जब सब्जियों के दाम काफी बढ़ जाएं

सब्जियों की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने की सरकार की रणनीति गड़बड़ है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

भारत में खाद्य कीमतों में उतार-चढ़ाव इतना सामान्य है कि सरकार की प्रतिक्रिया की भी निंदा होती है क्योंकि इसमें किसानों की स्थिति सुधारने के जुबानी वादे के अलावा कुछ नहीं होता। पिछले कुछ हफ्तों में सब्जियों और खास तौर पर प्याज की कीमतों में हुई भारी बढ़ोतरी की सरकार में काफी चर्चा हुई है। लेकिन इसके बावजूद न तो न्यूनतम निर्यात मूल्य तय करने का काम किया गया और न ही भंडारण पर अधिकतम सीमा तय करने की घोषणा हुई। 2017 में सरकार ने प्याज और टमाटर की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए यह काम किया था। उस वक्त ये दोनों क्रमशः 110 रुपये और 80 रुपये प्रति किलो के भाव पर बेचे जा रहे थे। हर दूसरे साल इन कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी सरकार को परेशान करती है। हालांकि, नीति निर्धारक ये कहते हैं कि कीमतों में बढ़ोतरी की वजहें उनके नियंत्रण से बाहर हैं।

पहली बात तो यह है कि सरकार त्वरित कार्रवाई करके अपने सालों की नाकामी को छिपाने का काम करती है। सरकार इसे ढांचागत समस्या नहीं बल्कि अलग से समस्या मानती है। दूसरी बात यह कि सरकार अपने वादे और अपने कार्यों के आपसी विरोध को सही ठहराने की कोशिश करती है। जो सरकार ‘एक देश, एक बाजार’ जैसी बड़ी बात करती है, वह किसानों की बाजार तक पहुंच को बाधित करती है सिर्फ इसलिए कि कीमतों को तुरंत नियंत्रित किया जा सके। तीसरी बात यह कि सरकार खुद को ‘असहाय’ दिखाकर मध्य वर्ग के अपने वोट बैंक को की भावनाओं से खुद को जोड़ने की कोशिश करती है। लेकिन इस तरह की भावनात्मक राजनीति का जोखिम यह है कि इसमें अहम मुद्दे किनारे चले जाते हैं। सरकार कीमतों में बढ़ोतरी के मूल मुद्दे का समाधान नहीं करती। समस्या यह है कि हमारी नीतियों के केंद्र में किसान नहीं बल्कि उपभोक्ता हैं और इसी पूर्वाग्रह से न सिर्फ नीतियां बनती हैं बल्कि पूरा विमर्श भी चलता है। लेकिन जमीनी स्थितियां इन नीतियों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े करती हैं।

सब्जियों की अंतिम कीमतों में से 60 से 70 फीसदी किसानों के पास नहीं जाते। इसका मतलब यह हुआ कि कीमतों का बड़ा हिस्सा बिचौलियों के पास जाता है। कीमतों पर किसानों का नियंत्रण नहीं है। वहीं दूसरी तरफ खुदर विक्रेता सबसे अधिक मुनाफा लेते हैं। इसलिए थोक मूल्यों और खुदरा मूल्यों में तालमेल नहीं रहता। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में प्याज की थोक कीमतें जनवरी, 2018 में 32 रुपये प्रति किलो से घटते हुए अप्रैल, 2018 में 9 रुपये प्रति किलो पर आ गई लेकिन खुदरा कीमतें 49 रुपये प्रति किलो से घटकर 38 रुपये प्रति किलो तक ही आ पाई। इसी तरह पिछले कुछ हफ्तों से दिल्ली में प्याज की थोक कीमतें 30 से 32 रुपये प्रति किलो रही है लेकिन खुदरा कीमतें 50 रुपये से 59 रुपये प्रति किलो के बीच रही है।

सरकार ने हस्तक्षेप के लिए जो निर्णय लिए हैं, उनसे इस समस्या का ढांचागत समाधान नहीं होता दिख रहा। उत्पादक और उपभोक्ता के बीच सही ढंग से कीमतों का आदान-प्रदान नहीं हो रहा। इन नीतियों में उपभोक्ताओं के प्रति अनुकूलता भी नहीं है। इंटरनैशनल बैंक आॅफ रिकंस्ट्रक्शन ऐंड डेवलपमेंट की 2017 की रिपोर्ट में बताया गया है कि उपभोक्ताओं के प्रति कीमतों के पूर्वाग्रह का इस्तेमाल करके प्याज के व्यापार को बाधित करने का काम सरकार करती है। स्थायी कारोबारी नीतियों के अभाव में उत्पादकों और उपभोक्ताओं को अलग-अलग करके देखा जाता है। न्यूनतम निर्यात की दर अभी 850 डाॅलर प्रति टन है जबकि निर्यात समता मूल्य 300 डाॅलर प्रति टन है। इस वजह से किसान निर्यात नहीं कर पाएंगे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक निर्यातक के तौर पर भारत की साख भी कमजोर होगी।

विडंबना यह है कि सरकार 2022 तक किसानों की आमदनी दोगुनी करने की बात करती है और इसके साथ ही कृषि निर्यात को बढ़ाकर 2022 तक 60 अरब डाॅलर करना चाहती है। इसके लिए अधिक क्षमता वाली बागवानी उत्पादों और प्रसंस्कृत कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाना चाहती है। लेकिन जमीनी स्तर पर किसान अब भी मंडी व्यवस्था में उलझे हुए हैं जिसमें कीमतों के नियंत्रित करने का काम कारोबारी और एजेंट करते हैं। पिछले दो दशक में भारतीय खाद्य बाजार में नए हितधारकों के उभार के बावजूद न तो कृषि उपज मंडी समिति व्यवस्था में कोई सुधार हुआ है और न ही इन बदलावों के लिए नीतियों के स्तर पर कुछ हुआ है। सरकार उपभोक्ताओं के लिए जो पूर्वाग्रह रखती है, उस वजह से कीमतों में संतुलन नहीं बन पाता और कृषि बाजार में ढांचागत समस्याएं बनी हुई हैं। यह एक तथ्य है कि अधिक उपभोक्ता कीमतों से इस बात की गारंटी नहीं होती कि किसानों को भी अधिक कीमतें मिलेंगी। किसान भी खाने-पीने की काफी चीजें खरीदते हैं। इसलिए बढ़ती कीमतों की वजह से दिक्कत सिर्फ उपभोक्ताओं को नहीं बल्कि किसानों को भी होती है। इन किसानों के लिए किसे जिम्मेदार ठहराया जाए?

 
 

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