प्लास्टिक कचरे की भरमार

प्लास्टिक कचरे की भरमार की वजह से यह संभव नहीं हो पाएगा कि जो समस्या दिख नहीं रही वह नहीं हो

 

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नेताओं की ओर से अक्सर सार्वजनिक तौर पर कहा जा रहा है कि प्लास्टिक का इस्तेमाल बंद होना चाहिए। हालांकि, इन बातों पर उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री ने घोषणा की थी कि भारत को प्लास्टिक प्रदूषण मुक्त बनाना है लेकिन एक बार इस्तेमाल वाले प्लास्टिक को पूरी तरह से प्रतिबंधित करने के लिए व्यापक अभियान 2022 तक का बनाया गया है। पहले से मंदी का सामना कर रही अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर पड़ने की आशंका है। इससे तकरीबन 10,000 औद्योगिक इकाइयां बंद हो जाएंगी।



प्रतिबंध की अटकलों के बीच यह स्पष्ट था कि जमीनी तैयारी नहीं हुई है। सिंगल यूज प्लास्टिक की परिभाषा को लेकर स्पष्टता का अभाव है। इसका इस्तेमाल रोकने से संबंधित कोई दिशानिर्देश नहीं है। न ही इसके विकल्प को लेकर स्थिति साफ है। अलग-अलग राज्यों में लगाए गए प्रतिबंध से भी कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। अधिकांश सिंगल यूज प्लास्टिक इस्तेमाल के थोड़े समय बाद ही कचरा बन जाते हैं। ई-काॅमर्स कंपनियां और पैकेज्ड फूड कंपनियां ऐसे प्लास्टिक का सबसे अधिक इस्तेमाल करती हैं।



हाल के दशकों में कुल कचरे में ऐसी प्लास्टिक की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। भारत में हर दिन तकरीबन 25,940 टन प्लास्टिक कचरा निकलता है। इसमें से तकरीबन 40 फीसदी ही जमा किया जाता है और रिसाइकल हो पाता है। इससे न सिर्फ पानी प्रदूषित होता है बल्कि नालियां जाम होती हैं और मिट्टी भी खराब होती हैं। प्लास्टिक प्रदूषण इतना बढ़ गया है कि इसे खा लेने की वजह से मछलियों, गायों और अन्य प्रजातियों के मरने की तस्वीरें अक्सर आते रहती हैं।



हालिया शोधों से पता चला है कि इंसान हर दिन औसतन सूक्ष्म प्लास्टिक के 250 कणों को अपने शरीर के अंदर ले रहा है। ये कण न सिर्फ प्लास्टिक कचरे के कुप्रबंधन से फैल रहे हैं बल्कि फेस वाॅश और टूथपेस्ट जैसी चीजों के जरिए भी इंसानों में जा रहे हैं। हालांकि, इसका मुख्य स्रोत नल और बोतल का पानी है।



लेकिन इन तथ्यों की जानकारी होने के बावजूद प्लास्टिक का इस्तेमाल कम नहीं हो रहा है। लोगों को लगता है प्लास्टिक इस्तेमाल सुविधाजनक है। मेडिकल क्षेत्र में प्लास्टिक का इस्तेमाल सुरक्षित और स्वच्छ माना जाता है जबकि कई ऐसे रिपोर्ट हैं जिनमें यह बताया गया है कि प्लास्टिक बोतलों में रखी गई दवाइयां खराब होती हैं और प्लास्टिक में दवाओं को पैक करने के लिए मानकों का पालन भारत नहीं होता।



प्लास्टिक इस्तेमाल को लेकर ऐसी संस्कृति बन गई है कि इसमें जो लोग इसे इस्तेमाल कर रहे हैं वे इसके न तो सही निस्तारण के लिए जिम्मेदार हैं और न ही इसके नुकसानों के प्रति। इस तरह की जीवनशैली का ही परिणाम दिल्ली के गाजीपुर में बना 65 मीटर का कचरे का ढेर है। कचरे के ये ढेर जमीन के अंदर के पानी को प्रदूषित करके जलाए जाने पर कैंसर फैलाने वाले प्रदूषण की भी वजह बन रहे हैं।



प्लास्टिक कचरे को रिसाइकिल करने के लिए सबसे जरूरी है स्रोत पर ही प्लास्टिक को अलग-अलग कर लिया जाए। अधिकांश नगरपालिकाएं प्लास्टिक और ठोस कचरे से संबंधित नियमों को लागू करने के लिए संघर्ष कर रही हैं। सही कचरा प्रबंधन नहीं होने की वजह से खराब और गंदे प्लास्टिक रिसाइक्लिंग को और खर्चीला और असुरक्षित बना रहे हैं। खाना पैक करने में इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक में कई परतें होती हैं और इन्हें रिसाइकिल करना बेहद मुश्किल होता हैं। इन्हें वापस लेने का नियम बनना चाहिए। भारत में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश प्लास्टिक पहले के मुकाबले कम गुणवत्ता वाले प्लास्टिक में रिसाइकिल किया जाता है।



चक्रिय प्लास्टिक अर्थव्यवस्था जिसमें हर प्लास्टिक रिसाइकिल हो, एक निश्चित सीमा तक ही संभव है। क्योंकि रिसाइक्लिंग की भी एक सीमा है। रिसाइक्लिंग का कारोबार वाणिज्यिक और रोजगार संबंधित वजहों से गरीब जगहों और लोगों तक जा रहा है। भारत में कंपनियां सस्ता पड़ने की वजह से प्लास्टिक आयात करने का तरजीह देते हैं। ये कंपनियां भारत के प्लास्टिक कचरे के रिसाइक्लिंग पर ध्यान नहीं देतीं।



सड़कों और भवनों के निर्माण में प्लास्टिक के इस्तेमाल जैसी तकनीक भी है। लेकिन इनमें इस्तेमाल होने के बावजूद प्लास्टिक ब्रह्मांड में बना ही रहेगा। इसके विकल्प के तौर पर कागज, कपड़ा, शीशा या अन्य किसी चीज का भी इस्तेमाल होगा तो इसका अपना पर्यावरणीय प्रभाव होगा। पौधों की सामग्रियों से बनाया जाने वाला बायोप्लास्टिक भी आसानी से नष्ट नहीं होता अगर इसे खुले में फेंक दिया जाए।



इसलिए बढ़ता कचरा एक ऐसी समस्या है जो गलत निस्तारण की वजह से विकराल रूप लेता जा रहा है। इसके लिए बढ़ता उपभोग भी जिम्मेदार है। इसके समाधान के लिए हर चीज को इस्तेमाल के बाद फेंक देने की संस्कृति पर भी रोक लगाने की जरूरत है। क्योंकि इससे दोबारा इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति खत्म हुई है। अगर हम लोगों ने कचरा बढ़ाना बंद नहीं किया तो जो कचरा पैदा किया जा रहा है उसी में समाज का घुटना जारी रहेगा।

Updated On : 22nd Nov, 2019

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