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नैतिक तौर पर संवेदनशील लोकतंत्र की तलाश

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लोकतंत्र के विद्यार्थी दो बातों के आधार पर उदार लोकतंत्र के मूल्यांकन की कोशिश करते हैं। इनमें एक तत्वों से संबंधित है और दूसरा प्रक्रियाओं से। प्रक्रियागत आयाम से संवैधानिक गारंटी संबंधित है जो हर नागरिक को राजनीतिक परिदृश्य में समान भागीदारी देने की बात करता है। इसके मूल में यह भाव है कि अधिकार रखने वाले नागरिकों की महत्ता बराबर है। खास तौर पर चुनावों के संदर्भ में। इसका मतलब यह हुआ कि मत देने का अधिकार बराबरी का अधिकार है और इसके जरिए उम्मीदवारों का भाग्य तय करने का अधिकार हर किसी को बगैर किसी भेदभाव के हासिल है। नागरिकों को यह अधिकार इसलिए नहीं मिला है कि वे किसी खास धर्म या क्षेत्र के हैं बल्कि उन्हें यह अधिकार एक नागरिक होने के नाते संविधान से मिला है। संविधान के कई प्रावधान न सिर्फ नागरिकों को वोट देने का अधिकार देते हैं बल्कि उन्हें लोक नीतियों के निर्धारण की प्रक्रिया पर अपनी राय देने का भी अधिकार देते हैं। इसमें भी एक नागरिक सिर्फ खुद से संबंधित मसलों पर नहीं बोल सकता बल्कि सामान्य हित के मसलों पर भी उसे बोलने का अधिकार है।



व्यापक दायरे में देखें तो संवैधानिक तौर पर लोकतंत्र एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें एक नागरिक को किसी देश में रहने का अधिकार बगैर किसी की अनुमति, संरक्षण और सहानुभूति के हासिल है। नागरिकों को किसी की दया पर निर्भर रहने का अधिकार नहीं है। इसे अलग तरह से देखें तो नागरिकता किसी तरह के संरचनात्मक पदानुक्रम पर आधारित नहीं है।



हालांकि, भारत में लोकतंत्र का उभार इस तरह से हुआ है जो उदार लोकतंत्र की अवधारणा के विपरीत है। राजनीतिक और चुनावी फायदे के लिए जाति और धर्म के आधार पर लोगों की गोलबंदी लोकतंत्र के मूल में आ गया है। ऐसी पार्टियां अपनी सांप्रदायिक सोच की वजह से हर नागरिक को एक निश्चित समुदाय के दायरे में बांधकर देखने लगी हैं। ऐसा सिर्फ इसलिए किया गया है कि धर्म के आधार पर एक राजनीतिक बहुसंख्यक वर्ग तैयार किया जा सके। एक पार्टी खुद की पहचान बहुसंख्यक समुदाय की पार्टी के तौर पर बना रही है जिसमें बहुमत का आधार लोकतांत्रिक नहीं है।



एक नागरिक की निजी पहचान को खत्म करने की यह प्रक्रिया अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ नफरत की भावना से प्रेरित होती है। यह नैतिक तौर पर गलत है। क्योंकि ऐसा करने से उस समुदाय के लोगों को एक जागरूक नागरिक के तौर पर खुद की अहमियत का अहसास करने का अधिकार नहीं हासिल हो पाता।



इसलिए लोकतंत्र में यह जरूरी है कि हर किसी को व्यापक दायरे में आकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करने का हक मिले और वह समान रूप से भागीदारी कर सके। लेकिन यह काम सिर्फ संवैधानिक प्रावधानों से नहीं होता है। क्योंकि इससे एक नागरिक के लिए समान अधिकार और समान महत्व सुनिश्चित नहीं होता। क्योंकि संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर लोकतंत्र में मिली गारंटी में हर नागरिक को यह समझना होगा कि दूसरे नागरिकों को भी इसी तरह के समानता के अधिकार मिले हुए हैं।



एक संवेदनशील लोकतंत्र के लिए यह बेहद जरूरी है। लोकतांत्रिक परिदृश्य ऐसा हो जिसमें स्वागत का भाव हो न कि शत्रुता का। ऐसे संवेदनशील लोकतंत्र में एक नागरिक खुद को नफरत की वस्तु नहीं समझता। यहां कोई यह तर्क दे सकता है कि इस समुदाय के लोग मतदान कर रहे हैं लेकिन एक स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए यह भी जरूरी है कि ये लोग खुल कर अपनी बात रख सकें। लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ये लोग एक तरह के ‘घेरे’ में चले गए हैं।



पिछले दो दशकों में भारत में जो लोकतांत्रिक स्थिति रही है उसमें एक भारतीय इस बात को लेकर सशंकित रहता है कि एक नागरिक की नैतिक जरूरतों पर भी बराबरी से ध्यान दिया जाता है। ऐसे में यह बात सहज ही ध्यान आती है कि एक लोकतंत्र में सिर्फ यह जरूरी है कि राजनीतिक तौर पर खुली जगह सभी को मिले बल्कि यह भी जरूरी है कि इस संवैधानिक व्यवस्था में हर कोई समान गरिमा और आदर के साथ समान रूप से भागीदारी कर सके। राजनीतिक समुदाय के हर सदस्य के लिए गरिमा और आपसी सम्मान से संबंधित सार्वभौमिक मूल्यों को हासिल करने का लक्ष्य होना चाहिए। राजनीतिक समुदायों के एकजुट होने का काम इन नैतिक मूल्यों पर आधारित होना चाहिए। यह तब ही हो सकता है जब गरिमा और आपसी सम्मान जैसे बुनियादी मूल्यों पर ध्यान दिया जाए। इन मूल्यों की रक्षा तब हो पाती है जब नैतिक तौर पर एकजुटता दिखे न कि धर्म और जाति के आधार पर एक राजनीतिक बहुसंख्यक वर्ग बनाने की इच्छा दिखे।

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