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प्रक्रियाओं में निष्पक्षता किसके लिए मतलब रखती है?

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कोई भी समाज जो व्यक्तिगत स्तर के उदार मूल्यों की परवाह करता हो वह प्रक्रियाओं में निष्पक्षता के सिद्धांत को काफी महत्व देता है। इसमें यह बताने की जरूरत नहीं है कि प्रक्रियाओं में निष्पक्षता दो स्तर पर होती है। इनमें पहला तो पुलिस के स्तर पर है तो दूसरी तरफ फोरेसिंक एजेंसियों जैसी संस्थाओं के स्तर पर है। दोनों को मिलकर ऐसे साक्ष्य सामने रखने चाहिए जिन पर कोई संदेह नहीं कर सके। आपराधिक कानून के मामले में जो प्रक्रिया चलती है उसमें न्याय मिलना चाहिए। इसी संदर्भ में यह कहा जाता है, ‘सिर्फ न्याय होना नहीं चाहिए बल्कि न्याय होते हुए दिखना भी चाहिए।’



न्याय इस बात पर आधारित है कि प्रक्रियाओं में कितनी निष्पक्षता रही है। आपराधिक न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता का मतलब यह है कि बगैर किसी भेदभाव के वैज्ञानिक तरीके से जांच हो और सही स्थिति सामने आ सके। एजेंसियों को ऐसे साक्ष्य जुटाने चाहिए जिन पर कोई संदेह नहीं कर सके। इन एजेंसियों पर यह आरोप नहीं लगना चाहिए कि ये साक्ष्य मिटा रहे हैं और इसके साथ छेड़छाड़ कर रहे हैं।



जांच कोई मशीनी प्रक्रिया है। इनमें कई तरह के लोग शामिल होते हैं। उनकी अपनी स्थितियां होती हैं। पुलिस की निष्पक्षता को लेकर पूरी दुनिया में सवाल उठते हैं और भारत भी इसका अपवाद नहीं है। लेकिन प्रक्रियाओं में किसी के प्रति पूर्वाग्रह रखने और किसी का पक्ष लेने की वजह से न्याय की प्रक्रिया बाधित होती है। आरोप पत्र दाखिल करने में देरी होती है। पुलिस और फोरेसिंक विशेषज्ञ एक निश्चित दायरे में काम करते हैं। इसलिए उनके पास शक्तियों के साथ-साथ ज्ञान भी होता है। लेकिन यही कुछ मामलों में दिक्कतें भी पैदा करता है। जांच में खामी होने की वजह से या तो अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती या फिर उन्हें कम सजा मिलती है। लेकिन इसके बावजूद इन एजेंसियों में आत्मचिंतन नहीं होता। इसके उलट बरी होने वालों को लेकर जश्न का माहौल दिखता है। इससे न्याय की पूरी प्रक्रिया पर नकारात्मक असर पड़ता है।



प्रक्रियाओं में निष्पक्षता इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे लोगों की आजादी सुनिश्चित होती है। वह भी उनकी सामाजिक और लैंगिक पृष्ठभूमि से परे जाकर। यह उनके लिए खास तौर पर जरूरी है जो सिविल सोसाइटी की निष्पक्षता पर आश्रित नहीं रह सकते। सांस्थानिक तौर पर जो लोग प्रभावित होते हैं, उनके लिए प्रक्रियाओं में निष्पक्षता का और अधिक महत्व है। जांच में बगैर किसी वजह की होने वाली देरी की वजह से आरोप पत्र दाखिल करने में भी देरी होती है। इससे प्रभावित लोगों के दिमाग में न्याय प्रक्रिया को लेकर नकारात्मक सोच बनती है।



जब एजेंसियां पर्याप्त साक्ष्य नहीं जुटा पातीं तो प्रभावित लोगों के मन में न्याय के प्रति संदेह पैदा हो जाता है। कोई भी जांच एजेंसियों से भलाई की उम्मीद नहीं करता। जबकि यह उम्मीद की जानी चाहिए। कई पुलिस अधिकारी ऐसे हुए हैं, जिन्होंने समय-समय पर इसका प्रदर्शन किया है। ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि जांच प्रक्रिया में ये लोग निष्पक्षता सुनिश्चित करने को लेकर थोड़ी चिंता दिखाएं।

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