ISSN (Print) - 0012-9976 | ISSN (Online) - 2349-8846

महाराष्ट्र में विपक्ष के लिए नई हवा?

हालिया घटनाक्रम की वजह से महाराष्ट्र में चुनाव अभियान प्रदेश के सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों पर आ गया है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

21 अक्टूबर को होने वाले महाराष्ट्र विधानसभा चुनावो के लिए प्रचार अभियान जोर पकड़ रहा है। पिछले कुछ हफ्तों के घटनाक्रम से चुनावों में अनिश्चितता बढ़ी है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार को प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस मिलने और पवार द्वारा इसके रणनीतिक इस्तेमाल से सत्ताधारी गठबंधन उलझ गया। लेकिन इसके पहले भी पवार जिस तरह से प्रचार अभियान चला रहे थे उससे सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और शिव सेना गठबंधन का गणित बिगड़ सकता है। क्यों इस तरह के अभियान और इनके संदेशों का महाराष्ट्र के ग्रामीण युवाओं पर असर पड़ रहा है?



बड़े फलक पर देखें तो यह चुनावी विमर्श के आधारों में बदलाव की वजह से होता दिख रहा है। भाजपा-शिव सेना गठबंधन का प्रचार अभियान मोटे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि, अनुच्छेद-370 हटाए जाने, शिव सेना की ओर से उठाए जा रहे राम मंदिर के मुद्दे और भाजपा के हिंदुत्व के मुद्दे के आसपास चल रहा है। न सिर्फ अमित शाह महाराष्ट्र में अनुच्छेद-370 का जिक्र कर रहे हैं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी ने पवार के एक बयान को तोड़-मरोड़कर उन पर पाकिस्तान समर्थन होने का आरोप भी लगाया। इस तरह के अभियान का मुकाबला करने के लिए यह जरूरी है कि चुनावी विमर्श को जमीनी स्तर पर ले जाया जाए। पवार के चुनाव प्रचार अभियान को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि वे यही कर रहे हैं।



प्रथम दृष्टया ये लगता है कि पवार के भाषणों में खेती और ग्रामीण क्षेत्र के संकट, बेरोजगारी और सरकार की नाकामी का जिक्र है। लेकिन पवार इन मुद्दों को महाराष्ट्र के सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहास से जोड़कर इनके समाधान की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। उदाहरण के तौर पर उन्होंने पेशवा के शासन का जिक्र किया। उन्होंने नाना फडणवीस के शासन काल का जिक्र किया। इसके जरिए उन्होंने ये बताया कि किस तरह से महाराष्ट्र सरकार पिछलेकुछ सालों में कृषि संकट, बाढ़ और सूखा जैसी समस्याओं के समाधान में नाकाम रही है। जिन योजनाओं को सरकार अपनी बहुत बड़ी कामयाबी बता रही थी, उनके बारे में सत्ता पक्ष भी चुप है। इन योजनाओं पर हमला करने से लोग गोलबंद होंगे। बाढ़ के वक्त जब विपक्ष के नेता जमीनी स्तर पर काम कर रहे थे उस वक्त भी मुख्यमंत्री चुनाव प्रचार कर रहे थे। विपक्ष के नेताओं के भाजपा और शिव सेना में शामिल होने को विपक्ष की ओर से शिवाजी महाराज से जोड़कर प्रस्तुत किया जा रहा है जो हमेशा प्रतिबद्ध रहने की बात कहते थे। इससे विपक्ष को अपने उन समर्थकों को भी उत्साहित करने में मदद मिली है जो पार्टी में बने रहे। छत्रपति के बेटे संभाजी राजे को अपने ही खेमे से भीतरघात काम सामना करना पड़ा था। उनका अपना एक प्रभाव इस वर्ग में है। संभाजी राजे की भूमिका निभाने वाले अभिनेता भी एनसीपी के सांसद हैं और इस चुनाव में प्रचार कर रहे हैं। कुछ स्थापित नेताओं के हटने से लोगों को सीधे शीर्ष नेतृत्व से संवाद करने का मौका मिल रहा है। पवार की रैलियों में युवाओं की भारी संख्या को इससे जोड़कर देखा जा रहा है।



गहरे तौर पर देखें तो युवाओं की ऐसी प्रतिक्रिया की वजह से मराठा समाज के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक तौर पर अलग-थलग पड़ना भी है। इसकी मार छोटे किसान और मजदूर झेल रहे हैं। आधुनिक महाराष्ट्र के इतिहास में सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक आयामों का लोगों के जनजीवन पर असर रहा है। इसके आधार पर ही उदार संस्थानों की बुनियाद रखी गई है। हालांकि, अलग-थलग पड़ने का काम सिर्फ पांच सालों में नहीं हुआ बल्कि सत्ताधारी दल की ओर से सुनियोजित तरीके से कृषक समाज के कुछ वर्गों को कमजोर करने का काम हुआ। इस तरह की कोशिशों की वजह से किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी नहीं मिल पा रही है, सहकारी समितियों को निशाना बनाया जा रहा है और गैर कृषक अगड़ी जातियों में से मुख्यमंत्री बनाए जा रहे हैं। महाराष्ट्र, हरियाणा और गुजरात के मुख्यमंत्री इसके उदाहरण हैं। यही वजह है कि ये चुनाव महाराष्ट्र के चुनाव में मराठा मुद्दों को केंद्र में रखे जाने की कसौटी भी बन गए हैं। अभी जो असंतोष है, उससे विपक्ष को लाभ मिल सकता है बशर्ते वह नए नेतृत्व को प्रोत्साहन दे और प्रगतिशील सोच को आगे बढ़ाए।



विपक्ष की पक्ष में बही यह नई हवा वोट में बदलती है या नहीं, इसका अंदाज लगाना अभी मुश्किल है। लेकिन इसके दो संदेश निकलते हैं। पहली बात तो यह कि इसने इस बात को स्थापित किया है कि अभी भी मूल बात मुश्किल परिस्थितियों में लोगों के बीच जाना है। दूसरी बात यह कि ऐसा करनेके लिए आम सामाजिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों में से नया नेतृत्व विकसित करने की जरूरत है। विपक्ष इस दूसरे संदेश पर कितना चल पाता है, उससे ही उसकी प्रासंगिकता तय होगी। भले ही हालिया चुनावी परिणाम इस पर निर्भर नहीं करते हों।

Comments

(-) Hide

EPW looks forward to your comments. Please note that comments are moderated as per our comments policy. They may take some time to appear. A comment, if suitable, may be selected for publication in the Letters pages of EPW.

Back to Top