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काॅरपोरेशन कर में कमीः कौन उठाएगा बोझ?

सरकार पर बोझ बढ़ेगा लेकिन गलत ढंग से निवेश बढ़ने की बात हो रही है

 

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काॅरपोरेशन कर में कटौती के साथ ही सरकार ने स्वीकार कर लिया है कि मंदी चक्रिय नहीं है बल्कि वास्तविक है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर लगे सरचार्ज के हटने, सिंगल ब्रांड रिटेल में निवेश को सरल बनाने, कोयला खनन में 100 फीसदी विदेशी निवेश को मंजूरी देने, सरकारी बैंकों को नए सिरे से संगठित करने और काॅरपोरेशन टैक्स में 20 सितंबर, 2019 को हुई कटौती के बाद शेयर बाजार में सकारात्मक माहौल बना।



कर सुधार में सबसे अच्छी रणनीति यह मानी जाती है कि कर आधार बढ़ाएं जबकि कर की दर कम करें। काॅरपोरेट आयकर के मामले में यह और जरूरी हो जाता है। ऐसे में सरकार को पहले से दी गई रियायतों का अध्ययन करना चाहिए था तब कर की दर में कटौती करनी चाहिए थी। पांच साल पहले पिछले वित्त मंत्री का काॅरपोरेट कर को 25 फीसदी पर लाने का वादा इसी बात पर टिका था। लेकिन सरकार निवेश को लेकर माहौल ठीक करने की जल्दबाजी में काॅरपोरेट कर को घटा दिया। जो कंपनियां पहले से कर छूट नहीं ले रही हैं, उनके लिए अब यह दर 22 फीसदी होगी। लेकिन और अधिक दर पर कर दे रही छोटी इकाइयों की अर्हता को लेकर अभी कई बातें स्पष्ट होनी हैं। अगर कर का आधार बढ़ाना ही लक्ष्य था तो फिर इस पर विचार करने की जरूरत है कि आखिर मैट को 18 फीसदी से घटाकर 15 फीसदी पर क्यों लाया गया।



कोई भी टैक्स अर्थशास्त्री यह नहीं कहेगा कि कर नीतियों में कई लक्ष्य हों और इस वजह से कर रियायत का दायरा बढ़ता जाए। कर रियायत काफी अधिक पहले से है। इसके जरिए क्या हासिल किया जा सकता है, यह भी स्पष्ट नहीं है। बजट में ऐसे 28 विषयों का जिक्र है जिस पर कर रियायत दी जा रही है। इसमें विशेष आर्थिक क्षेत्रों से हो रहे निर्यात से लेकर बिजली के वितरण, बुनियादी ढांचे का विकास, खनिज तेल के उत्खनन, चैरिटेबल ट्रस्ट और संस्थानों, खाद्य प्रसंस्करण, उत्तर पूर्वी और हिमालयी राज्यों की इकाइयां आदि शामिल हैं।



बाजार की प्रतिक्रिया इस उम्मीद पर आधारित थी कि कर में की गई कटौती का काफी लाभ होगा। कर की दर में कटौती से पहले यह दर 35 फीसदी थी जो प्रभावी तौर पर 2017-18 में 29.49 फीसदी थी। उस साल काॅरपोरेट कर के जरिए सरकार को 7.66 लाख करोड़ रुपये का राजस्व हासिल हुआ था। कर की दर कम करके 22 फीसदी करने से 1.12 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान होगा। नई कंपनियों के लिए यह दर 15 फीसदी है लेकिन उन्हें तब तक लाभ नहीं मिलेगा, जब तक वे मुनाफा नहीं कमाती हैं। 2019-20 में कर संग्रह को लेकर जो पूर्वानुमान हैं, उनमें बताया जा रहा है कि नुकसान अपेक्षाकृत कम होगा लेकिन इसके साथ यह भी सही है कि कर संग्रह भी कम होगा।



कर में कटौती का बोझ राज्यों को उठाना पड़ेगा। क्योंकि कटौती आधार दर में की गई है न कि उपकर और सरचार्ज में। केंद्र और राज्यों में करों के बंटवारे की जो व्यवस्था है, उसके हिसाब से राज्यों को 60,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। जबकि केंद्र सरकार को जो 82,000 करोड़ का नुकसान होगा, उसमें से उसे 20,000 करोड़ रुपये सरकारी कंपनियों के लाभांश के रूप में मिल जाएगा। लेकिन राज्यों ने पहले की दर के हिसाब से खर्च की जो योजना बना रखी थी उनमें उन्हें आनन-फानन कमी करनी पड़ेगी। रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में आई मंदी की वजह से स्टांप और निबंधन से होने वाली आमदनी भी कम होगी। जीएसटी के बाद राज्यों के पास आय का यही सबसे प्रमुख स्रोत बचा है।



सवाल यह भी है कि क्या इस कटौती से अर्थव्यवस्था की स्थिति ठीक होगी। बाजार की प्रतिक्रिया के बावजूद इसमें संदेह व्यक्त किया जा रहा है। पहली बात तो यह है कि नई कंपनियों के लिए कर की दर तब लागू होगी जब वे मुनाफा कमाना शुरू करेंगी। यह देखा जाना है कि क्या इससे निवेश बढ़ेगा। दूसरी बात यह कि भारत में समस्या मांग में कमी की है। इसमें यह देखा जाना है कि आपूर्ति के स्तर पर स्थितियों को सुधारने के लिए क्या किया जाता है। मौजूदा माहौल में मांग पैदा करने के लिए सरकार को काफी पैसे खर्च करने होंगे लेकिन वित्तीय घाटा की बाधा आड़े आएगी। वित्त मंत्री सरकारी कंपनियों को अपनी निवेश योजनाओं के क्रियान्वयन को कह रही हैं लेकिन सरकार ने इन कंपनियों से इतना अधिक लाभांश ले लिया है कि इनके पास निवेश के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है। ऐसे में अगले कुछ महीने में नीतियों के स्तर पर माहौल कैसे बदलता है, यह देखा जाना है।

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