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मौत के मुंह में खनन

खदानों में लगातार हो रही मौतें समावेशी विकास के दावों पर सवाल उठा रही हैं
 

The translations of EPW Editorials have been made possible by a generous grant from the H T Parekh Foundation, Mumbai. The translations of English-language Editorials into other languages spoken in India is an attempt to engage with a wider, more diverse audience. In case of any discrepancy in the translation, the English-language original will prevail.

 

मेघालय के खदानों में काम करने वाले मजदूरों की मौत ‘सबका साथ, सबका विकास’ की बात करने वालों के मुंह पर तमाचा है. विकास की विचित्र पक्रिया में कुछ वर्गों को ऐसा काम करना पड़ रहा है जिसमें उनकी जिंदगी दांव पर लगी रहती है. चूहे के बिल की तरह जो खदान होते हैं उनमें जो लोग उतरते हैं, वे अपने जीवन यापन के लिए जिंदगी को दांव पर लगाकर जाते हैं.
 
इस तरह का खनन मेघालय के जैंतिया पहाड़ियों में अवैध तौर पर होता है. 100 मीटर से अधिक गहरे इन खदानों में बांस की सीढ़ियों के जरिए लोग कोयला निकालने के लिए उतरते हैं. इनमें अधिकांश लोग नेपाल, बांग्लादेश और असम से पलायन करके आने वाले होते हैं. वहीं सबसे बुरी स्थिति में जीवन यापन कर रहे स्थानीय लोग भी इनमें शामिल होते हैं. नौ साल या उससे भी कम उम्र के बच्चे और छोटे कद के लोग भी इन खदानों में उतरते हैं. क्योंकि जमीन के अंदर के काम के लिए इन्हें उपयुक्त माना जाता है. अपने माथे पर टाॅर्च बांधे ये अंदर जाकर कोयला चुनते हैं और उसे रस्सी से बंधे पात्र में रखते जाते हैं जिसके जरिए कोयला बाहर आता है. 
 
इस अनियमित और खतरनाक उद्योग को मेघालय का ‘कुटीर उद्योग’ तब तक कहा जाता था जब तक 2014 में राष्ट्रीय हरित अभिकरण यानी एनजीटी ने इसे प्रतिबंधित नहीं किया था. हालांकि, इस प्रतिबंध को लागू करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं हुआ. सच्चाई तो ये है कि सत्ताधारी पार्टियां इसी वादे के साथ सत्ता में आईं कि वे इस प्रतिबंध को हटवाने का काम करेंगी. इस राज्य में चुनावी खर्चे का सबसे बड़ा स्रोत खनन है. कई मौजूदा मंत्री और विधायक खनन के कारोबार में हैं. 2018 के चुनावों में उतरे कई उम्मीदवार इस कारोबार में सक्रिय हैं. खनन के लिए बने केंद्रीय कानूनों से मेघालय को कभी छूट नहीं मिली लेकिन अब ‘गैरकानूनी’ प्रावधानों से पार पाने की कोशिश की जा रही है. 
 
सारे स्थानीय लोगों को खनन से फायदा नहीं हो रहा है. क्योंकि खनन से निजीकरण को बढ़ावा मिला है और जमीन पर कब्जा जमाया जा रहा है. इससे भूमिहीनता बढ़ रही है. जैंतिया पहाड़ियों में प्रति वर्ग किलोमीटर में 50 से अधिक खदान हैं. यह एक विडंबना ही है कि रोजगार के दूसरे साधन खत्म हो गए हैं और कोयला यहां की अर्थव्यवस्था का आधार बन गया है. जिनके पास अधिक पूंजी और संसाधन होते हैं, उन्हें अधिक मुनाफा मिलता है. जबकि स्थानीय लोग इन कोयला कारोबारियों के रहमोकरम पर आश्रित हैं.
 
13 दिसंबर, 2018 को 15 से अधिक मजदूर ऐसे ही एक खदान में फंस गए. लिटन नदी का पानी इस खदान में अचानक आ गया. तब से राहत कार्य चल रहा है लेकिन अहम शुरुआती समय गंवा दिया गया. खदान से पानी निकालने वाला पंप वहां दो हफ्ते बाद पहुंचा. खदानों का कोई नक्शा नहीं था जिससे राहत कार्य में मदद मिल सके. नौ सेना को राहत कार्य में लगाने के बावजूद मजदूरों के खराब हो रहे शवों को निकालना बेहद मुश्किल था. इसी जिले में 6 जनवरी, 2019 को फिर से दो मजदूरों की जान गई. गारो पहाड़ियों में हुई एक ऐसी ही घटना से वहां भी एनजीटी ने प्रतिबंध लगाया था. 2002 में इसी तरह से 40 लोगों की जान गई थी. 2013 में पांच खननकर्मियों को जान से हाथ धोना पड़ा था. ये घटनाएं यहां बेहद आम हैं. इनकी जवाबदेही किसी पर नहीं है.
 
इस तरह का खनन पर्यावरण के लिए भी बेहद नुकसानदेह है. जैंतियां पहाड़ियों को मृत नदियों की धरती कहा जाता है. क्योंकि यहां की नदियां अधिक सल्फर और धातुओं के कचरे से जहरीली और अम्लीय हो गई हैं. इससे न सिर्फ मछलियां मर रही हैं बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है. कोयले के खनन के लिए हजारों एकड़ जंगल नष्ट कर दिया गया. 2010 में  अनुमान लगाया था कि यहां 70,000 से अधिक बाल मजदूर हैं. इन स्थितियों में सरकार की ओर से की जाने वाली नियमन की बात पर भरोसा नहीं जगता. वैज्ञानिक खनन में भी इसका समाधान नहीं है. क्योंकि इसके लिए अनुकूल परिस्थितियां यहां नहीं हैं. कोयले की गुणवत्ता भी बहुत अच्छी नहीं है. इसलिए अधिक खर्च करके कोयला निकालना फायदे का काम नहीं है.
 
इन विपदाओं की जिम्मेदारी कौन लेगा? नव-उदारवादी दौर में इसका जवाब तलाशना मुश्किल हो गया है. मेघालय के मामले में यह सच है कि प्रतिबंध और नियमों के उल्लंघन की जानकारी के बावजूद यह कारोबार निर्बाध रूप से चल रहा है. इसमें इस तथ्य को नजरंदाज किया जा रहा है कि इंसान जीवनयापन के चक्कर में इन खदानों में चूहे की तरह रेंगकर कोयला निकालने के लिए चले तो जाते हैं लेकिन कोई आपदा आ जाए तो वे चूहे की तरह बाहर नहीं निकल पाते हैं.

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