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कचरा उठाने का अधिकार

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स्वच्छ भारत अभियान की वजह से दो जरूरी बातों से हमारा ध्यान नहीं भटकना चाहिए। पहली बात यह कि कचरा उठाने वाले चर्चा में आ गए हैं। क्योंकि कुछ प्रमुख लोगों ने अपनी पहचान उन लोगों के साथ जोड़ी है। दूसरी बात यह है कि कचरा उठाने वालों ने इसे अपने अधिकार के तौर पर कहना शुरू किया है। सार्वजनिक शख्सियतों के लिए कचरा उठाना रोज का काम नहीं है। जबकि कचरा उठाने वालों की जिंदगी हर रोज इसी काम में लगी है। वे इस काम में अपनी मर्जी से नहीं हैं बल्कि मजबूरी में हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि अगर यह मजबूरी का काम है तो फिर यह अधिकार कैसे हो सकता है? इस सवाल के संदर्भ में इस अधिकार के आयामों को समझना जरूरी है। इसमें भी पहले यह सवाल पूछना चाहिए कि यह अधिकार सकारात्मक है या नकारात्मक।

व्यक्तिगत आधारों को सकारात्मक माना जाता है। इन अधिकारों को संविधान द्वारा मान्यता मिली होती है और संस्थान इनकी रक्षा करते हैं। ये लोगों को स्वतंत्र तौर पर अपना पेशा चुनने का अधिकार देते हैं। अगर कामकाजी परिस्थितियां ठीक हों तो काम करने के मामले में कहा जा सकता है कि समान मानवीय अधिकार उपलब्ध है। ऐसे काम बड़ी संख्या में लोगों को आकर्षित करते हैं। इनके लिए प्रतिस्पर्धा भी होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा भी इनसे जुड़ी होती है। आजकल सरकारी और काॅरपोरेट क्षेत्र में मिलने वाली नौकरियां की अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा है। क्या इन संदर्भों में ही कचरा उठाने को अधिकार मानने की मांग हो रही है? इसका जवाब तीन वजहों से हां में नहीं दिया जा सकता है।

पहली बात तो यह कि जो लोग कचरा उठाते हैं, वे भी और समाज भी इस काम को हेय दृष्टि से देखता है। जिन लोगों के घरों से कचरा उठाने का काम ये करते हैं, वे भी इन्हें हिकारत की नजर से देखते हैं। गंभीरता से देखें तो यह नैतिक तौर पर गलत है। इन वजहों से कचरा उठाने वाले खुद को दूसरों से हीन मानते हैं। इसमें न तो सामाजिक प्रतिष्ठा है और न ही सम्मान। दूसरी बात यह कि अगर कचरा उठाने को अधिकार मान लिया जाए तो इससे वह नैतिक क्षमता खत्म होती दिखेगी जिसमें जीवन के क्षेत्रों में बराबरी की बात होती है। जो लोग कचरा उठाने को अधिकार मानते हैं, वे जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में असमानता को बढ़ावा देते दिखते हैं। कचरा उठाने वाले लोग अलग जगहों पर रहते हुए अकेले में ही कचरा को अलग करने का काम करते हैं।

अगर कचरा उठाने को अधिकार मान लिया जाए तो इन सवालों का जवाब इससे नहीं निकलता। तीसरी बात यह है कि अगर इसे अधिकार मान लिया जाए तो बेहतर विकल्पों की जरूरत ही खत्म होती दिखने लगती है। जबकि सच्चाई यह है कि इस काम में लगे अधिकांश लोग यह काम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं है। दरअसल, इसे अधिकार मानने की मांग इस डर से उपजी हुई लगती है कि उन्हें लग रहा है कि यह काम भी उनसे छीन लिया जाएगा और इसमें भी बड़ी कंपनियां आ जाएंगी। कचरा उठाने को अधिकार के तौर पर जाने की मांग चाहे जिस भी वजह से उठी हो लेकिन उन्हें ऐसा सकारात्मक अधिकार मिलना चाहिए जिसके जरिए साफ, प्रतिस्पर्धी और आकर्षक काम तक उनकी पहुंच हो सके।

Updated On : 4th Dec, 2019

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