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चिराग तले अंधेरा

खुले में शौच करने की वजह से दो दलित बच्चों की हत्या ‘जातिगत सोच’ को दिखाती है

 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत 2 अक्टूबर, 2014 को हुई थी। इसका लक्ष्य यह था कि 2 अक्टूबर, 2019 को पूरे भारत को खुले में शौच से मुक्त कराना है। यह विडंबना ही है कि इस अभियान की शुरुआत अहिंसा के सबसे बड़े समर्थक के जन्मदिन पर की गई थी लेकिन अहिंसा के विरोधी न सिर्फ हिंसा में शामिल रहते हैं बल्कि हत्याएं भी करते हैं। मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के भावखेड़ी गांव में एक दस साल के बच्चे और एक 12 साल के बच्चे को लाठी से पीटकर मार दिया गया। उनका कसूर यह था कि वे खुले में शौच कर रहे थे। जिस 25 सितंबर को इन बच्चों की हत्या हुई, उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न्यूयाॅर्क में बिल ऐंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन की ओर से स्वच्छ भारत अभियान के लिए एक सम्मान हासिल किया। अगस्त, 2018 में मीडिया में यह खबर आई कि जिस जफर हुसैन ने राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में खुले में शौच कर रही महिलाओं की फोटो लिए जाने पर आपत्ति जताई थी, उनकी हत्या हो गई। जनवरी, 2018 में उत्तर प्रदेश का एक वीडियो आया जिसमें दिखाया गया कि खुले में शौच करने वाले लोगों को मुरादाबाद जिले के काटघाट में पीटा जा रहा है।

भावखेड़ी में इन बच्चों की हत्या के कुछ दिनों बाद केंद्र सरकार ने खुले में शौच से मुक्त क्षेत्रों में बल के इस्तेमाल को लेकर दिशानिर्देश जारी किए। लेकिन इसका पालन कहीं नहीं किया जा रहा है। इस अभियान के तहत उन क्षेत्रों में जल्दी-जल्दी शौचालय बनवाए गए जहां शौचालय या तो नहीं थे या कम थे। फिर इन्हें खुले में शौच से मुक्त घोषित कर दिया गया। लेकिन दो साल पहले ओडीएफ घोषित हुए मुंबई से भी यह खबर आई कि झुग्गियों और समुद्र तटीय इलाकों में अब भी लोग खुले में शौच करने जा रहे हैं। इसकी वजह शौचालयों की अपर्याप्त संख्या, पानी और बिजली की अपर्याप्त उपलब्धता और शौचालयों के बच्चों के इस्तेमाल के अनुकूल नहीं होना है।

लक्ष्यों को हासिल करने को ही इस योजना का ध्येय बना लिया गया। इसके तहत जो लक्ष्य हासिल करने की कोशिश हुई, उसके लिए जोर-जबर्दस्ती नहीं की जा सकती बल्कि जागरूकता और संवाद के जरिए आगे बढ़ा जा सकता है। स्वास्थ्य और सफाई मूल लक्ष्य होने चाहिए। हालांकि, हाल के समय में मीडिया में यह बात आई है कि हमला करने वालों ने सिर्फ सफाई और स्वास्थ्य की वजह से ऐसा नहीं किया।

जिन बच्चों की हत्या हुई, उसमें जाति का भी एक आयाम है। आईजेडए संस्थान के श्रम अर्थशास्त्र रिपोर्ट में 2014 से 2018 के बीच उत्तर भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच को लेकर आए बदलावों का अध्ययन किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति परिवारों के साथ अधिक जोर-जबर्दस्ती की गई। इसमें जुर्माना, सार्वजनिक सुविधाओं से वंचित किया जाना और पुलिस द्वारा रोककर रखना भी शामिल है। शिवपुरी के मामले में मीडिया रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि वाल्मीकि समाज के कुछ लोगों को अगड़ी जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगों के शौचालयों की सफाई करनी थी। इनमें दोनों बच्चों की हत्या का आरोपित भी शामिल है। बच्चों के परिवार ने शौचालय बनाने के लिए आवेदन किया था लेकिन उन्हें पैसे नहीं जारी किए गए थे।

उनकी हत्या के इस मामले से पता चलता है कि भारत के गांवों में अब भी जाति किस तरह की भूमिका निभा रही है। इसमें एक बात यह भी है कि जिस क्षेत्र में दलित रहते हैं, उन क्षेत्रों का इस्तेमाल खुले में शौच करने के लिए अगड़ी जाति के लोग भी करते हैं। लेकिन जब दो दलित बच्चों ने गैर-दलित क्षेत्र में शौच किया तो इससे गैर-दलित समाज को इतना गुस्सा आया कि उसके लोगों ने सिर्फ चेतावनी नहीं दी बल्कि उसी स्थान पर ही उनकी हत्या कर दी।

पिछले पांच सालों में पर्यवेक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ता बार-बार ये कह रहे हैं कि स्वच्छ भारत अभियान तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक यह जाति और स्वच्छता को लेकर सामाजिक पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होता।

चाहे दूसरे पड़ोसी देशों का उदाहरण लें या फिर अफ्रीका का, जहां भी इस तरह का अभियान चला उनका परिणाम सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध है। इसके लिए देशव्यापी सघन जागरूकता अभियान, स्थानीय प्रशासन और सरकार में उच्च स्तर पर समन्वय और न सिर्फ शौचालय बनाने पर जोर देने बल्कि प्रभावी सीवेज तंत्र तैयार करने की भी जरूरत है। भारत में सबसे अधिक जोर ‘स्वच्छता’ और ‘प्रदूषण’ को लेकर जातिगत सोच को बदलने पर होना चाहिए। खुले में शौच से मुक्ति का परिणाम इन कोशिशों के बीच से निकलनी चाहिए।

 
 

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