उच्चतम न्यायालय से आधी खुशी

अत्याचार अधिनियम को लेकर हालिया फैसला कानून की एम कमी में सिर्फ सुधार भर है

 

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इस दशक में उच्चतम न्यायालय में अपनी गलतियों के सुधार के कई मौके दिखे हैं। इसमें दो सबसे हालिया उदाहरण हैं 2017 का केएस पुट्टास्वामी  और 2018 का नवतेज सिंह जौहर मामला। इन दोनों मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने क्रमशः 1976 के एडीएम जबलपुर बनाम एसके शुक्ला और 2013 के सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज फाउंडेशन के फैसले को पलटने का काम किया था। वक्त और परिस्थितियों में बदलाव की वजह से अदालतें अपना दिमाग बदलते रहती हैं लेकिन इन दो मामलों में अदालत का हृदय परिवर्तन भी दिखता है। यह बदलाव गलती को स्वीकार करने से आती है।



अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निषेध अधिनियम, 1989 से संबंधित 2018 के एसके महाजन मामले में निर्णय पर पुनर्विचार करके उच्चतम न्यायालय ने पुनर्विचार के दौरान अपनी एक बड़ी गलती को सुधारने का काम किया है। हालिया फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने उस निर्देश को वापस ले लिया है जिसमें यह कहा गया था कि इस कानून के तहत एक सरकारी अधिकारी के गिरफ्तारी से पहले उसके वरिष्ठ अधिकारी से अनुमति लेनी होगी और एफआईआर दर्ज करने से पहले डीएसपी के स्तर पर प्राथमिक जांच करनी होगी।



इस मामले के विश्लेषण के बाद यह पता चलता है कि उच्चतम न्यायाल ने एक गलती को सुधारने का काम किया है। कई बार ऐसे निर्देश जारी किए जाते हैं लेकिन इस निर्देश की वजह से इस कानून के जरिए राहत हासिल करने की संभावनाओं को ही कुचलने का काम हो रहा था।



लेकिन हालिया निर्णय का एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि महाजन मामले में जो निर्णय आया था उसमें भारत की सामाजिक सच्चाइयों की अनदेखी की गई थी और यह माना गया था कि इस कानून का दुरुपयोग दलित या आदिवासी कर सकते हैं। हालिया निर्णय में यह स्वीकार किया गया है कि इस तरह की घटनाएं हो रही हैं और यह आपराधिक न्याय व्यवस्था की नाकामी है कि ऐसे मामलों में अधिकांश लोगों को सजा नहीं हो पा रही है। महाजन मामले में फैसला दो सवर्ण जजों की पीठ से आया था लेकिन हालिया फैसला जिस पीठ से आया उसमें एक दलित जज भी शामिल थे।



महाजन मामले के निर्णय के संदर्भ में हालिया फैसला स्वागतयोग्य तो लगता है लेकिन इसकी प्रासंगिकता धूमिल दिखती है। इसकी पहली वजह तो यह है कि 1989 के कानून में 2018 में जो संशोधन विधेयक आया उसके जरिए महाजन मामले के निर्णय को पलट दिया गया। इसलिए हालिया पुनर्विचार सिर्फ एक औपचारिकता थी। वहीं दूसरी बात यह कि केंद्र सरकार से न्यापालिका की स्वतंत्रता अपने सबसे बुरे दौर में है। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि यह निर्णय कितना न्यायपालिका के हृदय परिवर्तन की वजह से हुआ और कितना केंद्र सरकार की इच्छा की वजह से। हाल के दिनों में यह दिखा है कि अदालत प्रमुख मुद्दों पर सरकार की हां में हां मिलाने का काम कर रही है। इस पीठ में शामिल न्यायमूर्ति बीआर गवई पिछले एक दशक में उच्चतम न्यायालय में पहले दलित जज हैं। लेकिन उन्होंने सिर्फ फैसला नहीं लिखा। पीठ की ओर से फैसला सुनाने का काम ब्राह्मण न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने किया। सर्वोच्च न्यायालय में सबआल्ट्रन नहीं बोल पाते हैं।



जिन दो मामलों का जिक्र पहले किया गया है, उनमें महाजन मामले के निर्णय पर पुनर्विचार का फैसला अलग है। पहले दोनों मामलों में सभी के अधिकारों की रक्षा का आयाम है जबकि इस मामले में दलितों और आदिवासियों के अधिकारों का हनन रोकने की कोशिश है। जिसके लिए अदालत खुद ही पहले जिम्मेदार बनी थी। ऐसे में हालिया निर्णय का नतीजा यह नहीं होगा कि दलितों और आदिवासियों को पहले के मुकाबले अधिक आजादी मिल जाएगी बल्कि जातिवादी और गैरजवाबदेह न्यायपालिका के हाथों उनके न्याय के अधिकार में क्षरण बंद होगा।



क्या सर्वोच्च न्यायालय ने महाजन मामले में अपने निर्णय की सारी गलतियों को समझने का काम किया है? पुनर्विचार के फैसले को पढ़ने के बाद ऐसा नहीं लगता है। लेकिन फिर भी जिन गलतियों को अदालत ने स्वीकार किया है, वह भी स्वागतयोग्य है। हालिया निर्णय पर कम से कम आधी-अधूरी खुशी तो जाहिर की ही जा सकती है।

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