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तुर्की ने सीरिया पर हमला किया

ताकत के खेल और क्षेत्रीय नफा-नुकसान ने सीरियाई कुर्द आकांक्षाओं को जन्म दिया है

 

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने तुर्की को सीरिया पर हमला करने की हरी झंडी दे दी है। सीरियाई कुर्दों पर तुर्की ने हवाई हमला शुरू भी कर दिया है। ये जिहादी लड़ाके अनियमित हैं। इन्हें अलेप्पो और इदलीब में सउदी के सहयोग से चलने वाले मस्जिदों ने मदद करके तैयारकरने का काम किया था। साथ ही इस काम में कतर, तुर्की और अमेरिका ने भी आर्थिक और अन्य ढंग से मदद की। ये जिहादी सिर्फ खून-खराबा चाहते थे। तुर्की की सरकार कह रही है कि वह उन 30 लाख सीरियाई शरणार्थियों को सीरिया को रोजावा में बसाना चाहती है। कानूनों की इस दुनिया में इस ‘जनसंख्या हस्तांतरण’ को युद्ध अपराध माना जाता है।



जिन इलाकों में सीरियाई कुर्द बहुसंख्यक है, वे इलाके विविधता वाले हैं। जहां अरबी, ईसाई, मुस्लिम, याजिदी आदि रहते हैं। इस क्षेत्र में कृषि भी बेहद संपन्न है। इसके दक्षिण में तेल के भंडार हैं। इस वजह से कभी भी यहां स्वायत्ता की मांग नहीं की गई क्योंकि दमिश्क भी ऐसी मांग पर सहमत नहीं होता।



जब 2011 में बशर अल-असद सरकार के खिलाफ विद्रोह हुआ तो सीरिया की सरकार ने दमिश्क और पश्चिमी हिस्से के शहरों को बचाने में अपनी सेना को दूसरे क्षेत्रों से हटाकर लगा दिया। इससे सीरियाई कुर्द पार्टियों को यूफरेट नदी के पश्चिम से लेकर इराक की सीमा तक के हिस्से को नियंत्रण में लेने का मौका मिल गया। इन लोगों ने सीरियाई कुर्दों की राजधानी के तौर पर रोजावा की स्थापना की। इसके जरिए इन लोगों ने एक समाजवादी समाज में बदलने की कोशिश की थी। लेकिन इस पहल को आगे बढ़ने का कोई अवसर ही नहीं मिला। क्योंकि इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक ऐंड सीरिया यानी आईएसआईएस इस पर लगातार हमले करता रहा। कोबाने और अन्य छोटे शहर आईएसआईएस के कब्जे में चले गए। आईएसआईएस रोजावा तक भी पहुंच गया और ये न सिर्फ सीरियाई कुर्दों के लिए खतरा बन गए बल्कि यजीदियों के सामने भी अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया।



सीरियाई कुर्दों ने हर तरफ से राजनीतिक सहयोग लेने की कोशिश की। इन लोगों ने माॅस्को में एक कार्यालय खोला और अमेरिका के साथ बातचीत शुरू की। जब अमेरिका ने आईएसआईएस पर हमला किया तो सीरियाई कुर्दों ने अपने लड़ाका समूह वाईपीजी को फिर से एकजुट किया और इसे सीरियाई लोकतांत्रिक बल यानी एसडीएफ का नया नाम दिया। इसमें कुर्दों के अलावा अरब और दूसरे लोग भी हैं। इसने आईएसआईएस पर अमेरिकी हमलों के लिए जमीनी सैन्य बल का काम किया। एसडीएफ की मदद के बगैर अमेरिका उत्तरी सीरिया में आईएसआईएस को पटखनी देने में सफल नहीं होता।



आईएसआईएस की हार और एसडीएफ की जीत से सीरियाई कुर्द नेतृत्व में गलत उम्मीदें जगीं। उन्हें उम्मीद थी कि अमेरिकी मदद बनी रहेगी और ताकि उन पर अपना प्रयोग रोकने का जो दबाव तुर्की और सीरिया की ओर से बन रहा है, उसका वे सामना कर सकें। तुर्की की दक्षिणपंथी सरकार अपने सीमाओं के पास किसी तरह की कुर्द स्वायत्ता के खिलाफ है। रोजावा के प्रयोग को कमजोर करने के लिए सीरिया पर 2014 और 2015 में भी हमले किए हैं। सीरिया की सरकार ने कहा है कि वह अपने क्षेत्रों को फिर से हासिल करना चाहती है। इसमें वह क्षेत्र भी शामिल है जो जो सीरियाई कुर्दों और अमेरिका के हाथ में रहा है। सीरिया की सरकार को मदद करने वाले रूस और ईरान का कहना है कि असद की सरकार को पूरी क्षेत्रीय संप्रभुता मिलनी चाहिए। रोजावा इस लक्ष्य में बाधा है।



इसकी संभावना न के बराबर है कि तुर्की की सेना ने बगैर दमिश्क, रूस और ईरान की सहमति के हमला किया हो। समझदार सीरियाई कुर्द नेता भी यह मानते हैं कि रोजावा कुछ समय की ही बात है। इस क्षेत्र की कोई भी सरकार इसे बने रहना देना नहीं चाहती। इसकी कई वजहें हैं। अमेरिका ने अपने सैनिकों को काफी तेजी से हटाया और अपने कैंप नष्ट किए। अब इन क्षेत्रों पर सीरिया और रूस के सैनिकों का नियंत्रण है। तुर्की ने आगे बढ़ने से इस शर्त पर खुद को रोका है कि इस क्षेत्र को सीरिया अपने नियंत्रण में लेगा। सीरियाई कुर्द अपने सपनों को ध्वस्त होने के बीच भी ये कह रहे हैं कि उनके लिए तुर्की की सेना के नियंत्रण से अच्छा है कि सीरिया की सेना का यहां नियंत्रण हो। जब अमेरिकी सैनिक इस क्षेत्र को छोड़ रहे थे तो कुर्दों ने उन पर पत्थर और सड़े हुए फल फेंके। इस घटनाक्रम पर अमेरिकी रक्षा सचिव मार्क इस्पर ने अमेरिकी नीति को स्पष्ट करते हुए कहा, ‘हमने कभी ऐसा समझौता नहीं किया कि हम कुर्दों को बचाने के लिए पुराने नाटो सहयोगी तुर्की के खिलाफ खड़े होंगे और न ही इसके लिए कोई समझौता था कि एक स्वायत्त कुर्द क्षेत्र बनाने में हम मदद करेंगे।’ इन वजहों से कुर्दों की आकांक्षाएं खत्म हो गई हैं।

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