामिल हुआ होता तो क्षेत्रीय स्तर पर व्यापार के नए रास्ते खुलते। तो क्या भारत ने आरसीईपी में शामिल नहीं होकर एक अवसर गंवा दिया है? क्या इससे एक क्षेत्रीय कारोबारी साझेदार के तौर पर भारत की विश्वसनीयता कम हुई है? भारत सरकार ने इस समूह से बाहर निकलने के बजाए इसमें रहते हुए अपने अनुकूल शर्तों के लिए बात करते रहने का रास्ता क्यों नहीं चुना?

कोई यह तर्क दे सकता है कि आसियान और आसियान के नेतृत्व वाला आरसीईपी भारत का स्वाभाविक व्यापार साझीदार नहीं हो सकते। न ही भारत चीन जैसे देश के साथ करीबी संबंध विकसित कर सकता है। लेकिन हमें यह ध्यान रखन होगा कि इस क्षेत्र के साथ कुल व्यापार के मुकाबले इस क्षेत्र के कई देशों के साथ भारत का दोतरफा व्यापार काफी महत्वपूर्ण है। आसियान को मुक्त व्यापार क्षेत्र बनाने को लेकर काफी बातें हुई हैं। लेकिन इसके अस्तित्व में आने के 50 साल बाद भी विश्व व्यापार में इसकी हिस्सेदारी सिर्फ 7 फीसदी ही है। इसमें भी भारत की हिस्सेदारी सिर्फ 2 से 3 फीसदी है। इसके बावजूद भारत सालों तक आसियान में डायलाॅग पार्टनर रहा। आरसीईपी से हटने के बावजूद भारत आसियान में इस भूमिका में रहेगा। भारत के आरसीईपी से हटने के बावजूद इसके कुल संभावित व्यापार में एक तिहाई कमी आएगी लेकिन कुछ सदस्य देशों के साथ भारत का दोतरफा व्यापार जस का तस रहेगा।

वहीं दूसरी तरफ अंतिम समय में इस समझौते से बाहर निकलना भारत सरकार का मास्टर स्ट्रोक रहा। सार्क पिछले तीन दशक से जिंदा है जबकि कुछ सदस्य देशों के बीच संबंध अच्छे नहीं हैं। इसके अनुभव से ही भारत इस बार इस तरह का निर्णय ले पाया। एशिया में क्षेत्रीय राजनीति की बात चलती है तो पता चलता है कि कुछ देशों की अपनी प्रतिबद्धताएं ऐसी हैं कि वे किसी क्षेत्रीय संगठन में उन प्रतिबद्धताओं के साथ नहीं रह सकते। सांगठनिक तौर पर कमजोर होने के बावजूद इन क्षेत्रीय संगठनों में शामिल होने से अगर उदारवाद के दिनों में किसी देश को लाभ हुआ हो तो भी इस दौर में इनसे बाहर निकलना अनापेक्षित नहीं है। वह भी उस दौर में जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएं संरक्षणवाद की ओर चल पड़ी हैं।

वैश्विक तौर पर यह संदेश गया कि अंतिम समय में निर्णय लेकर सरकार ने यह दिखाया है कि उसकी कूटनीति में एशिया-प्रशांत क्षेत्र में लचीलापन है। इससे सरकार के प्रति यह संदेश गया कि वह ‘आम आदमी के अनुकूल’ है। हालांकि, इससे अर्थव्यवस्था में कुछ लोग को मिली राहत अस्थायी ही है। क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था की ढांचागत समस्याओं का समाधान नहीं होगा। उन डेयरी किसानों के लिए आरसीईपी का क्या मतलब है जो अब भी स्थानीय बाजारों के कारोबारियों और बिचौलियों की व्यवस्था से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं? इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के डेयरी उत्पादों को प्रतिस्पर्धी बनाने में कोई खास मदद नहीं मिलेगी। लेकिन यही सरकार है जो किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए अधिक मूल्य वाले कृषि उत्पादों को बढ़ावा देने की बात करती है। क्या ऐसे में यह सही नहीं होता कि ऐसी नीतियां बनतीं जिससे उत्पादों को सशक्त बनाया जाता और उनके बाजार विकल्पों को बढ़ाने का काम होता न कि बहुपक्षीय व्यापार के नाम पर इन विकल्पों को सीमित करने का काम होता?

अंतरराष्ट्रीय व्यापार जितना आर्थिक विषय है उतना ही राजनीतिक विषय भी है। इस तरह के व्यापार समझौतों को लागू करने में सरकार को पर्याप्त सावधानी बरतनी चाहिए। सरकार को अपनी जवाबदेही को लेकर सतर्क तो रहना चाहिए लेकिन सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए भी ‘सावधानियों’ का निर्माण कर सकती है। इसलिए आरसीईपी पर सरकार के रुख का समर्थन करते हुए तारीफ करने में हमें इन बारीकियों को ध्यान में रखना चाहिए।

 
 

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