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न्यायपालिका का खोखलापन

न्यायपालिका मनमानी और गैरजवाबदेही की समस्या से पार पाते नहीं दिख रही है
 

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इस साल फिर जनवरी का महीना सर्वोच्च न्यायालय के लिए उतार-चढ़ाव वाला रहा. 2018 में चार वरिष्ठ जजों ने उस समय के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ एक तरह का विद्रोह कर दिया था. 2019 के जनवरी में से उन चार में से एक न्यायमूर्ति रंजन गोगोई को कई विवादों के केंद्र में ला दिया है. वे अभी भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं. हालिया विवादों ने न सिर्फ न्यायपालिका की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि एक संस्था के तौर पर भी न्यायपालिका पर सवाल उठाए हैं. 
 
पहला विवाद उस उच्च स्तरीय समिति के उस निर्णय से जुड़ा हुआ है जिसमें सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को 2-1 के बहुमत से निलंबित करने का फैसला हुआ. इसमें न्यायमूर्ति एके सिकरी शामिल थे. सिकरी सरकार की राय से सहमत हो गए जिसे प्रधानमंत्री ने व्यक्त किया. अगर यह मान भी लें कि सिकरी का निर्णय सरकार द्वारा उन्हें राष्ट्रमंडल सचिवालय के अपील प्राधिकरण के लिए मनोनीत किए जाने से नहीं जुड़ा था तो भी यह सवाल उठता है क्या न्यायपालिका को इस बात की चिंता नहीं करनी चाहिए कि न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए बल्कि यह होते हुए भी दिखना चाहिए. न्यायपालिका खुद इस बात को बार-बार दोहराती है. मुख्य न्यायाधीश या उनके प्रतिनिधि को उच्च स्तरीय में शामिल किए जाने के पीछे सोच यही थी कि निष्पक्षता रहे. यह अजीब लग सकता है लेकिन एक गोगोई के निर्णय से छूटी छोटी संभावना से भी न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर बुरा असर पड़ा है.
 
न्यायमूर्ति राजेंद्र मेनन और प्रदीप नंदराजोग को नामित किए जाने से संबंधित विवादास्पद निर्णय भी सामने आया. इससे इस व्यवस्था का काफी समर्थन करने वाले भी इसका बचाव नहीं कर पा रहे हैं. न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और दिनेश मेनन को नामित करने पर पुनर्विचार का विषय तथ्यों पर कम आधारित दिखता है. यह कहना उचित नहीं लगता कि काॅलेजियम फिर से बना इसलिए विचार-विमर्श फिर से होना चाहिए. इस निर्णय ने कई तरह की अटकलों की संभावना को बल दिया है.
 
इस मामले में तो काॅलेजियम की नाकामी भी दिख रही है. खन्ना और महेश्वरी के प्रोन्नयन की कोई वजह नहीं बताई गई. मेनन और नंदराजोग को खारिज किए जाने की भी कोई वजह नहीं बताई गई. इन दोनों की सिफारिश करने वाले शुरुआती प्रस्ताव को सार्वजनिक नहीं किया गया. पुनर्विचार के लिए जो आधार बनाया गया, उसे भी जाहिर नहीं किया गया. सुप्रीम कोर्ट के एक मौजूदा ने जज ने जब सवाल उठाया तो कई सेवानिवृत्त जजों, वकीलों और नागरिकों ने सवाल उठाए लेकिन अदालत या मुख्य न्यायाधीश की तरफ से इसके जवाब में एक शब्द भी नहीं कहा गया.
 
इससे यही पता चलता है कि नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया में मनमानी, पारदर्शिता की कमी और जवाबदेही की कमी रही. यही आरोप पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिसरा पर चार जजों ने 12 जनवरी, 2018 को प्रेस वार्ता करके लगाए थे. हालांकि, संदर्भ थोड़ा अलग था.
खन्ना और महेश्वरी का प्रोन्नयन इकलौता ऐसा विवाद नहीं है जो जनवरी, 2019 में न्यायपालिका से संबंधित थी. कई उच्च न्यायालयों में जिस तरह से जजों की प्रोन्नति हुई, उससे भी काॅलेजियम की स्वतंत्रता पर सवाल उठे. इनमें से अधिकांश ऐसे निर्णय थे जिन पर पुनर्विचार के लिए विधि और न्याय मंत्रालय ने एक से अधिक मौकों पर कहा था. मेमोरेंडम आॅफ प्रोसिजर का पालन करते हुए पुनर्विचार के लिए ठोस आधार नहीं दिए गए. इसके बावजूद काॅलेजियम ने केंद्र सरकार के 11 में से 10 नामों को खारिज करने का प्रस्ताव मान लिया.
गोगोई के नेतृत्व वाले काॅलेजियम के इन निर्णयों से काॅलेजियम व्यवस्था को सही ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के तर्कों का माखौल उड़ता है. अदालत ने बार-बार इसे जजों की नियुक्ति का सबसे अच्छी प्रक्रिया बताया है. 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने से संबंधित संविधान संशोधन को खारिज करते हुए अदालत ने चैथे जज मामले में बताया था कि कैसे काॅलेजियम व्यवस्था के तहत न्यायपालिका की स्वायत्ता सुनिश्चित होती है. न्यायमूर्ति मदन लोकुर के निर्णय को पढ़ते हुए यह लगता है कि जजों की नियुक्ति के लिए यही एकमात्र संविधान सम्मत व्यवस्था हो सकती है. इसमें जिन बदलावों की जरूरत है, वे बेहद मामूली हैं. पिछले दो सालों में जजों की नियुक्तियों और स्थानांतरणों से कोई कसर रह गई थी तो उसे गोगोई के नेतृत्व वाली काॅलेजियम ने पूरा कर दिया है और यह साबित कर दिया है कि काॅलेजियम व्यवस्था का अब बचाव नहीं किया जा सकता.
 
जनता के स्तर पर की जाने वाली छानबीन और सरकारी दबाव में न्यायपालिका की कमजोरियां उजागर हो गई हैं. यह किसी एक व्यक्ति की नाकामी नहीं हैं और न ही कुछ लोगों के गलत निर्णय से संबंधित है. यह एक और उदाहरण है जिससे एक संस्था की कमजोरियों का पता चलता है. दुर्भाग्य यह भी है कि इस संस्था की अगुवाई एक ऐसे व्यक्ति कर रहे हैं जो इन आंतरिक कमियों से अवगत रहे हैं और जिन्होंने इन्हें ठीक करने के वादे किए थे.

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