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मजबूत विपक्ष के लिए जनादेश

सत्ता के अहंकार को कम करने के लिए यह जरूरी है कि सामाजिक अंतर्विरोधों को सामने लाया जाए

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महाराष्ट्र और हरियाणा के विधानसभा चुनावों के नतीजे इस मिथक को तोड़ने वाले हैं कि भारतीय जनता पार्टी को हराया ही नहीं जा सकता। इन दोनों चुनावों में सीटों को लेकर जो बड़ी-बड़ी बातें भाजपा ने की थी, वे सब धरी की धरी रह गईं। दोनों राज्यों में भाजपा को 2014 के मुकाबले कम सीटें मिलीं। अपने दम पर दोनों राज्यों में भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रही। जब भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन पहले से भी बड़े बहुमत से सत्ता में वापस आया तो यह कहा जाने लगा कि मौजूदा नेतृत्व वाली भाजपा को चुनौती नहीं दी जा सकती। क्योंकि यह न सिर्फ जनता के विमर्श को नियंत्रित करती है बल्कि दूसरों पर भी सत्ता की चाबुक चलाती है। लेकिन इन नतीजों के बाद लोकतांत्रिक राजनीति का पहला सिद्धांत सही साबित होता है जिसमें कहा जाता है कि अहंकारी ताकतों को रोका जा सकता है बशर्ते लोगों के बीच जाया जाए, उनका विश्वास हासिल किया जाए और उनके साथ खड़ा हुआ जाए। इस तरह की कोशिश सबसे अधिक महाराष्ट्र में दिखी। जहां विपक्ष ने शरद पवार के नेतृत्व में अभियान चलाया। इसके जरिए लोगों से सीधा संवाद करने की कोशिश हुई। पवार ने जिस तरह धैर्य दिखाया उसके सबसे बड़े उदाहरण के तौर पर सतारा की सभा को देखा जा सकता है जहां पवार ने भारी बारिश के बीच लोगों ने संवाद किया। जमीनी स्तर पर पवार ने चुनाव प्रचार अभियान को लोगों के नजदीक ले जाने की कोशिश की। सत्ताधारी दल बहुसंख्यक आबादी के धु्रवीकरण वाले मुद्दे उठाती रही। लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा की जनता ने भाजपा के ‘विपक्ष मुक्त भारत’ की बात को ठुकरा दिया और विपक्षी पार्टियों को मजबूत करने का काम किया। इसके जरिए लोगों ने यह संकेत दिया कि अगर विपक्षी पार्टियां स्थायित्व के साथ विपक्ष की राजनीति करती हैं तो जनता उन्हें वोट देती है। इस मामले में पिछले दो महीने में जिस तरह की स्थिरता विपक्ष ने दिखाई, अगर उस तरह की स्थिरता पिछले पांच सालों में दिखी होती तो परिणाम कुछ और हो सकते थे।

महाराष्ट्र के चुनावों में एक अहम मोड़ तब आया जब प्रवर्तन निदेशालय ने शरद पवार को नोटिस भेजा। इससे मराठा समाज एकजुट हुआ। लोगों को लगा कि उनके समाज के एक वरिष्ठ नेता को सिर्फ विपक्ष में होने की वजह से निशाने पर लिया जा रहा है। आम तौर पर इस समाज के बारे में माना जाता है कि यह एक तरह से वोट करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि इसके विभिन्न हिस्से अलग-अलग ढंग से वोट देते हैं। मराठों में बेहद मजबूत नेता कहे जाने वाले शरद पवार को इस समाज के एक वर्ग का ही साथ मिलता रहा है। लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि महाराष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास और राजनीतिक अर्थव्यवस्था की वजह से वे मराठों की पहचान आसानी से बन जाते हैं। प्रवर्तन निदेशालय के नोटिस और पवार की ओर से इसके मुंहतोड़ जवाब के बाद यह पहचान और इस पर आधारित जुड़ाव और मजबूत होने लगा। लेकिन यह सिर्फ भावनात्मक मुद्दा भर नहीं था। बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों की परेशानी जैसे मुद्दे भी इसमें जुड़ते चले गए। धांगर जैसे समुदायों से मराठों के तर्ज पर आरक्षण की मांग भी सामने आई। रोजमर्रा के मुद्दों के सामने आने और सत्ताधारी पार्टी के नेतृत्व के अजीब सामाजिक चरित्र से जो माहौल बना वह सिर्फ एक समाज तक सीमित नहीं रहा।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार और टिकट बंटवारे में समाज के व्यापक वर्गों से समर्थन हासिल करने की कोशिश दिखी। इससे पश्चिमी महाराष्ट्र, मराठवाड़ा, उत्तरी महाराष्ट्र और विदर्भ के कुछ हिस्सों में पार्टी को फायदा हुआ। एनसीपी के मुख्य चुनाव प्रचारकों में सिर्फ मराठा समाज के लोग नहीं थे बलिक अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम समाज के नेता भी थे। पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में पार्टी ने अन्य पिछड़ा वर्ग में आने वाले धांगर समाज के लोगों को स्थापित मराठा नेताओं के खिलाफ उम्मीदवार बनाया। महाराष्ट्र में जहां शिवाजी महाराज सबसे बड़े प्रतीक हैं, वहां विभिन्न सामाजिक वर्गों को एकजुट करने के उन्हीं के तरीके को अपनाया गया। इन चुनावों से यह साफ हो गया कि भाजपा पिछले तीन दशक से जिस माली-धांगर-वंजारी गठजोड़ पर काम कर रही है, वह टूट सकता है। एक ब्राह्मण मुख्यमंत्री के नेतृत्व में इस समीकरण को चलाए रखना भाजपा के लिए आसान नहीं है। इससे महाराष्ट्र में संघ परिवार के मूल सामाजिक चरित्र की भी पोल खुलती है। विपक्ष भी इसे ठीक से समझ रहा है। सत्ताधारी पार्टी की रणनीति यह रही है कि विभिन्न सामाजिक वर्गों को बांटा जाए और मराठों को अलग-थलग किया जाए और सभी समुदायों से लेन-देन के आधार पर समर्थन लिया जाए। इसी आधार पर बड़े-बड़े दावे चुनावी जीत को लेकर सत्ताधारी पार्टी की ओर से किए गए थे। लेकिन नतीजे बता रहे हैं कि इन सामाजिक अंतर्विरोधों के जोखिम क्या हैं और इनका प्रबंधन कितना मुश्किल है।

इन बातों के आधार पर देखा जाए तो विपक्ष के पास सत्ताधारी पार्टी को बेदखल करने का वास्तविक अवसर था। लेकिन पिछले पांच सालों की अपनी गलती और महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी की दिशाहीनता की वजह से विपक्ष इसमें कामयाब नहीं हुआ। लेकिन विपक्ष मे बैठने के जनादेश को स्वीकार करते हुए विपक्ष यहां सत्ताधारी गठबंधन से संबंधित संकटों को सामने लाने का काम कर सकती है और इस आधार पर लोगों को गोलबंद करने का काम कर सकती है। आने वाले दिन ऐसी संभावनाओं से भरे हुए होंगे क्योंकि सत्ताधारी गठबंधन ने विपक्ष के अवसर देने वाले कदम उठाने शुरू कर दिए हैं और इसकी शुरुआत ही एक संकट से हो रही है।

 
 

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